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ISSN 2292-9754

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09.02.2014


‘हथेलियों में सूरज’
बहुआयामी कविताओं की कवयित्री.........

प्रकाशक- नव्या प्रकाशन, सुरेंद्रनगर, गुजरात;
पृ.संख्या- १२०;
मूल्य- १५०/-मात्र।
ईमेल- pankaj।trivedi2007@gmail.com
समीक्षक- डॉ.(प्रो.) दीप्ति गुप्ता
पुणे (महाराष्ट्र)

मंजु जी की कविताओं को पढ़ना अपने आप में एक सुखद एहसास है। उनकी कविताओं की विशेषताओं को भूमिका के दो शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। क्योंकि वे मात्र भावनाओं और संवेदनाओं तक ही सीमित नहीं होती, अपितु उनमें जीवन के गंभीर मुद्दे, सामजिक सरोकार भी समाए होते हैं! नारी-विमर्श और भ्रूण हत्या जैसे विशद और गंभीर विषयों पर संवेदनशीलता से कलम चलाना कोई आसान काम

डॉ. (प्रो.) दीप्ति गुप्ता
पुणे (महाराष्ट्र)
नहीं, लेकिन मंजु जी ने उन्हें बखूबी अपनी कविताओं में पिरोया है।

वे जब लिखती हैं तो लगता है कि वे कविता को पूरी तरह जीती हैं, तभी उनकी लेखनी से निकली ऐसी पंक्तियाँ मन को भिगो जाती है-

‘यह ज़िन्दगी’
पीर के चीर में लिपटी रही यह ज़िन्दगी।
कैसे कहूं, कितनी बेबस रही यह ज़िन्दगी।
चाहती रही ता-उम्र मैं तख्लियाए ज़िन्दगी,
गर्दिशों के दायरों में घिरती रही यह ज़िन्दगी।

‘फितरत’ में वे कितनी सहजता से प्रकृति से जीने का ढंग सीखती है –

मैंने पूछा,”मैं करूँ क्या?
कैसे जियूं इस संसार में?”
कहा पवन ने मुझसे,
”उलटी बहो, जैसे मैं बहती हूँ आजकल.......,
तालाब ने कहा, “मेरी तरह दायरे में रहो,
हाँ, जल कुम्भियाँ,
ज़रूर तुम पर छाने की कोशिश करेंगी,"
नदी ने कहा, “धीमे बहो, जैसे हम
बह रही हैं, गन्दगी को दर किनार करके ।”
सागर बोला, “मेरी तरह बन जाओ,
हवा के साथ अपने में जोश लाओ,

सुंदर अंदाज़ में कही गई बातें दिल पर सीधे असर करती हैं। पाठक उनसे एकात्म हो उनका ही हो जाता है। इस असर का एक कारण और भी है, वह यह कि मंजु जी के ‘शब्द-संयोजन’ का भावों और संवेदनाओं के अनुरूप होना। सटीक शब्दों के लिबास में कविता स्वत: ही जानदार और शानदार हो जाती है। उनके पास भावानुरूप शब्दों का अमिट भंडार है।

जब संवेगों और संवेदनाओं की बात आती है तो मंजु जी मानो खुद एक संवेदना बन जाती हैं। ‘तुम क्या जानो?’ कविता में वेदना की उमड़न हर लफ्ज़ में साफ़ नज़र आती है -

“कितने आँसू तुम बिन खोए ,
कितने आँसू सुधि पर बोए’
तुम क्या जानो?
सीने की धड़कन से पूछो,
रूककर कितने श्वास गिने हैं?
नयनों की पलकों से पूछो,
कितनी रैनें जाग बिताई?”

इनकी लगभग सभी कविताएँ पाठक से रु—ब-रू हो कभी जीवन की सरल और भोली बातें, तो कभी गंभीर बातें करती उसे अपना बना लेती हैं। साथ ही कविताएँ बहुआयामी होने के कारण बड़ी प्रासंगिक भी हैं। जिन रचनाओं में मंजु जी ने प्रतीकों के माध्यम से तंज किए हैं, वे बहुत गहरे वार करते हैं, कहीं वे पल-छिन बदलते मानव-स्वभाव का ख़ुलासा करते हैं, तो कहीं समाज की विषमताओं की ओर संकेत करते हैं तथा पाठक को सोचने के लिए अनेक प्रश्न थमा देते हैं।

जिस कविता पर इस संकलन का शीर्षक है – ‘हथेलियों मे सूरज’ वह कविता हम सबके दिल की आवाज़ है। उसमें जिस ओजस्विता से नारी देह पर अक्सर नज़रें गड़ाने वाले ‘गिद्धों’ को व समाज में तरह-तरह की भ्रष्टाचार के बीज बोने वाले मानवता के, समाज के और देश के द्रोहियों को चेतावनी के स्वर में अपने ‘हथेलियों के नन्हे सूरज’ से भस्म करने देने की बात कही है - वह निश्चित ही पाठक को आश्वस्त करती हैं और नकारात्मकता को मिटा देने के लिए प्रेरित करती हैं।

‘पतंग’ कविता नही, अपितु सदियों से चली आ रही, नारी की ज्यों की त्यों स्थिति का; भावों व विचारों के कैनवस पर सार्थक तर्कों की तूलिका से उकेरा हुआ एक ऐसा प्रभावशाली ख़ूबसूरत चित्र है, जो पाठक के दिल में खुद-ब-खुद सिमट जाता और हमेशा के लिए अपनी जगह बना लेता है | निम्नलिखित पंक्तियों के तेवर के तो क्या कहने.........!!! बहुत खूब और बहुत ही खूब!

“जब चाहो तनी रखो,
जब चाहे ढील डाल दो
और नचाते रहो अपनी उंगलियों से
फिर अपना वर्चस्व जताने की होड़ में,
काट दोगे अन्य की पतंग को,
या कटवा दोगे मुझे
और रह जाऊँगी लटकी अधर में,
मैं त्रिश्ंकु सी|
तुम भी रह जाओगे मलते हाथ।”

निरुत्तर करके, जायज़ तेवर दिखा कर, सुकोमल मानस और आहत हृदया नारी अपने ही प्रश्न के उत्तर में, कितनी खूबसूरती से सुलझे हुए तरल सुझाव भी देती है - जिससे उसका जीवन गरल होने से बच सके –

“रहने दो मुझे,
एक स्वतंत्र पंछी के मानिन्द,
मैं वैसे ही,
तुम्हारे प्यार की डोर से
बन्धी,
तुम्हारी हथेलियों पर
चुग्गा चुगने चली आऊँगी,
बिन लपेटे ही लिपटी रहूंगी,
तुम्हारे प्यार की चरखी से।
नाचती रहूँगी ,फुदकती रहूंगी,
तुम्हारी सशक्त बाजूओं पर।
दूंगी एक ठहराव,
अपना अंक,
जहाँ रख कर,
अपना सर,
ले सकोगे तुम सुकून की नींद।”

नारी स्वभाव की इस उदारता, मन की इस सुकुमारता को काश! एकाधिकार, शासनाधिकार की कुंठित भावना से ग्रस्त पुरुष खुले दिल से समझे, तो चहुँ दिशी सुख ही सुख बरसने लगे और नारी-विमर्श भी बंद हो जाए दोनों प्रेम से एक दूसरे के सहचर बन कर रह सके!! अभिज्ञानशाकुन्तलम, कामायनी, दुखवा मो कासे कहूँ मोरी सजनी... ये तमाम रचनाएँ परोक्ष और अपरोक्ष रूप से इसी सुन्दर सन्देश की वाहक हैं।

मंजु जी की काव्य-प्रतिभा की जितनी भी सराहना की जाए कम है। मेरी शुभकामना और दुआ है कि उनकी लेखनी इसी तरह निर्बाध चलती रहे, वे काव्य क्षेत्र में भरपूर समय और क्षमता के साथ सक्रिय रहें और हम सबको अपनी सार्थक, सुन्दर एवं सलोनी कविताओं से कृतार्थ करती रहें।

अशेष सराहना के साथ
डॉ.दीप्ति गुप्ता,
(पू.प्रो.)हिन्दी विभाग, पुणे विश्वविद्यालय
एवं (पूर्व) ‘सहायक शिक्षा सलाहकार’
मानव संसाधन विकास मंत्रालय’, नई दिल्ली
मो: 09890633582
drdeepti25@yahoo.co.in


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