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ISSN 2292-9754

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12.28.2014


झील समंदर दरिया हैं

झील समंदर दरिया हैं इन आँखों की गहराई में
अश्क़ हुए हमसफ़र हमारे, रातों की तनहाई में

जंगल पेड़ पहाड़ नदी पर बुरी नज़र के साए हैं
सदियाँ कई लगेंगी अब तो इन सब की भरपाई में

सुख संतोष प्रेम के पाहुन की अगवानी कौन करे?
डूब गया इंसान मूँद कर आँखें कपट कमाई में

बात बतकही नाते रिश्ते प्यार वफ़ा अब लगते हैं
जाग उठे ज्यों पीर पुरानी बहकी सी पुरवाई में

कितना कुछ गुम हुआ यहाँ इस कंक्रीट के जंगल में
कितना कुछ रह गया गाँव की घनी घनी अमराई में

ज़िंदा रहने की सारी वज़हें महफूज़ वहीं पर हैं
अपनेपन की कोख जनी उस प्रेम पगी गरमाई में


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