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ISSN 2292-9754

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01.19.2016


रघुवीर सहाय की कविता में राजनीतिक व्यंग्य

भारतीय समाज में राजनीति का बहु-आयामी महत्व है। समाज और साहित्य का विकास भी समकालीन राजनीतिक परिस्थितियों से होता रहा है। यथार्थ है कि तात्कालिक राजनीतिक परिस्थितियाँ साहित्य को काफी प्रभावित करती है। रघुवीर सहाय राजनीतिज्ञ नहीं थे और न ही किसी विचारधारा सिद्धान्त, वाद या दल विशेष से जुड़े हुए थे, फिर भी समकालीन राजनीति से मुक्त नहीं थे। उन्होंने समकालीन राजनीतिक परिवेश की विसंगतियों, विद्रूपताओं को आक्रोश के साथ-साथ व्यंग्यात्मक रूप में काव्याभिव्यक्ति दी है।

रघुवीर सहाय ने अपने काव्य में नेताओं की मानसिकता एवं राष्ट्र के सही हालातों का वर्णन किया है। अधिकांश सत्ताधारी लोग स्वार्थसिद्धि में लगे हुए है, जनता को क्षेत्रवाद, जातिवाद, धर्मवाद आदि में फँसाकर खुद की कुर्सी की साधना कर रहे हैं। कुर्सी की सेवा करना नेताओं का अधिकार बन गया है। ये वृद्ध होने पर भी शिशुओं की तरह कुर्सी के लिए लड़ते रहते हैं। ऐसे में कवि संसद सदस्यों के चरित्र को बेनकाब करता हुआ कहता है-

”सिहासन ऊँचा है, सभाध्यक्ष छोटा है
अगणित पिताओं के
एक परिवार के
मुँह बाए बैठे हैं लड़के सरकार के
लूले, काने, बहरे विविध प्रकार के
हल्की-सी दुर्गन्ध से भर गया है सभाकक्ष
सुनो वहाँ कहता है
मेरी हत्या की करुण गाथा
हँसती है सभा, तोंद मटका
ठठाकर
अकेले पराजित सदस्य की व्यथा पर”1

संसद सदस्यों को ‘लूले’, ‘काने’, व ‘बहरे’ कहकर कवि ने लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था पर तीक्ष्ण व्यंग्य किया है। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में संसद का महत्वपूर्ण स्थान होता है, लेकिन वर्तमान में संसद के प्रतिनिधि दायित्वहीन है, भ्रष्ट है, अपने चूल्हों में अलाव जलाने को मस्त है। राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य को गौण कर व्यक्ति परिप्रेक्ष्य को महत्व दे रहे हैं। कवि रघुवीर सहाय महसूस करते हैं कि इनका कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं है, यदि कोई चीज़ स्थायी है तो वह उनके व्यक्तिगत स्वार्थ है, जिनकी ये साधना कर रहे हैं। इनकी कथनी और करनी में व्यापक अन्तर है। इसीलिए कवि संसद सदस्यों पर व्यंग्य करते हुए कहता है-

 का नाम सुन देश प्रेम के मारे
मेजें बजाते हैं
सभासद भद-भद भद कोई नहीं हो सकती
राष्ट्र की
संसद एक मंदिर है जहां किसी को द्रोही कहा नहीं
जा सकता
दूध दिए, मुँह पोंछे आ बैठे जीवनदानी गोंद
दानी सदस्य तोंद सम्मुख धर
बोले कविता में देश प्रेम लाना हरियाणा प्रेम लाना
आइस-क्रीम लाना है।”2

आजादी के बाद सामाजिक समता, आर्थिक खुषहाली और राजनीतिक खुषहाली की जगह भ्रष्टाचार की घोर निराषा ने समकालीन मनुष्य की संवेदना को झकझोर दिया है। आम आदमी ने सत्ता की कुव्यवस्था का सामना किया है। रघुवीर सहाय की ‘लोकतंत्रीय मृत्यु’ कविता आजादी के बाद की पंगु शासन व्यवस्था पर व्यंग्य करती है-

के भीतर एक थुलथुल राजनीतिक देह में
जो भी गतिषील है, अपनी ओर से जीने के लिए लड़ता है।
अपराधी- से आते हैं राज्यपाल मुख्यमंत्री विधायक
बख्शे हुये से जाते हैं
और एक बहुत बड़े पिंजड़े में जोर से चीख मारता है एक मोटा सुग्गा
जैसे उसी में राजा की जान हो
राजा मरेगा बजेगा इतिहास में नगाड़ा
पर यहां कुछ भी सुनायी न देगा मैदान में
सचिव जी देंगे जब लिखकर के सूचना
कहेंगे कि तोता गुजर गया हमारी जान में”3

राजनेताओं की व्यवस्था विरोधी नीतियों ने जनता को छला है। चुनावी शंखनाद में ये नेता बड़े-बड़े वायदांे से जनता को स्वप्न दिखाते हैं किन्तु सत्ता प्राप्ति उपरान्त हर बार स्वप्नों को लूटते ही है। नेताओं के झुठे आष्वासनों पर कवि व्यंग्य करता हुआ ‘राष्ट्रीय प्रतिज्ञा’ कविता में कहता है-

”हमने बहुत किया है
हम फिर से बहुत करेंगे
हमने बहुत किया है
पर अब हम नहीं कहेंगे
कि अब क्या और करेंगे
और हमसे लोग अगर कहेंगे कुछ करने को
तो वह तो कभी नहीं करेंगे।”4

वर्तमान राजनीति में दलबन्दी हावी है। इस दलबन्दी राजनीति में नेता दल व झण्डे बदल-बदल कर अपनी कुर्सी बचाये रखते हैं, यही उनका उद्देष्य होता है। कवि मानता है कि दल-बदलू व झण्डा-बदलू नेता सुमुन्नत शासन व्यवस्था कभी नहीं दे सकते हैं क्योंकि उनके चरित्र एवं सिद्धान्तों में स्थायीत्व नहीं होता है। ऐसे नेताओं की छत्रछाया में आम जनता हमेषा छली जाती है, उसका शोषण होता है और पिछलग्गु लोगों के हित साधे जाते हैं। इसीलिए कवि राजनीतिक दलों की बढ़ती संख्या से देष को खतरे में देखता है-

”दल का दल
पाप छिपा रखने के लिए एक जुट होगा
जितना बड़ा दल होगा उतना ही
खाएगा देष को।”5

देष को खाने जैसे शब्दों में कवि का नेताओं के प्रति आक्रोष है। रघुवीर सहाय राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार की तह तक जाते है और इससे पीड़ित जनता के प्रति हमदर्दी व्यक्त करते हैं। ‘आपकी हंसी’ शीर्षक कविता इसी स्थिति का यथार्थ है-

”निर्धन जनता का शोषण है
कहकर आप हँसें
लोकतंत्र का अंतिम क्षण है
कहकर आप हँसें
सब के भ्रष्टाचारी
कहकर आप हँसे, चारों ओर बड़ी लाचारी कहकर आप हँसे
कितने आप सुरक्षित होंगे
मैं सोचने लगा
सहसा मुझे अकेला पाकर आप हँसे।”6

कवि भ्रष्ट व स्वार्थी नेताओं से जुड़े विभिन्न यथार्थों को उद्घाटित करते हुए, देष की जनता को ऐसे वसन्त पूजकों से सावचेत करता है। जनता द्वारा अत्याचार सहने की चुप्पी पर कवि कटाक्ष करता है। उनकी कविता अन्याय के विरूद्ध आवाज़ उठाने वाली है। कवि की चिन्ता है कि यदि हम सब कुछ ऐसे ही सहन करते रहे तो एक दिन वापस गुलाम हो जायेंगे-

”आज यही कफन ढके चेहरे हैं एक साथ रहने के
बचे खुचे कुछ प्रमाण और इन्हें जो याद रख नहीं सकते हैं
वे ही समाज पर राज कर रहे हैं
चेहरे के बिना लोग
कल किसी और बड़े देष के गुलाम हो जायेंगे।”7

इस प्रकार रघुवीर सहाय ने अपने काव्य में राजनीतिक व्यंग्य को प्रमुख आधार बनाया है। राजनीति में अवसरवादिता, गुटबंदी, दलबंदी, झण्डा-बदलू प्रवृति, नेताओं की व्यभिचारिता व स्वार्थसाधना, राजनीतिक मूल्यों की गिरावट, राजनीति और पूँजी के गठबंधन, भ्रष्टाचार आदि पर कवि ने सरकंडे की कलम से कटाक्ष किया है। “देश की वि्शाल जनता पर मुट्ठी भर लोगों द्वारा किया जाने वाला अन्याय रघुवीर सहाय की कविताओं का बार-बार काव्य विषय बनता है। वे इस अन्याय के विभिन्न प्रकारों को विस्तार से अपनी कविता में सामने लाते हैं।”8 उनकी कविता राजनीतिक व्यवस्था के खोखले ढाँचे का पर्दाफ़ाष करने का श्लाघनीय प्रयास करती है। वे देश में एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था देखना चाहते हैं। इसी दिशा में उनकी कविता साफ शब्दों में नेताओं के चरित्र को बेनकाब क

सन्दर्भ

रते हुए, देष में जन-चेतना का बीजारोपण करती है।

1. आत्महत्या के विरुद्ध, रघुवीर सहाय, तृ. सं. सन् 1985, पृ. 18
2. वही, पृ. 28
3. वही, पृ. 36
4. हँसो- हँसो जल्दी हँसो, रघुवीर सहाय, प्र. स. 1985, पृ. 57
5. आत्महत्या के विरुद्ध, रघुवीर सहाय, तृ. सं. सन् 1985, पृ. 78
6. हँसो- हँसो जल्दी हँसो, रघुवीर सहाय, प्र. स. 1985, पृ. 16
7. लोग भूल गये हैं, रघुवीर सहाय, तृ. सं. 1989, पृ. 103
8. नयी कविता और रघुवीर सहाय का काव्य, डॉ. अजिता तिवारी, प्र. सं. 2010, पृ. 171

दयाराम
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