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ISSN 2292-9754

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10.02.2016


बिहार के लोकगीतों में नारी संवेदना का स्वर

लोकगीत सामान्य लोगों का वह संवेदनात्मक स्वर है, जिसके अन्दर उनकी संस्कृति, सभ्यता, आस्था, विश्वास, हर्ष-विषाद आदि की झंकृति विद्यमान रहती है। इसलिए किसी भी क्षेत्र के मानव जन-जीवन की वास्तविक स्थिति जानने के लिए वहाँ के लोकगीतों का अध्ययन-विश्लेषण बहुत ही महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

बिहार के लेकगीतों के अध्ययन से यह पता चलता है कि इनमें मुख्यतः नारी-भावनाओं एवं नारी-समस्याओं का चित्रण हुआ है। इसका प्रधान कारण यह है कि लोकगीत अधिकांशतः नारियों के पास ही सुरक्षित हैं। वे ही इन्हें जीवित, प्राणवंत एवं मुखर बनाए रहती हैं। वे ही इन्हें विभिन्न अवसरों पर अपने कोमल कंठों से गाती रही हैं। अतएव यह स्वाभाविक है कि नारियों द्वारा सुरक्षित एवं प्रयुक्त लोकगीतों में उनकी अंतरात्मा की आवाज़, भावनाएँ एवं समस्याएँ फूट पड़ी हैं। नारी का संपूर्ण जीवन ही गीतमय होता है। वे प्रसन्नता के आवेग में भी गीत गाती हैं और दुःख की घड़ी में भी। लोकगीत में प्रचलित सोहर, मुंडन, जनेऊ, विवाह, गौना, झूमर, कजली, होली, छठीमाता, श्यामा-चकेवा, बारहमासा, चैती, जाँता, रोपनी, सोहनी आदि से संबंधित लगभग सारे गीत नारियों के द्वारा ही गाए जाते हैं। फलस्वरूप, इन गीतों में कहीं उनकी हीन सामाजिक स्थिति, कहीं विवाह न होने और दहेज की समस्या, कहीं उनके साथ सास, ननद, देवर आदि का निष्ठुर व्यवहार, कहीं पति की उपेक्षा और वियोग दुःख, कहीं ईश्वर से करुणा विगलित पुकार आदि भावनाएँ फूट पड़ी हैं। दहेज के कारण समाज में नारी के प्रति कितना उपेक्षा भाव है- इसे निम्नांकित उदाहरण में देखा जा सकता है-

गईया-भहिसिया बेटी हे द्वारक शृंगार थिके
तहूँ बेटी जीव के जंजाल थिकह है।
एहन समाज पर बज्जर खसेवै,
तिलक प्रथा पर अगिया लगैवे।

पुत्री विवाह की पेरशानी पिता को सताती है ही, साथ ही, संपूर्ण परिवार भी आर्थिक विपन्नता को झेलती है। सच मायने में हमारे पुरुष प्रधान समाज में नारियों को बहुत दुःख झेलना पड़ता है। जन्म से उसकी उपेक्षा की जाती है। पुत्री पैदा होते ही सारा परिवार दुःखी हो जाता है। युवावस्था के आते-आते माता-पिता को उनके विवाह की चिंता सताती है और कई बार उनके आक्रोश को झेलना पड़ता है उस अबोध बालिका को। साथ ही, पुरुषों की भोगवादी या वासनात्मक दृष्टि भी उसे पेरशान किए रहती है।

परिणामतः वह अजीव कुंठा एवं संत्रास को भोगती रहती हैं। पेरशान होकर उसे कभी ऐसे परिवार में ढकेल दिया जाता है, जहाँ सुख सपना हो जाता है। अपने माता-पिता, भाई-बहन से बिछुड़ने का दुःख अभी भुला भी नहीं पाती है कि सास-ननद के विष-वाण से देह छलनी होने लगती है। आर्थिक पेरशानी से विवश होकर यदि पति नौकरी करने परदेश चला जाता है तो घर का एकाकी जीवन और भी काटने जैसा लगता है। एक ओर युवावस्था का मस्ती भरा मन और दूसरी ओर पति वियोग ऐसे में न तो वर्षा की रिम-झिम अच्छी लगती है और न राका-निशा ही-

"बाँध बनाए गैले, पोखरी खुनाई गैले,
पिया परदेश गइले, सिंदुर सपना भइले।"
"पिया परदेश गेले, हमरा के दुःख भेले,
दिन-रात परे मोरा गारी हे सखिया।"

यदि दो-चार वर्षों के वैवाहिक जीवन के बावजूद पुत्र-रत्न की प्राप्ति नहीं हुई तो सारा परिवार उसे वंध्या मानकर अनेक तरह से सताने लगता है। इस तरह उसका संपूर्ण जीवन ही विडंबना और दुर्भाग्य के अश्रु से सिक्त होता रहता है। इतनी करुणा-विषाद इन गीतों में है जिसे पढ़-सुनकर हृदय द्रवित हुए बिना रह नहीं पाता-

"सबके दौरिया हो दीनानाथ लिहलें मँगाय,
बाँझिनी के दौरिया हो दीनानाथ बैठल झमाय।"
"एकये पुत्र बिना हो दीनानाथ सैरा छै अन्हार,
सासु पढ़े गरिया हो दीनानाथ ननदी चीरे गाल,
गोतनी के बोलिया हो दीनानाथ सहलो न जाय,
हमारो प्रभु के बोलिया हो दीनानाथ, सेहो कुबोलकृ।"

नारी भावनाओं की जीवंत अभिव्यक्ति में स्पष्ट रूप से कहीं हर्ष की खिलखिलाहट है तो कहीं विषाद के आँसू। पुत्र-प्राप्ति का मांगलिक क्षण हो या विवाह का आह्लादिक प्रसंग, जनेऊ का अवसर हो या पिया-मिलन की बेला- नारियाँ इन क्षणों में अपनी भावना को रोक नहीं पाती हैं और गीत के रूप में अपने कोमल कंठों से खुशी को व्यक्त कर ही देती हैं-

ललना लेहूँ सा लालकी बधाईया जवन मन भावत होकृ।

इन गीत में जहाँ एक ओर आनंद एवं उछाह के चित्र मिलते हैं, वहीं दूसरी ओर करुणा एवं दर्द के अनेक कारुणिक प्रसंग भी। पुत्री की विदाई की कारुणिक बेला हो या पति-वियोग का दुःख, वैधव्य का कष्ट हो या पुत्रहीनता का दुःख- ये सारे प्रसंग जीवन में दुःखदायी ही होते हैं। इन प्रसंगों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति तो देखिए-

"आज जनकपुर सूना भेले सखिया हे,
सियाजी चलली ससुरार"

"बाईस बरस बीतेय हमरा, सुनियौ कृपानिधान यौ,
निर्धन के बेटी बनि जग में, कतेक सहब अपमान यौ।"

विवेच्य लोकगीतों में जितनी आंतरिक भावनाओं का प्रस्फुटन देखने को मिलता है, उतनी बाह्या प्रकृति या समस्याओं का चित्रण नहीं। कहीं पुत्र-प्राप्ति की लालसा तो कहीं पिया मिलन की आकांक्षा, कहीं ईश्वर से संकट निवारण की करुण प्रार्थना तो कहीं दीर्घायु या संपन्नता के लिए निवेदन- ये सारे प्रसंग आंतरिक भावनाओं को ही स्वाभाविक अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। इन गीतों में पिया मिलन की आकांक्षा का कितना भावात्मक चित्रण है-

"कासे न कहा जात, निंदिया न आबे रात,
विरहा सतावे गात, श्याम न घंरबा।"

"गरजे, बरसे बदरवा, पिया बिनु मोहे न सुहाय।"

पुत्र-प्राप्ति की आकांक्षा का कितना स्वाभाविक और दर्दनाक भाव इन पंक्तियों में देखने को मिलता है-

"एकये पुत्र बिना हो दीनानाथ, सैरा छै अन्हार,
सासु पढ़े गरिया हो दीनानाथ, ननदी चीरे गाल।"

दुर्दिन या संकट की बेला में जहाँ संकट निवारण के लिए प्रार्थना की जाती है वहीं दीर्घायु या संपन्नता के लिए याचना का स्वर भी कम कातर नहीं होता-

"हमरा केवल भरोसा एक बजरंगबली के,
बजरंगबली के हो पवन सुत केकृ।"

"कखन हरब दुःख मोर हे भोला दानी, कखन हरब दुःख मोर।"

अध्येय लोकगीतों में जो भी सामाजिक समस्याएँ आई हैं, उनमें नारी की हीन सामाजिक स्थिति, दहेज-प्रथा तथा सास-ननद का निष्ठुर व्यवहार ही प्रमुख है। सीता जी के ब्याह के समय माता कहती हैं-

"कहथिन सीता सुनु ओ बाबा बचन हमार यो,
जिनका आँगन बाबा बेटी कुमार से हो केना सुतल निचित यो।"

"अन्नधन, संपत्ति बेटी द्वारा शृंगार थिके,
तहूँ बेटी जीव के जंजाल थिकह...हे।"

इन लोकगीतों में भारतीय संस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता भी स्पष्ट होती है। वह है नारी-चरित्र की दृढ़ता। किसी भी लोकगीतों में नारी को मर्यादा, शील या चरित्र की दृष्टि सक गिरते हुए नहीं पाया गया है। नारी हमेशा शील और मर्यादा के लिए अपने वैयक्तिक सुख को सामाजिक सुख के नाम पर अर्पित करती रही है। पति वियोग के दुःख को नहीं सहन करने पर वह आँसू भले बहा ले, परिवार की प्रतिकूल परिस्थिति पर गम का घूँट भले ही पी ले, पर वह परिवार की मर्यादा के उच्चासन से कभी नीचे नहीं उतर सकती। कोई रुपए-पैसे या जेवरों का लोभ दे या सुखमय भविष्य का सपना दिखाए, वह किसी कीमत पर पुरुष के सामने आत्म-समर्पण नहीं कर सकती-

"चलुचलु आहे सुगिया हमरो नगरिया,
बैठले खियेबौ गे सुगिया, दूध, भात कटोरिया।"

"लेहो-लेहो डाला भरि सोनमा कि डाला भरि रूपा लेहो हे,
सुंदरि हे छोड़ी परदेशिया के आस बटोहिया के साथ चलही हे।
अगिया लगेबौ डाला भरि सोनमा कि डाला भरि रूपवा में रे,
अगिया लगेबौ बटोहिया के साथ कि परदेशियाँ के आस मोरा हे...।

शिव-पार्वती, राम-सीता, दुर्गा-काली, सूर्य-चंद्र, हनुमान जैसे भक्तवत्सल अनेक देवी-देवता हैं, जो इन लोकगीतों के प्रयोक्ताओं की नस-नस में बसे हुए हैं। लोगों का संपूर्ण जीवन ही देवतामय और व्रतमय होता है। दैहिक या आर्थिक परेशानी जो भी हो गुहार, देवी-देवता की ही होगी-

कखन हरब दुःख मोर हे भोला दानी... कखन हरब।
दुःखहि जनम भेल, दुःखहि गमावल सुख सपनेहूँ नहि भेल...।

मुझमें अवगुण अनेकों हजार है, पर महिमा भी तेरी अपार है,
जरा ताको तो बेरा पार है, विनय तुझे बार-बार है...।

जहाँ भी शृंगारिक वातावरण हो, पुरुष कृष्ण बन जाता है और नारी राधा। विवाह के लिए भी लोक जनक नगरी ही जाते हैं और वर-वधू राम और सीता के रूप में प्रतिष्ठित हो जाते हैं-

"भला कान्हा हो, जनि मारो पिचकारी"
हाँ-हाँ करत मारत पिचकारी, मानत नाहिं मुरारी,
जो एक बूँद पड़ी मुख ऊपर, दैहों हजारन गारी...।

राधा-कृष्ण के सुंदर जोड़ी, गावत दै दै तारी।
"अवध नगरिया से चलल बरतिया, आहो रंग पियरे-पियरे
जनक नगरिया भइले शोर, आहो रंग पियरे-पियरे।"

कहीं पुरुष-नारी का मिलन मन में आनंद का संचार करता है तो कहीं प्रकृति का मनोरम चित्र मन को गुदगुदाता है। पुरुष-नारी का शाश्वत-प्रेम जहाँ एक ओर व्यक्तिगत जीवन में आनंद का संचार करता है, वहीं दूसरी ओर समाज में उल्लास का सृजन भी करता है। कभी राधा-कृष्ण तो कभी सीता-राम के रूप में युवक-युवतियाँ अपनी मादक भावनाओं को अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं और जीवन में नूतनता लाते हैं-

राधा तू हे दामिनी दमन रही
हे कदम वृक्ष, उंमुक्त गगन
झूला हे पवन दुति, झूल रहीं।

झूला लागे कदम की डारी, झूले कृष्ण मुरारी ना...।
राधा झूले, श्याम झुलावे, पारा पारी ना...।

युवावस्था ऐसी होती है, जिसमें मस्ती और उमंग की भावना अधिक रहती है। प्रकृति का मनोरम वातावरण जहाँ मन में मादक भावनाओं एवं कामनाओं को उद्दीप्त करता है, वहीं दूसरी ओर प्रसन्नता की झलक गीत के रूप में फूट पड़ती है और सारा वातावरण उस खुशबू से महक उठता है। जवानी का वय और प्रकृति का मनोरम शंगारिक वातावरण- जब दोनों एक साथ हो जाएँ तो, फिर क्या कहना?

इन पंक्तियों में राधा-कृष्ण की जोड़ी के माध्यम के भावनाओं का कितना सुंदर अंकन हुआ है-

राधा झूले श्याम छुलावे पारा-पारी ना,
चारो दिशि से घिरी बदरिया, काली-काली ना...।

सावन उपवन के वन फूले, झूला झूले नंद किशोर
कदम डार में लगा हिडोला, गरजत नभ घनघोर

बरसा फुहार बहे शीतल बयरिया,
सावन मोहक छवि मोह लिया री,
देखे चलु मोरी सखिया...।

व्यक्ति की कोमल भाव-प्रवण एवं सुख-दुःखमिश्रित भावनाओं के अलावा पारिवारिक टूटते-जुड़ते रिश्ते-नाते एवं सामाजिक सहयोग का बड़ा ही स्वाभाविक चित्र रहे हैं, पारिवारिक रिश्ते आर्थिक परेशानियों के कारण दिन-प्रतिदिन बिखरते जा रहे हैं। व्यक्ति के जीवन की आकांक्षा, कामना एवं भावना की पूर्ति नहीं होने के कारण हैं। व्यक्ति के जीवन की आकांक्षा, कामना एवं भावना की पूर्ति नहीं होने के कारण अनेक उलझनों का जन्म हो रहा है।

सेजवा लगेगा उदास, पिया तोहरे बिना ना,
हमसे रहलो नहीं जात, लोगवा रोज लगावे घात,
कैसे अपनी इज्जतिया वचायव सखिया ना...।

विवेच्य लोकगीतों की परिधि में जहाँ मुख्य रूप से व्यक्ति और समाज की समस्याएँ एवं विशेषताएँ हुई हैं वहीं राष्ट्रीय उत्थान की महान कामना भी अभिव्यक्त हुई है। व्यक्ति केवल अपनी हित कामना ही नहीं चाहता, वरन् देश के लिए भी सोचता है; और जहाँ राष्ट्र की सोच है, वहाँ राष्ट्रभाषा स्वतः प्रस्फुटित हो जाती है-

"बढ़ेगी उपज मेरी खाद पटाने से,
मिटेगी गरीबी मेरा अन्न उपजाने से।।"

मील का कपड़ा छोड़ो बड़ी बरबादी रे,
खादी का कपड़ा पहनो पायी आजादी रे,
खादी मिलेगी भैया चरखा चलाने से।।

एक ओर जहाँ राष्ट्र-कल्याण की कामना देखने को मिलती है वहीं दूसरी ओर समाज-कल्याण की भावना भी। समाज में सबका हित हो, सब आनंद से रहें, चाहे वे ऊँच हों या नीच, बड़ा या छोटा, अमीर हों या गरीब, सामाजिकता एवं सामान्य हित की कामना का कितना सुंदर चित्र है-

सदा आनंद रहे एहि द्वारे, मोहन खेल होरी हो
मोहन खेले होरी हो लाला, मोहन खेले होरी हो।

इस तरह, इन लोकगीतों का कैनवास बहुत बड़ा है। इनमें व्यक्तिगत सुख-दुःख, इच्छा-आकांक्षा के चित्रण के साथ-साथ पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन की भी झलक देखने को मिलती रहती है।

लोकगीतों में जीवन के प्रति अनासक्ति एवं मृत्यु के बाद की दुनिया के प्रति चिंता का भाव प्रकट होता दिखता है। जीवन में वह एक क्षण भी आ जाता है, जब शरीर की शक्ति चूक जाती है, सांसारिक आकर्षण सारे टूट जाते हैं और मनुष्य सारे आकर्षणों से विलग होकर दुनिया के बारे में सोचने लगता है।

इन लोकगीतों के आधार पर जिस धर्म या संस्कृति का रूप सामने आता है, वह भारतीय हिन्दू धर्म या भारतीय हिन्दू संस्कृति है। हिन्दू धर्म की सारी रूढ़िवादिता एवं विश्वास इन गीतों में गूँजता है। चेचक हो या महामारी, कष्ट हो या पेरशानी, लोग हिन्दू संस्कृति के अनुरूप ही देवी-देवताओं की अभ्यर्थना के द्वारा कष्टों के निवरण का प्रयास करते दिखते हैं।

विवेच्य लोकगीतों में अभिव्यक्त नारी ऐसी दीपशिखा की भाँति है, जो भारतीय संस्कृति के मंदिर में अनवरत एवं शील की दीप्ति भी है, सबसे बढ़कर उनमें त्याग एवं बलिदान की नीरव आकांक्षा के साथ-साथ कष्टों को झेल लेने का अपार साहस भी है।

शिल्प की दृष्टि से इन लोकगीतों की यह विशिष्टता स्पष्ट है कि इनमें नाटकीय संवाद-पद्धति को अधिकाधिक अपनाया गया है। दो पात्रों के बीच प्रश्नोत्तरी शैली चलती है और गीत आगे बढ़ता जाता है-

"किनकर हाथ कनक पिचकारी, किनकर हाथ अबीर झोरी,
कृष्ण के हाथ कनक पिचकारी, राधा के हाथ अबीर झोरी।"

"कौन काठ के बने हिंडोला, कथी केर डोरी ना।
चंदन काठ के बने हिंडोला, रेशम डोरी ना...।

इस तरह यह शैली इतनी प्रमुख है कि लगभग नब्बे प्रतिशत गीत इसी तरह वार्तालाप या प्रश्नोत्तर युक्त हैं। कहीं पात्रों के साथ वार्तालात चलता है तो कहीं अप्रत्यक्ष या काल्पनिक पात्रों के साथ।बहुत से गीत ऐसे भी हैं, जो हर अंचल में पाए जाते हैं। जिन्हें लोगों ने अपनी-अपनी भाषा के अनुरूप ढाल लिए हैं। मानव जीवन में रसी-बसी संस्कृति, संवेदना, अनुभूति, विश्वास, आशा-आकांक्षा आदि का बड़ा ही सरल और सफल चित्र जिले के हर अंचल के लोकगीतों में देखने को मिलते हैं।

छोटे लाल गुप्ता,
शोध-छात्र
जयप्रकाश विश्वविद्यालय
छपरा (बिहार)
मो.न.-9085210732"


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