अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.03.2016


एक बार रुख़े रोशन से ये चिलमन उठा कर देखिए

पत्थरों के बुत में ख़ुद ही मुब्दिला हो जाएँगे
एक बार रुख़े रोशन से ये चिलमन उठा कर देखिए

जिल उट्ठेंगीं फ़िर मेरी मजरूह हर एक ख़्वाहिशें
इन शबनमी होंठों से मुझको गुनगुना कर देखिए

इस अन्जुमन में लाजवाब न हो तेरी ये गुफ़्तगू
अपनी निगाहों की जुबान हमको सिखा कर देखिए

ले चश्मे-आब ऐ महतब क्यों देखता ओझल मुझे
इन गूँगी चीखों कि सदा सबको सुनाकर देखिए

एक बार रुख़े रोशन से ये चिलमन उठा कर देखिए


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें