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ISSN 2292-9754

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06.28.2014


जो ग़म मिला वफ़ा का

जो ग़म मिला वफ़ा का वो इनआम है रफीक़
क्या रञ्ज? इश्क़ का यही अंजाम है रफीक

वहशत पसंद लोग इसे समझेंगे किस तरह
मेरे लबों पे अम्न का पैग़ाम है रफीक़

बाज़ार तो नहीं ये अदालत है हिन्द की
ईमान का सभी के यहाँ दाम है रफीक़

तारी हमारे पे है हक़गोई का जुनून
कटना हमारा सर भी सरेआम है रफीक़

हो मैकदे की या मिरे जीवन की शाम 'देव'
दोनो का अपना अपना अलग नाम है रफीक़


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