अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
06.03.2012


निष्ठावान सृजन साधना की उपज : नागफनी के फूल

दोहा संग्रह-नागफनी के फूल Nagfani Ke Phool
कृतिकार- रघुविन्द्र यादव
पृष्ठ-80
मूल्य-100 रुपये
प्रकाशक- आलोक प्रकाशन,
'प्रकृति भवन', नीरपुर, नारनौल, हरियाणा (भारत)123001
समीक्षक- देवी नागरानी

आधुनिकता की भीड़ में सादगी तलाशने वाले फनकार अपनी भावनाओं एवं संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने की कला से बखूबी परिचित हैं और कम से कम शब्दों में बड़ी से बड़ी बात कह पाने में लेखन कला के हर औज़ार का इस्तेमाल करते हुए-ग़ज़ल, मुक्तक, रुबाई, चौपाई और दोहे लिख रहे हैं।

प्रत्येक कला अपने ऐतिहासिक युग के लिए छाप होती है, पर वह कला महान होती है जिसकी छाप मन और मस्तिष्क पर हावी रहे। बच्चन जी का मानना है कि 'कवि समाज का पथ-प्रदर्शक होता है। बड़ा कलाकार वही है जो अपनी कला पर हावी होता है।'

ऐसी ही कला में दक्षता हासिल है श्री रघुविन्द्र यादव जी को जो "नागफनी के फूल" दोहा संग्रह के रूप में हमारे सामने है। काव्य के प्रबंध स्वरूपन से मुक्ति की आकांक्षा का परिणाम है- ग़ज़ल और दोहा। ग़ज़ल के शेर और दोहे में बड़ा साम्य है। ग़ज़ल का प्रत्येक शेर अपने आम में एक पूर्ण उक्ति है। दोहे का भी ठीक यही, ग़ज़ल के एक शेर-सा स्वभाव है। वरिष्ठ ग़ज़लकार श्री नन्दलाल पाठक जी का कहना है-ग़ज़ल मुक्त में मुक्तक है। उसी मुक्तक का हिस्सा है दोहा- जिसके कथ्य में मात्राओं के गणित के पश्चात जीवन के बहुगुणी रंगों और रागों में रचे बसे हैं। दोहे की मूल प्रकृति उसकी रमणीयता में है। रघुविन्द्र यादव के दोहे अपने आसपास की सुनी, देखी और भोगी हुई सच्चाइयों के जीवंत मंजर सामने पेश करते हुए अपने तेवर ज़ाहिर कर रहे हैं-

गड़बड़ मौसम से हुई, या माली से भूल।
आँगन में उगने लगे, नागफनी के फूल॥
**
हर कोई आज़ाद है, कैसा शिष्टाचार।
पत्थर को ललकारते, शीशे के औज़ार॥

श्री रघुविन्द्र यादव के दोहे सच के सामने एक आइना है, हृदय की गहराइयों में पनपते अंतरद्वंद्व के अक्स हैं, एक दोहाकार के अंतस की खलबली है। अभिव्यक्ति में जीवन के विविध संदर्भ, सामाजिक विसंगतियाँ, जन सामान्य के जटिल जीवन संघर्षों की व्यथा-कथा, दीन-दुखियों की तड़प, उनकी भोगी हुई घुटन के पारदर्शी रेखांकित चित्र, सशक्त शब्दावली उकेर रही है। इन दोहों में-

कभी धर्म के नाम पर, कभी जाति के नाम।
जीते सभी चुनाव वो, बाँट-बाँट कर दाम॥
***
राजनीति धंधा हुई, नेता बने दलाल।
गुण्डों की चाँदी हुई, देश हुआ कंगाल॥

यहीं पर पाठक लेखक के संसार से जुड़ता है, जहाँ वह अपने अनुभव संसार में धँसता हुआ रचनाकार की सोच के साथ हमराय हो उठता है। अगर कथ्य मज़बूत है, सच्चाइयों की नींव पर टिका है, तो सच मानिये वह पाठक को अपनी विचारधारा में शामिल कर पाने में सक्षम है। यही लेखक की मर्यादा भी है और कसौटी भी। ++

धन की तराजू में मानवता को तोलने वाले उन समाज के वहशी वाशिंदों पर करारी चोट करते हुए उनके दोहे देखिए-

पैसे से होने लगी, मानव की पहचान।
जितना जिसकी गाँठ में, उतना ही सम्मान॥

गहने सब बेचे गए, गिरवी हुई ज़मीन।
बेटी की शादी हुई, बाप दीन औ हीन॥

दम तोड़ती हुई आदमीयत पर प्रहार करते हुए वे लिखते हैं-

बूढ़ी अम्मा मर गई, कर-कर नित फरियाद।
हुआ केस का फैसला, बीस बरस के बाद॥

मानवता की अर्थी अपने की कांधों पर ढोने वाले सियासी लोग इस मर्म को समझने जब समझने लगेंगे, मानवता फिर साँस लेने लगेगी-

भ्रष्ट व्यवस्था ने किए, पैदा वो हालात।
जुगनू भी अब पूछते, सूरज से औकात॥

बम, धमाके, गोलियाँ, खून सने अखबार।
घाटी में अब चल रहा, दहशत का व्यापार॥

इन दोहों की रचनात्मक ऊर्जा की तरह एक-एक दोहे को एक विषय बनाकर लेख लिखा जा सकता है। गागर में सागर समाहित करने का हुनर रघुविन्द्र यादव के दोहों से बखूबी झाँक रहा है। उन्होंने जो देखा, जिया, भोगा वही विषय वस्तु बनाकर करीने से दोहे के निर्माण को सुसज्जित किया है।

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। परिवेश से जुड़ा रहना उसका हक भी है और दायित्व भी। बदलते समय के साथ रिश्तों की भरभराकर गिरती दीवारों की ख़ामोश आवाज़ भी इनके दोहों के माध्यम से हमारे दिलों को दस्तक़ देती है-

स्वारथ की बुनियाद पर, रिश्तों की दीवार।
कच्चे धागों की तरह, टूट रहे परिवार॥

रिश्तों को यूँ तोड़ते, जैसे कच्चा सूत।
बँटवारा माँ-बाप का, करने लगे कपूत॥

यह आज की अवस्था का कड़वा सच भी है और नौजवान पीढ़ी पर एक करारा प्रहार भी। कल, आज और कल की कड़ियों को जोड़ता समय काल-चक्र की परिधि में एक नियमित गति के साथ आगे बढ़ता है। जहाँ गुज़रा आज बीता हुआ कल बन जाता है और आने वाले कल के सामने एक आइना भी।

"लेना माँ को देख" उन्वान में माँ के गुणगान में कहे सभी दोहे बहुत ही विचारजनक स्थिति में लाकर खड़ा करते हैं। माँ के आशीष का महत्व तो वे ही जानते हैं जो रिश्ते को जानते हैं और पहचानकर निभाते हैं। माँ का त्याग, बलिदान, उसकी ममता का आँचल तमाम उपमाएँ काग़ज़ी हुई जा रही हैं, पर माँ फिर भी एक जीती जागती सच्चाई है जो निर्माण शक्ति की नींव है, उस नींव को नमन करते हुए यादव जी का एक दोहा-

ममता, करुणा प्रेम की, होती है माँ खान।
'यादव' की हस्ती कहाँ, माँ का करे बखान॥

दोहाकार के सशक्त दोहों से परिचित होकर, अति मंथन के बाद मुझे भी कहना पड़ रहा है-

दोहे यादव के बने, अब उसकी पहचान।
'देवी' की हस्ती कहाँ, उनका करे बखान॥

हर अभिव्यक्ति सत्यम, शिवम, सुन्दरम । अनेक शुभकामनाओं एवं दुआओं के साथ।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें