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ISSN 2292-9754

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03.15.2015


पंद्रह सिंधी कहानियाँ
समीक्षक- खेमन मूलाणी
सम्पादन एवं अनुवाद - देवी नागरानी

कहानी-संग्रह: पंद्रह सिंधी कहानियाँ
अनुवादक: देवी नागरानी
मूल्य:रु. 200
पन्ने: 136
प्रकाशक: हिन्दी साहित्य निकेतन
16 साहित्य विहार, बिजनौर(उ.प्र.), 246701, भारत।

मुझे याद है पैंतीस-चालीस साल पहले हिन्दी की किसी प्रतिष्ठित हिन्दी मासिक पत्रिका ने सिंध की सिंधी कहानियों का विशेषांक प्रकाशित किया था। आज कुछ ऐसे ही मेरे हाथ में देवी नागरानी जी का ‘पंद्रह सिंधी कहानियाँ’ नामक संग्रह आया है। इस पुस्तक में सिंध के सिंधी कहानीकारों की पंद्रह कहानियों का अनुवाद है।

देवी नागरानी ने अपने लेखन का प्रारम्भ हिन्दी भाषा में ग़ज़ल से किया। हिन्दी भाषा में उनके तीन ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुए जिन से हिन्दी साहित्य जगत में उनकी पहचान कवियित्री के रूप में स्थापित हुई। वे हिन्दी के अलावा सिंधी की भी एक प्रतिष्ठित कवियित्रि हैं। हिन्दी की तरह सिंधी ग़ज़ल में भी वे सिद्धस्त हैं। उनके सिंधी भाषा में भी तीन ग़ज़ल-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा वे हिन्दी तथा सिंधी भाषा में सशक्त अनुवादक के रूप में भी पहचान बना रही हैं। उनके दो कहानी-संग्रह, हिन्दी से सिंधी भाषा में और चार कहानी-संग्रह, सिंधी से हिन्दी में प्रकाशित हुए हैं। हिन्दी से सिंधी में अनूदित काव्य-संग्रह ‘रूहानी रूह जा पांधीअड़ा’ नाम से मांजरे-आम पर या हुआ है, जिसमें देश भर के नए पुराने रचनाकारों की कविताओं का अनुवाद है। अब मेरे हाथ ‘पंद्रह सिंधी कहानियाँ’ नामक संग्रह हाथ आया है जिसमें सिंध के सिंधी कहानीकारों के कहानियों का अनुवाद प्रस्तुत है।

वैसे तो सिंधी भाषा के पहली कहानी श्री लालचन्द अमर दनोमल की ‘हुर मखीअ जा’ थी, जो 1914 ई में छपी थी। परंतु इस संकलन में भारत के विभाजन के बाद के सिंधी कहानीकारों के कहानियों का अनुवाद किया गया है। जिसमें विभाजन के बाद की सभी पीढ़ियों के कहानीकारों को सम्मिलित किया गया है। ये कहानियाँ कथ्य और शिल्प के लिहाज़ से सशक्त कहानियाँ हैं। इन में आधुनिकता का प्रवाह दृष्टिगोचर होता है। हर कहानी की विषय वस्तु अलग-अलग है, और इन्हें पढ़ने से यह भाव सहज ही मन में उभरता है कि उपमहाद्वीप की सभ्यता एवं संस्कृति एक ही है। इस उपमहाद्वीप में रहने वाले हर व्यक्ति के संस्कार मानवीय मूल्यों पर आधारित सर्वोतम संस्कार हैं। आज भले ही राजनीतिक कारणों से भारत टुकड़ों में बँट चुका है, फिर भी इस उपमहाद्वीप के हर शख़्स की संवेदनाएँ विश्वव्यापी तथा ‘वसुदेव कुटुंबम’ के मूल मंत्र से प्रेरित रहती हैं, हमारी सोच और विसंगतियाँ सब एक समान ही हैं। मज़दूर, किसान, ग़रीब, साहूकार, ज़ुल्म-ज़बरदस्ती, अन्याय, रिश्वतख़ोरी, अच्छे-बुरे लोग सब यहाँ भी हैं और वहाँ भी।

मुश्ताक़ अहमद शोरो की कहानी ‘बीमार आकांक्षाओं की खोज’ का मुख्य पात्र ‘मैं’ के विचार जीवन की कई शाश्वत सच्चाइयों को उद्घाटित करते हैं। उदाहरण के तौर पर उस कहानी के कुछ वाक्य प्रस्तुत करना चाहता हूँ। कहानी का किरदार कहता है- ‘मेरा वजूद ही एक क्रिमिनल का है, ज़िंदगी मैं नहीं गुज़ार रहा, ज़िंदगी ही मुझे धीरे-धीरे जी रही है।‘ या ‘औरत को प्यार से ज़्यादा सामाजिक शनाख़्त की ज़रूरत होती है, ‘शादी औरत के लिए बीमा पॉलिसी है, जिसका प्रीमियम वह सेक्स के रूप में अदा करती है।‘ ‘सच तो यह है कि जिसकी हमेशा तलाश रही वह कभी मिला नहीं। किसी को भी नहीं, गौतम बुद्ध को भी नहीं.... ।‘ ये वाक्य वैश्विक सत्यों को उद्घाटित करते हैं। हर इंसान उन्हीं के इर्द-गिर्द जीता रहता है।

तारिक अशरफ़ की कहानी ‘घाव’ भी एक ऐसा ही सच उजगार करती है। एक फ़क़ीर पेट की आग बुझाने के लिए समाज के हर वर्ग के आदमी के पास जाकर रोटी की भीख माँगता है, परंतु सब उसे भगा देते हैं। आख़िर एक फ़क़ीर के पास जाता है, जो उसे अपना खाना साथ बैठ कर खाने के लिए कहता है। परंतु तीन दिन से भूखा होने के बावजूद भी वह काँपती आवाज़ से उसे यह कहते हुए आगे बढ़ जाता है कि ‘खाओ बाबा’।

आयाज़ क़ादरी की कहानी का मुख्य चरित्र ‘बिल्लू दादा’ समाज के ठेकेदारों पर प्रश्न चिन्ह लगाकर चुपचाप शहर छोड़ कर चला जाता है। नसीम थेबो की कहानी ‘किस किस को खामोश करोगे’ सिंध की वर्तमान स्थिति की सशक्त अभिव्यक्ति है। उसमें भी एक नेक इंसान सोढ़ा एक ऐसे ही एक समाज विरोधी रसूख़दार के कारण निर्दोष होते हुए भी दोषी करार कराते हुए उसे फाँसी के फंदे पर लटकाया जाता है। हमीद सिंधी की कहानी ‘यह ज़हर कोई तो पिएगा’ में सिद्धांतवादी, ईमानदार और नेक हेड मास्टर शफ़ी मुहम्मद को रिटायर होने के छः महीने बाद भी रिश्वत न दे पाने के कारण पेंशन नहीं मिलती। घर टूटा-फूटा है, उसमें खाने को दाना नहीं, बेटियाँ जवान, बेटा गुमराह... वह परेशान हो जाता है। आखिर अफ़ीम मिले पानी का ज़हर पीने को मजबूर हो जाता है। इस प्रकार इस संकलन की सभी कहानियाँ जीवन के अलग-अलग रंग लिए हुए हैं। मैंने तो बानगी के रूप में केवल कुछ कहानियों का संक्षेप में उल्लेख किया है।

अनुवाद वास्तव में मूल लेखन से भी ज़्यादा कठिन होता है। मूल लेखन में लेखक अपने विचार प्रकट करने के लिए स्वतंत्र होता है, लेकिन अनुवादक को यह स्वतन्त्रता नहीं होती। उसे लेखक के विचारों तथा मूल पाठ के साथ आगे बढ़ना पड़ता है। लेखक को एक ही भाषा में अपने विचार प्रकट करने होते हैं। जब कि अनुवादक के लिए यह आवश्यक होता है कि उसे दोनों भाषाओं पर अच्छी पकड़ हो। देवी नगरानी जी को दोनों भाषाओं पर पकड़ है, जिसके एवज़ वे इतना बेहतरीन अनुवाद कर पाई हैं। उनका अनुवाद कलात्मक है। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि हम किसी दूसरी भाषा की कहानी का अनुवाद पढ़ रहे हैं। यही एक अच्छे अनुवादक की विशेषता होती है।

अनुवाद का कार्य दो भाषाओं, दो देशों, दो समाजों, दो संस्कृतियों के बीच सेतु का काम करता है। देवी नगरानी जी ने यह काम बड़ी ही प्रवींणता से किया है। इस के लिए उन्हें साधुवाद।

समीक्षक: खेमन मूलाणी, A-न्यू 14/134, बैरागढ़, भोपाल-462030, mob-09425051715


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