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05.03.2012
 
"ग़ज़ल कहता हूँ" - कुछ विचार
(ग़ज़ल कहता हूँ - संग्रह लेखक प्राण शर्मा)

देवी नागरानी

पुस्तक : "ग़ज़ल कहता हूँ"

शाइरः प्राण शर्मा

प्रकाशकः अनिभव प्रकाशन,

        ई-२८, लाजपतनगर,

        साहिबाबाद,.प्र.

मूल्यः   १५०

पन्नेः   ११२

लेखक का पताः

3 Crackston Close

Coventry CV25EB

U.K.

   

श्री प्राण शर्मा ग़ज़ल विधा के संसार में एक जाने माने उस्ताद है जो यू.के. में रहते हुए ग़ज़ल विधा की राह पर कई नये लेखकों की राह रौशन करते चले आ रहे हैं। बहुआयामी व्यक्तित्व के मालिक १९३७ में वज़ीराबाद में जन्मे और साहित्य के क्षेत्र में अपनी सेवाएँ प्रस्तुत करते हुए १९५५ से वे हमेशा अपने लेखन के लिये देश विदेश में जाने जाते रहे हैं।  अनेक पुरुस्कारों से उनकी निवाज़िश हुई है। प्राण

शर्मा जी हरिवंश बच्चन और दुष्यंत के बीच के समकालीन कवि के रूप में जाने जाते हैं। उनकी काव्य कृति "सुराही" और "मैं ग़ज़ल कहता हूँ" अपने वक्त के लोकप्रिय संग्रह हैं।

प्राण सर्मा जी ने अपनी शैली और सोच को शिल्पकार की तरह अपने ढंग से ढाला है। आए दिनों उनके लेख गज़ल के बारे में पढ़ने को मिलते है जो नये लिखने वालों के लिये मार्गदर्शक बनते चले जा रहे हैं। आपके द्वारा लिखा गया "हिंदी ग़ज़ल बनाम उर्दू ग़ज़ल" धारावाहिक रूप में हमारे सामने आता रहा और पथ दर्शक बन कर वह कई ग़ज़ल विधा की बारीकियों पर रोशनी डालते हुए बड़ा ही कारगर सिद्ध हुआ।  उसी के एक अंश में आइये सुनें वो ग़ज़ल के बारे में क्या कहते हैं –

"अच्छी ग़ज़ल की कुछ विशेषताएँ होती हैं। इन पर समय के साथ के चलते हुए विशेषज्ञता हासिल की जाये तो उम्दा ग़ज़ल कही जा सकती है। साथ ही इनका अभाव हो तो ग़ज़ल अपना प्रभाव खो देती है या ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाती। सरल, सुगम एवं कर्णप्रिय शब्दों में यदि हिंदी ग़ज़ल लिखी जायेगी तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता कि वह जनमानस को न मथ सकें। यदि  ग़ज़ल में सर्वसाधारण के समझ में आने वाली कर्ण प्रिय मधुर शब्द आएँगे तो वह न केवल अपनी भीनी- भीनी सुगंध से जनमानस को महकाएगी बल्कि अपनी अलग पहचान बनायेगी। हिंदी ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाने के लिये उसको बोलचाल या देशज शब्दावली को चुनना होगा,  जटिल ग़ज़ल की वकालत को छोड़ना होगा।"

 

जब किसी रचनाकार की साहित्य रुचि किसी एक खास विधा में हो और वह उसके लिये जुस्तजू बन जाये तो वहाँ लेखन कला साधना स्वरूप सी हो जाती है। ऐसी ही एक स्थिती में अंतरगत प्राण शर्मा जी ने अपने इस ग़ज़ल संग्रह के आरंभ में लिखा है जिसे पढ़ कर सोच भी यही सोचती है कि किस ज़मीन की बुनियाद पर इस सोच की शिला टिकी होगी, किस विचार के उत्पन्न होने से, उसके न होने तक का फासला तय हुआ होगा। विचार की पुख़्तगी  को देखिये, सुनिये और महसूस कीजिये।

 

"ग़ज़ल कहता हूँ तेरा ध्यान करके

 यही ए प्राण पनी आरती है।"

 

अद्‌भुत, सुंदरता की चरम सीमा को छूता हुआ एक सच। यही भावार्थ लेकर एक ेर मेरी गज़ल का इसी बात की सहमति दे रहा है -

 

"दिल की दुनियाँ में जब मैं डूबी रही

कहकशाँ में नज़र आ गया कहकशाँ।"  

 

"एक आसमान जिस्म के अंदर भी है

तुम बीच से हटों तो नज़ारा दिखाई दे।"

                             —गणेश बिहारी तर्ज़

 

नज़रिया एक पर हर लफ़्ज अपने अपने भाव से शेर में पिरोये हुए तालमेल का अंतर अपनी अपनी दृष्टि से अलग-अलग ज़ाहिर कर रहा है, जैसे कोई अपने वजूद की गहराइयों में डूबकर, बहुत कुछ टटोलकर प्रस्तुत करता है जिसमें कथ्य और शिल्प दोनों साकार हो जाते हैं। निशब्द सोच, शब्दों का सहारा लेकर बोलने लगती है, चलने लगती है। यही आकार एक अर्थपूर्ण स्वरूप धारण करके सामने आ जाता है एक कलाकार की कलात्मक अर्चना की तरह।

 

सीप में मोती

स्वास स्वास में राम

बसा हो जैसे....। स्वरचित हाइकु

यूँ मानिये कि अपनी अपनी सोच के परों पर सवार होकर प्राण जी का मन शब्दों के जाल बुनता है, उधेड़ता है और फिर बुनता है कुछ यूँ कि वो छंद के दाइरे में जहाँ कभी तो आसानियाँ साथ देती है, कहीं तो बस कशमकश के घेराव में छटपटाहट ही होने लगती है, जब तक सोच का एक मिसरा दूसरे मिसरे के साथ नियमानुसार ताल मेल नहीं खाता। ग़ज़ल लिखने के कुछ अपने कायदे हैं, कुछ रस्में है, उनका अपना एक लहज़ा  होता है।

 उन्हीं के साथ इन्साफ करते हुए अपनी तबीयत की फिक्र को किस तरह ज़ाहिर कर रहे हैं, गौर फरमायें, सुनते है उनके ही शब्दों में-

 

"ढूँढ लेता मैं कहीं उसका ठिकाना

पाँव में पड़ते न छाले सोचता हूँ।

 

प्राण दुख आए भले ही जिंदगी में

उम्र भर डेरा न डाले सोचता हूँ।" — ५१

 

किसीने खूब कहा है 'कवि और शब्द का अटूट बंधन होता है। कवि के बिना शब्द तो हो सकते हैं, परंतु शब्द बिना कवि नहीं होता। एक हद तक यह सही है, पर दूसरी ओर 'कविता' केवल भाषा या शब्द का समूह नहीं। उन शब्दों का सहारा लेकर अपने अपने भावों को भाषा में व्यक्त करने की कला गीत-गज़ल है। ये तजुरबात की गलियों से होकर गुज़रने का सफ़र उम्र के मौसमें को काटने के बाद कुछ और ही गहरा होने लगता है, हकी़कतों से वाकिफ़ कराता हुआ। सोच का निराला अंदाज़ है, शब्दों का खेल भी निराला, कम शब्दों की पेशकश,  जिससे साफ़ ज़ाहिर होता है वह ग़ज़ल की लेखन कला की माहिरता और उनकी सोच की परवाज़ सरहदों की हदें छूने के लिये बेताब है। बस शब्द बीज बोकर अपनी सोच को आकार देते हैं, कभी तो सुहाने सपने साकार कर लेते हैं, तो कहीं अपनी कड़वाहटों का ज़हर उगल देते हैं। सुनते हैं जब गमों के मौसम आते हैं तो बेहतरीन शेर बन जाते हैं। अब देखिये प्राण जी का एक गज़ल का मतला, जहाँ उनके अहसास साँस लेने लगते है, जैसे इनमें प्राण का संचार हुआ हो। बस शब्द बीज के अंकुर जब निकलते हैं तो सोच भी सैर को निकलती है, हर दिशा की रंगत साथ ले आती है।  सोच का परिंदा पर लगाकर ऊँचाइयों को छू जाता है, तो कभी हृदय की गहराइयों में डूब जाता है। वहाँ पर जिस सच के साथ उसका साक्षात्कार होता है उसी सत्य को कलम की ज़ुबानी कागज़ पर भावपूर्ण अर्थ के साथ पेश कर देता है। अब देखिये प्राण जी एक गज़ल का मक्ता इसी ओर इशारा कर रहा है:

 

धूप में तपते हुए, ए प्राण मौसम में

सूख जाता है समन्दर, कौन कहता है।

 

"हिंदी ग़ज़ल बनाम उर्दू ग़ज़ल"  धारावाहिक में उनका  संकेत ग़ज़ल की अर्थपूर्ण संभावनाओं को प्रस्तुत करते समय क्या होता है? और क्यों होता है? कहते हुए प्राण शर्मा जी की जुबानी सुनें क्या फरमाते हैं- "अच्छे शेर सहज भाव, स्पष्ट भाषा और उपयुक्त छंद में सम्मिलन का नाम है। एक ही कमी से वह रसहीन और बेमानी हो जाता है। भवन के अंदर की भव्यता बाहर से दिख जाती है। जिस तरह करीने से ईंट पर ईंट लगाना निपुण राजगीर के कौशल का परिचायक होता है, उसी तरह शेर में विचार को शब्द सौंदर्य तथा कथ्य का माधुर्य प्रदान करना अच्छे कवि की उपलब्धि को दर्शाता है। जैसे मैंने पहले यह लिखा है कि यह उपलब्धि मिलती है गुरु की आशीष तथा परिश्रम अभ्यास से। जो यह समझता है कि ग़ज़ल लिखना उसके बाएँ हाथ का खेल है तो वह भूल-भुलैया में विचरता है तथा भटकता है। सच तो यह है कि अच्छा शेर रचने के लिये शायर को रातभर बिस्तर पर करवटें बदलनी पड़ती है। मैंने भी लिखा है" -

 

सोच की भट्टी में सौ सौ बार दहता है

तब कहीं जाके कोई इक शेर बनता है। — ६१

 

किसी हद तक यह ठीक भी है। शिल्पकारी में भी कम मेहनत नहीं करनी पड़ती है।  मेरा एक शेर -

 

 " न दीवार पुख़्ती वहाँ पर खड़ी है

 जहाँ ईंट से ईंट निस दिन लड़ी है"

 

कभी गर्व से ऊँचा सर है किसीका

कभी शर्म से किसकी गरदन झुकी है" - देवी

 

बकौल शाइर डॉ. कुँअर बेचैन ने इस ग़ज़ल संग्रह कि प्रस्तावना को एक नये व अनोखे अंदाज से पेश किया है, हाँ उनकी शैली उनकी दार्शनिकता के विस्तार के साथ खूब इन्साफ किया है।  उनका प्राण जी की ग़ज़ल के साथ साक्षात्कार होना, और फिर उसके साथ गुफ्तगू का सिलसिला इतना रोचक और जानदार लगा कि शुरू करने के बाद समाप्ति की ओर बढ़ती चली गई और फिर तो सोच का नतीजा आपके सामने है। सोच की उड़ान आसमाँ को छेदने की शिद्दत रखती है। छोटे बहर में बड़ी से बड़ी बात कहना इतना आसान नहीं। यह तो एक शिल्पकला है। ग़ज़ल लिखना एक क्रिया है, एक अनुभूति है जो हृदय में पनपते हुए हर भाव के आधार पर टिकी होती है। एक सत्य यह भी है कि यह हर इन्सान की पूँजी है, शायद इसलिये कि हर बशर में एक कलाकार, एक चित्रकार, शिल्पकार एवं एक कवि छुपा हुआ होता है। किसी न किसी माध्यम द्वारा सभी अपनी भावनाएँ प्रकट करते हैं, पर स्वरूप सब का अलग अलग होता है। एक शिल्पकार पत्थरों को तराश कर एक स्वरूप बनाता है जो उसकी कल्पना को साकार करता है, चित्रकार तूलिका पर रंगों के माध्यम से अपने सपने साकार करता है और एक कवि की अपनी निश्बद सोच, शब्दों का आधार लेकर बोलने लगती है तो कविता बन जाती है, चाहे वह गीत स्वरूप हो या रुबाई या गज़ल। यही तो काम डा॰ कुँअर बेचैन ने किये है। सुंदरता से एक और मधुबन सजा कर हमारे सामने रख दिया है। चलो आगे देखिये प्राण जी की इस कला के शिल्प का एक नमूना देखते हैं-

 

प्राण दुख आए भले ही जिंदगी में

उम्र भर न डाले डेरा सोचता हूँ।

 

काव्यानुभव में ढलने के लिये रचनाकार को जीवन पथ पर उम्र के मौसमों से गुज़रना होता है और जो अनुभव हासिल होते है उनकी प्राण जी के पास कोई कमी नहीं है। ज़िंदगी की हर राह पर जो देखा, जाना, पहचाना, महसूस किया और फिर परख कर उनको शब्दों के जाल में बुन कर प्रस्तुत किया, उस का अंदाज़ अनोखा देखिये इस शेर में-

 

झोंपड़ी की बात मन करिये अभी

भूखे के मुँह में निवाला चाहिये। ५७

 

हम भी थे अनजान माना आदमियत से मगर

आदमी हमको बनाया आदमी के प्यार ने। ५६ 

 

उनकी शैली उनके चिंतन मनन के वितार से परिचित कराते हुए प्ाण जी के शेर हमें इस कदर अपने विश्वास में लेते हैं कि हमें यकीन करना पड़ता है कि उनकी शाइरी का रंग आने वाली नवोदित कवियों की राहों में अपनी सोच के उजाले भर देगा। लहज़े में सादगी, ख्याल में संजीदगी औ सच्चाइयों के सामने आइना बन कर खड़ा है। हर राज का पर्दा फाश करते हुए प्राण जी के शेर के सिलसिले अब काफिले बन रहे है जो अपने साथ एक पैग़ाम लिये, बिन आहट के खामोशियों के साथ सफर करते हुए अपने मन के गुलशन में उमड़ते हुए भारतीयता के सभी रंग, वहाँ की सभ्यता, संस्कृति, तीज त्यौहार, परिवेश, परंपराओं की जलतरंग से हमारी पहचान कराते चले जा रहे हैं।

     उनका ये ग़ज़ल संग्रह "मैं ग़ज़ल कहता हूँ" - बोलचाल की भाषा में अपने मन के भाव प्रकट करने के इस सलीके से मैं खुद बहुत मुतासिर हुई हूँ और आशा ही नहीं यकीन के साथ कह सकती हूँ कि उनका यह संग्रह लोगों की दिलों में अपना स्थान बनाता रहेगा।

"मेरी राह रौशन करें आज  देवी

यही वो दिये है, यही वो दिये हैं।"-

इन्हीं शुभकामनाओं के साथ जाते जाते उनके कुछ अनुपम शेर उनकी ज़ुबानी सुनते चलें-

 

ए मीत मेरे तू है तो जीवन में रस है

मधु से मस्ती है जैसे मधुशालाओं में।

 

नाहक ही ढूँढ रहे हो तुम सपने में सुख

मिलते हैं कभी क्या मोती भी सहराओं में।

 

रोशनी आए तो कैसे घर में

दिन में भी हर खिड़की पर परदा है प्यारे।

 

ए प्राण रास आयी है किस मन को दुश्मनी

इस संकरी गली से स्वयं को निकालना।


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