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03.16.2014


खामोश खंडहरो की अकथनीय दास्तान - नारी की त्रासदी

 संग्रह: देश विभाजन और नारी त्रासदीनारी की त्रासदी
लेखिका: डॉ॰ लखबीर कौर
पन्ने: 272 - 320 (दो भाग), मूल्य: 750रु.
प्रकाशक: विकास प्रकाशन, 311 सी, विश्व बैंक, कानपुर,

हिन्दी साहित्य का भंडार अद्भुत, अनंत और अपरमपार है। समाज अथवा परिवेश से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित साहित्य अपने समय का दस्तावेज होता है। जिस परिवर्तनशील दौर में हम हैं; वहाँ परिवेश का प्रभाव पहले भी रहा है, अब भी है और हमेश रहेगा, जब तक मानव जाति अपनी सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी रहेगी। लेखक भी एक सामाजिक प्राणी है, फिर भी उसके लेखन को प्रामाणिक बनानेवाली चीज़ उसकी संबद्धता है। लेखक का व्यक्तित्व अपने परिवेश से नितांत पृथक कभी नहीं हो सकता। जब अपने आस-पास होते हुए संघर्षों, विपदाओं, विद्रुपताओं से अपने समय में देखते हुए, जीते हुए, भोगते हुए उसकी लेखनी का यथार्थ के साथ पूरी तरह साक्षात्कार होता है तभी जाकर एक उच्च कोटि की साहित्यिक रचना या कृति का जन्म होता है।

Dr. Lakhbir Kaur Vermaडॉ॰ लखबीर कौर

आज़ादी के पहले और आज़ादी के दौर में निरंतर साहित्य विकास के रास्तों से गुज़रकर अब प्रत्यक्ष रूप में सामने आया है। आज़ादी के बाद भारत में एक नया परिवर्तन आया। घर की चौखट के भीतर बैठी नारी आज स्वतंत्र रूप से अपने भीतर की संवेदना को, भावनाओं को निर्भीक और बेझिझक स्वर में वाणी दे पाने में सक्षम हुई है। अपने अन्दर की छटपटाहट को व्यक्त करना अब नारी का ध्येय बन गया है । स्वरूप ध्रुव के शब्दों में:

सुलगती हवा में श्वास ले रही हूँ दोस्तो
पत्थर से पत्थर घिस रही हूँ दोस्तो

मानसिक प्रताड़ना के रेखांकित किये हुए चिन्ह वक़्त की दीवारों में चुने जाने के बावजूद भी रह-रह कर सिसकियाँ भरते रहे हैं, अपने वजूद की तलाश में ख़ामोश खंडहरों में भटकते रहे हैं। इक़बाल का यह शेर इसी दशा को परिभाषित कर रहा है....

ढूँढता फिर रहा हूँ मैं, इक़बाल अपने आपको
आप ही गोया मुसाफ़िर, आप ही मंज़िल हूँ मैं।

इसी दिशा में विभाजन की विभीषिका से संत्रस्ता, उत्पीड़ित्वता, विस्थापिता, अपहृता बलात्कृता एवं सह्रता उन असंख्य नारियों की अतृप्त आत्माओं की प्रताड़ना, जो अमानुषता ने मानवता की दहलीज़ पर अंजाम दी और शायद उनके साथ किए गए पाश्विक अत्याचार एंव दुराचार के कारण को लेखन का सबब बनाया है। डॉ॰ लखबीर कौर वर्मा ने नारी की उस अक्षम्य और अविस्मरणीय त्रासदी को – "देश विभाजन और नारी की त्रासदी" नाम के जुड़वा संकलनों से, साहित्य जगत को समृद्ध करती हुई नारी की पक्षधर बनकर हमसे रू-ब-रू हुई हैं।

देश विभाजन के बाद दिलों के विभाजन की व्यथा, अमन चैन के लूट की पीड़ा का एक नया युग शुरू हुआ। एक सपना था जो फ़क़त बटंवारे के दौरान चकनाचूर ही नहीं हुआ बल्कि आज तक भी उसकी किरचें दिलों-दिमाग़ के विभाजन को चीरती है। लेखिका डॉ॰ लखबीर वर्मा ने अपने लेखकीय में उसी वेदना को आत्मसात कराते हुए लिखा हैं – "भारतीय उप महाद्वीप के विभाजन की विभीषिका में नारी जाति की जो अवमानना, उसका दानवीय, दुर्दमन और उसका क्रूरतापूर्ण यौन शोषण और नृषंस संहार किया गया है, वह अक्षम्य और अविस्मरणीय नारी त्रासदी हैः"

विभाजन की त्रासदी में प्रतिशोध की मदांधता में प्रतिस्पर्धी गुटों ने खोज-खोज कर स्त्रियों की अस्मत लूटी, उनकी अवमानना की, हत्या की, यह एक विस्तारपूरक विषय है जो डॉ॰ लखबीर ने अपने शोध के लिये चुना है। यही हमें झकझोर कर यह सोचने पर मजबूर करता है कि इस देश में ही नही, विश्व के मानव समुदाय को ऐसी विभीषकाओं से बचने की दिशा में सजग रहना होगा, उनके मान सम्मान को कायम रखने के लिए आगे कुछ करना होगा।

विभाजन के छः दशक बाद भी आज शक्ति सम्पन्न नारी त्याग और संवेदना की वशीभूत यातनायें झेलने को विवश है। सृष्टि के सृजन की सहयोगिनी नारी का सम्पूर्ण अस्तित्व ही विडम्बना से घिरा हुआ है। नारी मन की व्यथा, पीड़ा और अन्तर्मन की अकुलाहट को पलपल महसूस किया जा सकता है। जैसे दुख उनके जीवन का अहम हिस्सा है, देह के ज़रूरी अंग-सा! तभी तो उसका अस्तित्व चीत्कार उठता है -

"मैं नारी मात्र हूँ नारी ही रहना चाहती हूँ।"
सीता नहीं होना चाहती
उसे पसंद नहीं सीता का परीक्षा देना
राम की परीक्षा का विकल्प तब भी था,
और आज भी!

लिये गए शोध विषय का कैन्वस इतना विस्तिृत है, की इसकी विषयवस्तु पाठक को अपने अंदर गहरे धँसने पर मजबूर करती है और संवेदना के धरातल पर लाकर खड़ा करती है ।

भारत के विभाजन पर आधारित हिन्दी कथा साहित्य के संदर्भ में डॉ॰ लखबीर ने, जो ख़ुद अंग्रेज़ी की प्राध्यापिका हैं, पहले भाग में 15 उपन्यासों और 23 कहानियों के संदर्भों से नारी मन की प्रताड़ना, नारी जीवन के सूक्ष्म अध्ययन के पश्चात पल-प्रतिपल पराजित संघर्ष का सामाजिक और आर्थिक विश्लेषण का लेखा-जोखा सामने रखा है। उनके अध्ययन की क्षमता नारी मन की आखि़री तह तक धँसकर, जहाँ तक दर्द उसे छू सकता है, उसी सतह की अद्भुत और अनुपम प्रतिभा पुरज़ोर प्रभाव के साथ प्रस्तुत की है ।

दूसरे भाग - भारत विभाजन और ‘भारतीय कथा साहित्य के संदर्भ में’ देश विभाजन के पश्चात नारी त्रासदी को विभिन्न भाषाओं के उपन्यासों और कहानियों में किस प्रकार व्यक्त किया गया है, उसका एक तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है। संदर्भ के लिये उपन्यासों और कहानियों का चुनाव अंग्रेज़ी, उर्दू, पंजाबी, सिन्धी, बंगला, गुजराती, मराठी एवं डोंगरी आदि भाषाओं से अनूदित सामग्री के आधार पर किया है।

इस संग्रहों में इतने विषम और व्यापक शोधकार्य पर सिद्धहस्त अनुवादक एवं समीक्षक डॉ॰ सूर्यनारायण रणसुभे जी ने अपनी प्रस्तावना में लिखा है – "ऐसे शोध कार्य के लिये बहुत बड़ी हिम्मत, संयम तथा कठोर परिश्रम की ज़रुरत होती है। डॉ. लखबीर जी में ये सारे गुण मौजूद हैं।"

रचना को प्रमाणिक बनानेवाली चीज़ उसकी संबद्धिता होती है। सिलसिलेवार भाग एक में हिन्दी उपन्यासों और कहानियों का सर्वेक्षण, हिन्दी कथा साहित्य में नारी जीवन का चित्रण और चित्रित नारी जीवन का अध्ययन है! भाग दो में भारत विभाजन पर आधारित हिंदी अंग्रेज़ी व अन्य भाषाओं के कथा साहित्य का सर्वेक्षण, नारी जीवन का तुलनात्मक अध्ययन भी है, जिसकी एवज़ नारी त्रासदी के विविधस्वरूप उभर कर सामने आए हैं।

जीवन की संघर्षमय जटिल परिस्थितियों में, विसंगतियों से कई हार मान बैठते हैं, जब कि एक नन्हा दीपक घनघोर अंधकार में भी पराजय नहीं मानता। नारी अपनी लड़ाई ख़ुद लड़ते हुए हर उस चक्र से मुक्त होना चाहती है। वह बख़ूबी जानती है -

"आज नारी
निरपराध अहिल्या सी
शिला न बनेगी
न बाँधेगी पट्टी आँखों पर
अपने पति का अन्धापन बढ़ाने।

कहा गया है "जो साहित्य देश समाज तथा समूची मानवता को कुछ नहीं देता, उसका सृजन करके कागज़ काले पीले करने का कोई अर्थ नहीं।" पर एक बात और जो इस साहित्य सृजन से उभर कर सामने आई है, वह है विभाजन की त्रासदी से गुज़री हुई नारी, परंपरागत मूल्यों का क्षरण करती हुई नये जीवन मूल्यों के प्रति आगे बढ़ती दिखाई देती है। नारी अस्मिता और नारी के स्वतंत्र व्यक्तित्व को लेकर साहित्यिक रचनाएँ उनके प्रयासों को परवाज़ के पंख देंगी ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें और स्वाभिमान को कायम रख सकें ।

डॉ. लखबीर की यह निष्ठावान कोशिश समाज में बिखरे आधे अधूरे सपनों को सकारात्मक एकता की गाँठ से और मज़बूत करेगी एवं भारत के साहित्य के विराट स्वरूप में अपना योग्य स्थान पायेगी । इस अद्भुत शोधकार्य के लेखन को संदर्भ ग्रंथ की मांनिद अपने साहित्य कोश में शामिल करना एक सौभाग्य होगा।

इस विशेष कार्य के लिए, जो नारी जाती के मान सम्मान में एक मयूर पंख बन कर उसकी संस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक बना है, उसके लिए लखबीर जी को तहे-दिल से बधाई व शुभकामनाएँ।

समीक्षक :देवी नागरानी देवी नागरानी
पता: ९-डी॰ कॉर्नर व्यू सोसाइटी, १५/ ३३ रोड, बांद्रा
मुंबई ४०००५० फ़ोन: 9987938358




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