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ISSN 2292-9754

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07.07.2016


संगीत सहजवाणी की देवी नागरानी से बातचीत

 
दायें संगीत सहजवाणी, बायें देवी नागरानी
संगीत सहजवाणी जब आपने लिखने के लिये पहली बार क़लम उठाई, उसके तत्कालिक का कारण थे?
देवी नागरानी संगीता जी आपके सवाल ने मुझे अपने उस शुरूवाती दौर से जोड़ दिया है, जहाँ लिखने से मेरा दूर-दूर तक वास्ता न था। बस क़लम उठाई तो हर प्रवीण गृहणी की तरह कभी घर के हिसाब-किताब का जोड़ करने के लिये, तो कभी धोबी को दिये कपड़ों का लेखा-जोखा रखने के लिये। लिखने की पहल शायद मन के भीतर के तहलके का से नजात पाने की कोशिश है, अपनी सोच के मंथन के उपरान्त उपजी छटपटाहट से मुक्ति का साधन। शायद यही एक तत्कालिक कारण है अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने का। कारण। और कई भी हो सकते हैं-मन में दबी भावनाएँ, परिवार व परिवेश का दबाव, पारिवारिक बंधनों के तंग दायरे, ऐसी और कई व्यवस्थाएँ...! पर 1968 में एक अनचाहे हादसे ने तत्काल ही मुझे मन की छटपटाहट से मुक्ति पाने के लिए क़लम उठाने पर मजबूर किया, और यही आगाज़ एक न ख़त्म होने वाली आदत में तब्दील होता चला आया है।
संगीत सहजवाणी लेखन के द्वारा आप क्या हासिल करना चाहती हैं या थीं?
देवी नागरानी मैंने तो अनजाने में ही अपने भावों को भाषा में व्यक्त करने की पहल की थी और आज भी वही कर रही हूँ। हाँ, हासिल करने की बात पर यही कहूँगी कि जीवन के हर कोण में गणित लागू हो, यह ज़रूरी नहीं। पाने और न पाने के बीच की सूक्ष्मता समझना भी मुश्किल है? क़ुदरत हर लेन–देन के हिसाब को संयम से सृष्टि के विधानानुसार सम्पन्न करती है। कुछ हासिल करने की चाह से मैंने नहीं लिखा, हाँ मनोभावों को व्यक्त करने का उपयुक्त साधन ज़रूर समझा और आज इतना जानती हूँ कि शब्दों की रोशनी ने वहाँ उजाला भर दिया है।
संगीत सहजवाणी अपने उद्देश्य / अभिव्यक्ति के लिये लेखन क्यों चुना?
देवी नागरानी  अपने आसपास होती हुई हलचल के प्रवाह को बाँध पाऊँ, कुछ कही-अनकही को ज़बान दे पाऊँ, शायद यही एक कारण रहा हो। लेखन से मन को सतुष्टि मिलती कुछ और से अधिक करने कि चाह ज़िंदा रहती है...बिना किसी दावेदारी के, बिना किसी स्वार्थ के बस संतुष्टि के लिए पर परिपक्वता इस धार को किसी उद्देश्यपूर्ति के लिए भी मोड़ लेती है...यह मैंने अनुवाद की पगडंडी पर चलते हुए शिद्दत से महसूस किया है।
संगीत सहजवाणी आप ग़ज़ल गीत, कविताएँ सभी लिखती हैं- किससे आपको अधिक संतुष्टि अथवा कुल हासिल करने की तसल्ली मिलती है?
देवी नागरानी  लेखन क्रिया एक देन है, यही एक सौगात भी! यह सच है लेखन से मन को सतुष्टि मिलती . पर हर उस ख़ुशी को पाने के प्रयास में हमारा भी कुछ योगदान होना ज़रूरी है। लेखन की हर सिन्फ़ पर मैंने क़लम आज़माई है...गीत, ग़ज़ल, कविता, हाइकु, दोहे, कथा, पर ग़ज़ल मुझे सबसे अधिक प्रिय है। दो पंक्तियों में अपने ख़याल को अभिव्यक्त करना-सरल, सुन्दर व सम्पन्न माध्यम! बस कुछ सलीक़ेदार क़ायदों की परिधि में रहकर, इस आदाब के साथ निबाह, निर्वाह करना अनिवार्य होता है।
मैं तो यही कहूँगी की यह स्थिति, परिस्थिति व समय की देन है। जब तक नन्हा कमसिन बालक अपने पाँवों पर खड़ा होकर अपना पहला क़दम बढ़ाता है, तब वह दिशा को ध्यान में नहीं रखता. बस आगे बढ़ता है। चलते-चलते अपने ही कशमश की उलझन से राह निकाल लेता है। मैं भी समय कि उँगली थामकर आगे बढ़ रही हूँ।
संगीत सहजवाणी लेखन के दौरान आप किस प्रतिक्रिया से गुज़रती हैं? क्या यह दौर सचेतन क्रिया होती है अथवा अचेतन?
देवी नागरानी लिखने के हर दौर में मैंने यह जाना कि ग़ज़ल में छंद-शास्र की परीधियों में जो पांबदी लाज़मी रहती है, और वही दोहे व अन्य काव्य लेखन में भी लागू होती है। गद्य में इसकी छूट होती है। पर हर तरह का लेखन अनुशासन के माँग करता है। शुरू में लिखने की क्रिया अचेतन सी लगी। मन में भाव उठे, काग़ज़ पर उतार लिए। पर लिखते-लिखते एक संयम का भाव उपजने लगा और संयम के साथ जवाबदारी का अहसास भी जागृत होने लगा। यही शायद सचेतन मन की अवस्था हो।
संगीत सहजवाणी क्या आप किसी उद्देश्य को लेकर लिखती हैं?
देवी नागरानी हाँ उद्देश्य को अंजाम देने के लिये एक अर्थपूर्ण चुनाव करने का अहसास जागता रहा कि क्या लिखनl है, क्यों लिखना है यह सवाल मन कुलबुलाने लगा। पिछले चार साल से निरंतर करते हुए लगा कि यह मुझे एक लक्ष्य से जोड़ रहा है। भाषाई आदान-प्रदान में समाज का एक प्रतिरूप हो. क्योंकि जो भी भाव मन में उत्पन्न होते हैं, वे हमारे आस-पास के मंज़रों के प्रतीक होते हैं। जो मैंने, आपने और हर सामाजिक प्राणी ने अपने अपने दौर में देखा, भेगा और जिया वही तो दास्तान बनकर दर्ज होता आया है। लेखक भी अपने परिवेश में रहता है, उससे जुदा नहीं। वह भी घटित घटनाओं की अवस्थाओं का विवरण दर्ज करता है कहीं कहानी के रूप में, कभी लघुकथा के स्वरूप में, कहीं ग़ज़ल के एक शेर में. आगाज़ी दौर लिखी मेरी एक ग़ज़ल का शेर सरल भाषा में मेरी सोच की तजुमानी है –
फ़िक्र क्या, बहर क्या, क्या ग़ज़ल, गीत क्या
में तो शब्दों के मोती सजाती रही...यही शब्द राहों में उजाले बिछा देते हैं।
संगीत सहजवाणी आपने अनुवाद का बहुत कार्य किया है, इस दिशा में कार्य करने का कोई विशेष कारण?
देवी नागरानी हाँ अनुवाद का कार्य एक उद्देश्य की पूर्ति के साथ जुड़ा हुआ है। सन 2012 में मैंने सिन्धी अदब के 20 हस्ताक्षर लेखकों की कहानियों का अनुवाद किया जो उसी साल "और में बड़ी हो गई" नाम से मंज़रे-आम पर आया। उन कहानियों को हिन्दी साहित्य के परिवेश में स्थान हासिल हुआ. समीक्षाएँ लिखी गईं और पत्रिकाओं की ओर से माँग भी होने लगी। मुझे लगा अनुवाद के माध्यम से हिन्द और सिन्ध के अदीबों का पुरातन लिखा हुआ साहित्य हिन्दी लेखन की फ़िज़ाओं में घुल-मिल जाय और राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय स्तर पर सिन्धी साहित्य भी अपनी पहचान पा ले।
संगीत सहजवाणी आपके विचार में आज अनुवाद कितना रेलवन्ट है? क्या उसकी ज़रूरत पहले से अधिक लगती है?
देवी नागरानी एक साधना के रूप में मैंने 4 साल निरंतर अनुवाद किया, जिसमें काव्य, लघुकथाएँ, कहानियाँ दर्ज हुईं। मुझे लगता है अनुवाद एक पुल है जो परिवारों, परिवेशों और भाषाई परिधियों को पार कर सकता है. फिर मेरा ध्यान आकर्षित हुआ सिन्ध (पाकिस्तान) के सिन्धी कहानीकारों की कहानियों की ओर, जहाँ फ़क़त सिन्धी भाषा बोली व पढ़ी, लिखी जाती है। वहाँ का भी साहित्य का एक खज़ाना है जो उस परिवेश के रहवासियों के रहन-सहन, उन पर बीती घटनाओं, दुर्घटनाओं से हमें वाकिफ़ कर सकता है। मेरे अनुवाद करने का विशेष कारण यही है कि हिन्द और सिन्ध के सिन्धी सहित्य को भारत की आज़ाद फ़िज़ाओं में प्रवाहित करना, उन्हें खुली हवाओं में फिर से एक बार वतन से दूर अपने भाई-बंधुओं के हाल से परीचित करवाना! विभाजन का दर्द अब भी नासूर बनकर रगों में रिस रहा है। उस विभीषण दौर की परिभाषा उन कथाओं के अनूदित कार्य से हिन्दी में संग्रहित रहे और आने वाली नौजवान सिंधी पीढ़ी को विरासत में मिले। अपने माज़ी से जुड़ने का उस दर्द की छटपटाहट को महसूस करने का यह एक साधन था, जो मेरी राहों को रोशन करता रहता है। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिये सिन्ध के विश्वविद्यालय के कार्यरत हस्ताक्षर अदीक मेरी दुशवारियों को आसानियों में तब्दील करते रहे, कहानियों के माध्यम से कहानीकारों से परिचय बढ़ा, जानकारी पाने के साधन नेट ने और आसान कर दिये। इन प्रयासों के एवज़ अनूदित कहानियों के अनुवाद के कुल छः संग्रह प्रकाशित हुए है - पन्द्रह सिन्धी कहानियाँ (2014) सरहदों की कहानियाँ (2015), सिन्धी कहानियाँ (2015), दर्द के एक गाथा (2015), अपने ही घर में (2015)। मैंने हिन्दी और अंग्रेज़ी काव्य का सिन्धी अनुवाद “रूहानी राह के पथिक" (2014) , और प्रांतीय भाषाओं का सौंदर्य-सिन्धी काव्य का हिन्दी अनुवाद किया है जो बोधि प्रकाशन की ओर से 2015 तक सामने आ रहा है।
संगीत सहजवाणी आपने लघुकथाएँ भी काफ़ी संख्या में लिखी हैं, इस ओर मुड़ने का कोई विशेष कारण या उद्देश्य?
देवी नागरानी लघुकथाएँ आज के वक़्त की ज़रूरत है और माँग भी. एक सदेशात्मक संकेत से एक कथा लघुकथा के स्वरूप में ढल जाती है. कुछ पंक्तियों में कथा का तत्व लघुकथा में समोहित हो जाता है। एक कथा का अंश इस संदर्भ में देखिये--- एक गोरे ने दूसरे काले से कहा – "अगर तुम्हें अमेरिका का प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिले तो तुम सबसे पहले क्या करना चाहोगे?" काले ने तत्परता से अपना निर्णय सुनाते हुए कहा "मैं सबसे पहले वाइट हाऊस को काले रंग से पुतवाऊँगा!" यह उसके मन की भड़ास थी जो चंद शब्दों में व्यक्त हुई! थोड़े शब्दों में अपनी बात सामने रखना भी एक कला है और लघुकथा एक कलात्मक अभिव्यक्त का माध्यम, जो पाठक थोड़े समय में पढ़ पाता है. यह अत्यंत सुविधाजनक, स्थिति पैदा करती है। आदमी बिना थके, कुछ पल में लघुकथा पढ़ पता है। मैं भी अपने आस-पास की सुनी-देखी वारदात को लघुकथा में बुन लेती हूँ - चाहे वह छ: लाइन में हो या दस में! लघुकथा में भी कथा का अंश हो, संकेतात्मक संदेश यह बहुत ज़रूरी है। इस दिशा में हिन्दी साहित्यकारों की लघुकथाओं का सिंधी अनुवाद “बर्फ़ की गरमाइश” 2014 में प्रकाशित हुआ है।
संगीत सहजवाणी मुझे लगता है ग़ज़ल आपके दिल का करार है, इसके बारे में कुछ बताइए!
देवी नागरानी संगीता जी आपने मेरी दुखती रग पर हाथ धर दिया है - वाकई में ग़ज़ल मेरी सहेली है मेरी हमजोली है। अपने मन में उठे हर ख़याल को एक शेर की दो पंक्तियों में बुन लेती हूं, जो कभी किसी संपूर्ण गज‌ल का हिस्सा होता है कभी उन्मुक्त शेर। मैंने एक ग़ज़ल में 'ग़ज़ल' लफ़्ज़ को रदीफ़ बनाया - और ग़ज़ल का मतला बनाते हुए लिखा—
अनबुझी प्यास रुह की है ग़ज़ल / ख़ुश्क होंठों की तिश्नगी है ग़ज़ल
छंद के नियमानुसार ग़ज़ल एक मीटर में लयबद्ध हो जाती है। ग़ज़ल में काफ़िया और रदीफ़ क़ायम रखने की ज़रूरत पड़ती है। जैसे इस ग़ज़ल का मीटर है फाइलातुन मुफाइलुन, फैलुन –ग़ज़ल का हर मिसरा इसी स्वरूप में अपना आकार पाता है। अनेक मीटर है, हरेक को छंदानुसार परिधियों में बाँधना पड़ता है। यह विधा मुझे अत्यन्त प्यारी है, मैं अब भी इसका मोह नहीं त्याग पाई हूँ। बस अनुवाद के चक्रव्यूह से इस साल निकलते ही अपनी दुनिया में लौटना चाहती हूँ जहाँ ग़ज़ल मेरा इंतज़ार कर रही है।
संगीत सहजवाणी  अपने जीवन के वो क्षण जब आप रचना करने पर विवश महसूस करती हों?
देवी नागरानी संगीता जी, एक ऐसी ही जीवन को झकझोरने वाली घटना ने मेरे भीतर के सुप्त क़लमकार को जगाया। 1968 में छोटी बहन की शादी में हम हैदराबाद से नागपुर गये। सुबह पहुँचे, शाम को शादी संम्पन्न हुई, रात को विदाई! हमारे पिताजी ने ख़ुशी के साथ रस्म के तौर तरीक़े सम्पन्न करते हुए बेटी के सर पर चादर डालकर रात के बारह बजे उसे विदा किया और अपने स्थल पर आए। रात एक बजे पिताजी ने अंतिम साँस ली। कारण जानलेवा हार्ट अटैक! दर्द से मेरा पहला परिचय... लम्बी गाथा है - शायद दर्द ही जीवन में एक सम्पूर्णता भर देता है | बस दूसरी सुबह वापसी के लिये हैदराबाद के लिये गाड़ी पकड़ी, 18 घंटे का सफ़र था और साथ में सन्नाटे भरी ख़ामोशी सभी के होठों से चिपकी हुई! इस लंबे सफ़र में मौन की घुटन मेरे भीतर तहलका मचाती रही, विचार मंथन सफ़र में साथ रहा, बहन की शादी -एक सुहागन बनी और एक ने अपना सुहाग खोया। उफ़! विधि का अनोखा विधान, यह एक अनसुलझी गुथी थी मेरे लिए.... एक जिया हुआ, एक भोगा हुआ सच!
संगीत सहजवाणी साहित्य-रचना और व्यक्तिगत जीवन का तालमेल? अथवा कोई और स्थिति?
देवी नागरानी साहित्य रचना और व्यक्ति जीवन का आपस में गहरा संबंध है। परिवेश में रहते हुए इन्सान अनुभूतियों से खाली नहीं होता। अपने भीतर में धधकते विचारों की भँवर से मुक्ति पाने की संभावना तलाशता है, जिससे मन की घुटन रिहाई पा सके। छटपटाहट से छुटकारा पाने के एक नहीं अनेक माध्यम हैं, जो अलग अलग स्थितियों के लिये मरहम साबित होते हैं। ऊपर बताई स्थिति में मैंने ट्रेन में बैठे-बैठ न जाने उस उन चुभते ख़ामोश पलों को कुछ चौपाइयों के रूप में क़लमबंध किया। यह लिखने का मेरा पहला अवसर रहा।
जीवन, परिवेश, समाज- इनसे जुड़ा हुआ आदमी भी उसी दायरे में सोचता है, जीता है, भोगता है.... अलग-अकेले रहना मुमकिन नहीं है। शायद इसी लिए साहित्य-रचना और व्यक्तिगत जीवन का तालमेल सामान्य रूप में बना रहता है, और वही एक लेखक को भीतर और बाहर की दुनिया से जोड़े रखता है।
संगीत सहजवाणी लिखते तो बहुत हैं-छपते भी बहुत हैं, आपके लेखन का प्रकाशन, आपका प्रवासी लेखन का तमगा, आपका उर्दू से हिन्दी, हिन्दी से सिन्धी, सिन्धी से हिन्दी साहित्य का प्रकाशन, गज़ल, गीत, कविता, कहानियाँ, लघुकथाएँ, इन सब के बारे में कुल मिलाकर क्या कहना चाहेंगी?
देवी नागरानी  मेरा पहला प्यार मेरी मातृभाषा सिन्धी है। हालाँकि सिन्धी लिखना मैंने सीनियर सिटिज़न बनने के बाद सीखा। मेरा दूसरा प्रेम है राष्ट्रभाषा हिन्दी जो मुझे राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर जोड़ती है। आज प्रवास में हिन्दी का बोलबाला है, जो यहाँ अमेरिका में अपने परचम फहरा रही है। उर्दू स्क्रिप्ट सिन्धी से मिलती जुलती है, शायद इसी कारण उसे पढ़ पाना मेरे लिए आसान था। इन भाषाओं के परिदृश्य में अनुवाद करने में इन की सकारात्मकता सामने आई। अनुवाद करने मुझे हमेशा संतुष्टि मिली है।
यह सच है मैंने ग़ज़ल, गीत, कविता, कहानियाँ, लघुकथाएँ, हाइकु, दोहे, अंग्रेज़ी काव्य सभी पर क़लम चलाई है- क्या कहूँ, क्यों करती हूँ, बस वक़्त की सुविधाजनक आज़ादी और क़लम की रवानी तय करती चली जाती है और मैं उस रौ में तैरती रहती हूँ, दिल की दुनिया में खो जाती हूँ...उस रौ में ही लिखा होगा यह शेर..., शायद यही अवस्था होगी।
सोच की शम्अ बुझ गई 'देवी'/ दिल की दुनियां में डूब कर देखो
संगीत सहजवाणी आप नेट पर भी काफ़ी सक्रिय हैं, आपको लगता है कि नेट पर छपना पुस्तकें छापने का स्थान ले सकता है? या यह केवल अधिक पाठकों तक पहुँचने का ज़रिया है? या यह लेखन को किसी प्रकार की सुविधाजनक स्थिति देता है?
देवी नागरानी संगीता जी, दोनों में कोई समानता है, ऐसा बिलकुल भी नहीं है। नेट पर छपना अक्सर बहुत लोगों तक पहुँच पाने का सरल साधन है। पर यह सुविधा कितनों को उपलब्ध होती है। महानगरों, शहरों को छोड़कर, अन्य व्यवस्थाओं की दशा कहाँ समान है? कहीं बिजली नहीं, कहीं कम्प्यूटर नहीं, कहीं उस तकनीक का ज्ञान नहीं। नेट पर प्रकाशन पुस्तक का स्थान तो कतई न ले पायेगा। पुस्तक एक स्थापित पहचान की देन है और सुधि पाठकों तक पहुँचने और जुड़े रहने की एक ठोस ज़मीन।
हाँ लेखन को नेट पर बेपनाह सुविधाएँ हासिल हैं। अपना ब्लॉग बनाया, अपना लेखन वहीं सँजोया, उसे बाँटना न बाँटना ख़ुद पर निर्भर है। अब इस तकनीकी युग ने क्या-क्या दिया है और क्या-क्या छीना है इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हम कार्यालयों में, घरों में, ट्रेनों में, होटलों में नज़र घुमाते ही जान जाते है। बस नई पीढ़ी पर नया रंग चढ़ा हुआ है...सुविधाओं के साथ असुविधाएँ, शोर के साथ ख़ामोशी, भीड़ में तन्हाई ... पर उस हर बदलाव को स्वीकारना हमारी नियति है, शायद क़दम से क़दम मिलकर चलने का प्रयास....सफल-असफल व्यक्तिगत पहलू है...!
संगीत सहजवाणी पने विषय में यदि कुछ विशेष बताना चाहें, जिसने आपके लेखन को घर ही हो .. या कोई अविस्मरणीय आस्था जिसने आपके लेखन को धार दी हो?
देवी नागरानी लेखन के जिस पहलू ने मुझे सम्पूर्ण संतोष दिया है वह है अनुवाद! जो मैंने पिछले चार सालों में किया है...! इसके पीछे भी मूल कारण रहा- मेरा सिन्धी भाषा से प्रेम। विभाजन ने सिन्धी क़ौम को बाँटा ही नहीं, उसे बिना प्रांत पुनः निर्माण के लिए के छोड़ दिया। उस कश्मकश में धँसी कश्ती में मैं भी सवार थी और हूँ। भारत में बसे निर्वासित लोग अपने भाषा तक के लिए कुछ न कर पाये, बस अपनी जीविका के हर दिन के मसाइल को जी जान से सुलझाने में जुट गए। इसी एवज़ आज की पीढ़ी सिन्धी भाषा से, उसकी लिपि से, उसके पुरातन साहित्य से महरूम है। अनुवाद का मूल कारण भी यही है कि सिन्धी साहित्य आज के और आने वाली सिन्धी नौजवान पीढ़ी को विरासत के रूप में मिले। कभी भूले-भटके से ही अंतराष्ट्रीय भाषा हिन्दी में अनुवाद के तौर उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ दे। अनुवाद ही वह सेतु है जो साहित्यिक आदान-प्रदान, भावनात्मक एकात्मकता, भाषा समृद्धि, तुलनात्मक अध्ययन तथा राष्ट्रीय सौमनस्य की संकल्पनाओं को साकार कर हमें वृहत्तर साहित्य-जगत् से जोड़ता है।

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