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ISSN 2292-9754

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12.05.2018


आलिंगन

गीतेश के दो ही शौक़ थे, एक दिन में पेंटिंग बनाना और दूसरा रात को मशहूर कहानीकारों की कहानियाँ पढ़ना। तूलिका और कैनवास से उसका गहरा रिश्ता था। चित्रकारी का जुनून गीतेश को इस हद तक था कि, जब तक उसकी बनाई तस्वीर पूरी नहीं हो जाती, तब तक वह कमरे में ही क़ैद रहता।

पिछले बीस सालों में उसने न जाने कितनी तस्वीरें बनाईं। उसके कमरे में जिधर देखो, उधर पेंटिंग ही नज़र आती। पेंटिंग क्या जीवन्त तस्वीरें कहो। ध्यान से देखने पर ऐसा प्रतीत होता, जैसे उसकी हर पेंटिंग कुछ-न-कुछ कह रही हो। ऐसा लगता, जैसे इंसानी वजूदों को कैनवास में उकेर कर दीवारों में चस्पा कर दिया हो।

बड़े-बड़े मशहूर चित्रकार गीतेश की चित्रकारी की तारीफ़ करते और उसको अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगाने और ख़ुद की आर्ट गैलरी बनाने को कहते, पर गीतेश हँसकर सबकी बात टाल जाता और कहता, “मैं पेंटिंग अपने शौक़ के लिए बनाता हूँ न कि आर्ट गैलरियों में लटकाने के लिए।”

दुनिया गीतेश की बनाई पेंटिंग की तारीफ़ करती, पर प्रिया ने उसके इस फ़न की कभी तारीफ़ नहीं की। कभी उसकी बनाई पेंटिंग को नज़र भर के नहीं देखा। उसकी नज़र में गीतेश का चित्रकार होना महज़ वक़्त को ज़ाया करना था, जिसका गीतेश को बेहद अफ़सोस था। यही वजह थी कि गीतेश और प्रिया के रिश्ते के मध्य खुदी अलगाववाद की खाई और गहरी होती जा रही थी।

ज़माने के सामने तो गीतेश और प्रिया पति-पत्नी थे, पर घर के अन्दर अजनबियों की तरह रहते। प्रिया ने गीतेश को कभी पति का दर्जा दिया ही नहीं दिया, क्योंकि उसके सपनों का सौदागर रंगों में सना रहने वाला गीतेश नहीं, एक ऐसा इन्सान था, जो बड़े-बड़े बिज़नेस प्लान करता, बड़े-बड़े होटलों में ठहरता, बड़ी-बड़ी गाड़ियों में चलता, जहाज़ों में उड़ता, जिसके साथ प्रिया ऐशो-आराम की ज़िन्दगी जीती, पर परिवार की मान-मर्यादा ने उसकी पसंद और ख़्वाहिशों को गीतेश जैसे नीरस और बोरिंग इन्सान के घर ला पटका।

सबको यह मालूम था कि प्रिया बाँझ है इसीलिए वह शादी के बीस साल बाद भी माँ नहीं बन पाई, पर यह बात तो गीतेश ही जानता था कि प्रिया और उसके मध्य पति-पत्नी जैसा कभी कोई रिश्ता रहा ही नहीं, तो प्रिया माँ कैसे बनती? लेकिन गीतेश ने भी कभी प्रिया को यह सब करने के लिए बाध्य नहीं किया, न ही उसने कभी कोई शिकवा या शिकायत की, क्योंकि वह हर हाल में प्रिया को ख़ुश देखना चाहता था। गीतेश को पूरा यक़ीन था कि उम्र के इस पड़ाव पर एक बार प्रिया को अपने व्यवहार पर पछतावा ज़रूर होगा। वह उसके क़रीब आएगी और अपने किए पर शर्मिंदा होकर उससे माफ़ी माँगेगी, पर ऐसा कभी हुआ नहीं।

गीतेश की जो रातें कभी प्रिया के इन्तज़ार में गुज़रती थीं, वह रातें अब कहानीकारों की किताबों के पन्नों में गुज़रने लगीं। गीतेश ने अब प्रिया का इन्तज़ार करना छोड़ दिया। अब दोनों के बीच मात्र औपचारिकता ही रह गई थी, उसमें भी प्रिया की ही हुकूमत चलती थी।

प्रिया के साथ-साथ गीतेश का अपनी पेंटिंग से भी मोह भंग होने लगा था, क्योंकि जिस प्रिया के लिए गीतेश ने रंगों की दुनिया सजाई थी, उसे अब वही दुनिया बदरंग-सी नज़र आने लगी थी इसलिए वह अब ख़ुद में टूटने लगा था और इससे पहले कि गीतेश पूरी तरह टूट कर बिखरता, सुगन्धा ने आकर उसको समेट लिया।

“वाह, ऐसा लग रहा है, जैसे मैं दुनिया की सबसे बड़ी आर्ट गैलरी में आकर खड़ी हो गई हूँ। काश! इन जीवन्त, हँसती-बोलती और मुस्कुराती तस्वीरों के बीच मेरी भी एक तस्वीर होती, तो कितना अच्छा होता,” सुगन्धा ने गीतेश के कमरे में लटकी तस्वीरों को देखते हुए कहा।

“माफ़ कीजिएगा, मैंने आपको पहचाना नहीं?”

“ओह सॉरी, गीतेश मैं तुम लोगों का परिचय करवाना भूल गया। गीतेश, यह सुगन्धा जी हैं। इस शहर की जानी-मानी कहानीकार,” गीतेश के दोस्त कबीर ने कहा।

“ओह, तो आप ही हैं सुगन्धा। बहुत अच्छा लिखती हैं आप। यह देखिए, आप ही का कहानी संग्रह “बर्फ के अंगारे” पढ़ रहा हूँ,” गीतेश ने मेज़ पर रखी किताब की तरफ़ इशारा करते हुए कहा।

“इसका मतलब आपको पढ़ने का भी शौक़ है?”

“हाँ, एक बात कहूँ सुगन्धा जी, हम दोनों का शौक़ एक-सा ही है। आप शब्दों से किसी की ज़िन्दगी को तराशती हैं, तो मैं रंगों से।”

“बिल्कुल सही कहा आपने। मुझे तो कबीर का अहसानमन्द होना चाहिए, जिसने मुझे आप जैसे महान चित्रकार से मिलवाया।”

“बिलकुल, कबीर का अहसानमन्द तो मुझे भी होना चाहिए।”

“गीतेश तुम लोग बातें करो, मेरा एक ज़रूरी फोन आ रहा है… मैं निकल रहा हूँ,” कबीर ने कहा।

“फोन आ रहा है या फिर तुम हम दोनों के बीच कबाब में हड्डी नहीं बनना चाहते हो,” सुगन्धा ने मज़ाकिया लहज़े में कहा, तो तीनों ठहाका मारकर हँसने लगे। हँसते-हँसते कबीर बोला, “ऐसा ही समझ लीजिए, फ़िलहाल तो मुझे जाने दीजिए।”

“रुको कबीर मैं भी तुम्हारे साथ ही चल रही हूँ, मुझे भी एक ज़रूरी काम याद आ रहा है। मैं गीतेश जी से बाद में आराम से मिलती हूँ। ठीक गीतेश जी अभी चलती हूँ फिर आऊँगी, आपसे अपनी तस्वीर बनवाने के लिए, बनाओगे न मेरी तस्वीर?”

“क्यों नहीं, ज़रूर बनाऊँगा।”

भले ही सुगन्धा उम्र के सैंतालिसवें साल से होकर गुज़र रही थी और उसके सिर के बाल पक कर सफ़ेद होने लगे थे, पर उसकी चंचल आँखों की शरारत, चेहरे की मुस्कुराहट उसको चालीस के पास ही रोके हुए थी। उसका फूल-सा हँसता-मुस्कुराता चेहरा गीतेश की आँखों से निकल नहीं रहा था। उसकी बड़ी-बड़ी काली, कजरारी आँखें, होंठों को छूती पतली-नुकीली नाक, पतले-पतले गुलाब की पंखुड़ियों सरीखे गुलाबी होठ। गोरा-चिट्टा रंग, सुराही-सरीखी पतली और लम्बी गर्दन, पतले-दुबले किन्तु सुडौल जिस्म पर लिपटी लाल रंग की साड़ी, उसके सौंदर्य को और निखार रही थी। इससे भी ज़्यादा सुगन्धा की जो चीज़ गीतेश को प्रभावित कर रही थी, वह था सुगन्धा का बेबाकपन। लेश मात्र भी सुगन्धा के अन्दर बनावटीपन नहीं था। यही सब तो चाहिए था गीतेश को। अपने दोस्त कबीर का भी शुक्रिया अदा किया, क्योंकि कबीर ने ही उसको सुगन्धा से मिलवाया था।

जब से गीतेश सुगन्धा से मिला था, वह, वह नहीं रहा था। प्रिया उसके ज़हन से निकल रही थी और सुगन्धा उसके दिल में उतर रही थी। इसलिए नहीं कि सुगन्धा ख़ूबसूरत थी, बेबाक थी बल्कि इसलिए क्योंकि वह प्रिया जैसी नकचढ़ी और बदमिज़ाज़ नहीं थी। किसी की भी बात पर खिलखिलाकर हँस देना उसकी आदत थी। इससे भी बड़ी खूबी सुगन्धा के अन्दर यह थी कि वह उसके फ़न की क़द्रदान थी।

अचानक एक दिन गीतेश के पास सुगन्धा का फोन आया कि आज उसका मूड अच्छा है, क्या वह उसकी तस्वीर बना सकता है? गीतेश ने बिना देर किए उसको बुला लिया। दोनों के मध्य औपचारिक बातें हुईं और गीतेश ने उसे अपने सामने बैठा कर उसकी तस्वीर बनानी शुरू कर दी। उस पूरे दिन सुगन्धा गीतेश के साथ रही। इस बीच दोनों ने एक-दूसरे को समझा और जाना।

रात काफ़ी हो चुकी थी। गीतेश अपने कमरे में अकेला बैठा सुगन्धा की उस तस्वीर को टकटकी लगाकर देख रहा था, जिसे उसने पूरे पन्द्रह दिनों में बनाकर तैयार किया था। देखते-देखते गीतेश सुगन्धा की तस्वीर से बातें करने लगा।

"सुनो, आख़िर आज मैंने तुम्हारी तस्वीर को पूरा कर ही दिया। पता है, तुम्हारे चेहरे ने रंगों को इस क़दर सोखा, जैसे वह बरसों से प्यासा हो और तुम्हारी झील-सी गहरी आँखें कितना कुछ कहना चाह रही हैं, पर मौन हैं, बिल्कुल तुम्हारी तरह। जानती हो सुगन्धा, तुम्हारी आँखों से छूते ही ब्रश ने मुझसे क्या कहा? कहा, कैसे ठहर पाओगे तुम इन आँखों में? मैंने कहा, हाँ, यह सच है, मैं इन आँखों में नहीं झाँक पा रहा हूँ इसीलिए मैंने अपनी आँखें मूँद ली हैं।

तुम्हारे गालों का गुलाबी रंग न जाने कैसे सुर्ख़ हो गया। मेरा साहस, कैनवास और मेरे दिल के बीच सूखे पत्ते की तरह थर-थर काँप रहा है। बेशक़ मैं तुमसे बेपनाह मुहब्बत करने लगा हूँ, पर डरता हूँ अपनी मुहब्बत को ज़माने के सामने लाने से। फिर सोचता हूँ कब तक अपनी मुहब्बत को क़ैद करके रखूँगा अपने दिल में? कभी यह सोचकर डर जाता हूँ... कहीं तुम मेरी मुहब्बत को ठुकरा न दो। नहीं....नहीं सुगन्धा मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता हूँ, तुमसे दूर जाने की कल्पना भी नहीं कर सकता। वैसे देखा जाए, तो मैंने तुम्हें पाया भी कब है? नहीं, मेरा यह कहना भी ग़लत होगा, अगर पाया न होता तो मेरे अन्दर तुम्हारे लिए यह कसक, तड़प और बेचैनी न होती। तुम हर समय मेरे ख़यालों में रहने लगी हो सुगन्धा। बिना दस्तक दिए तुम सीधे मेरे दिल में उतर आई हो। मेरी एक बात ध्यान से सुनो सुगन्धा, तुम मेरी हो, सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी। जीवन के इन आखिरी दिनों में तुम्हें मुझसे कोई नहीं छीन सकता।

सुगन्धा, मैं अपनी अधूरी और बेनूर ज़िन्दगी को तुम्हारे नूर से आबाद करना चाहता हूँ। तुम्हारे क़रीब आना चाहता हूँ , तुमसे जी भर के बातें करना चाहता हूँ, जो तुमसे कभी कह नहीं पाया, वह कहना चाहता हूँ, तुम्हारे साथ हँसना-मुस्कुराना चाहता हूँ। मैं तुम्हारी कहानियों का हिस्सा बनना चाहता हूँ सुगन्धा। कहना तो तुम भी यही चाहती हो सुगन्धा, पर कहने से घबराती हो। लेकिन एक दिन तुम्हें मेरी मुहब्बत इस क़दर बेचैन कर देगी कि तुम्हें कहना पड़ेगा कि हाँ, तुम मुझसे मुहब्बत करती हो।

गीतेश ने अपनी कलाई पर बँधी घड़ी की तरफ़ देखा, रात के तीन बज रहे थे। गीतेश ने सुगन्धा की तस्वीर बोलना बन्द किया और सोने की कोशिश करने लगा।

सूरज की पहली किरण के साथ ही वह सोकर उठ गया और सोचने लगा आज सब कुछ नया-नया-सा लग रहा है। उसके ज़हन में सुगन्धा की तस्वीर उभर आई। रात उसकी तस्वीर से जो बातें हुईं, सब उसे याद आने लगीं। उसका मन सुगन्धा से उससे मिलने के लिए मचल उठा और वह सुगन्धा से मिलने के लिए चल पड़ा।

वह तैयार होकर घर से निकला ही था कि पीछे से प्रिया ने आवाज़ लगाई, "सुबह-सुबह कहाँ जा रहे हो, वह भी कुछ खाए बग़ैर।" सुगन्धा की आवाज़ सुनकर गीतेश का मूड ख़राब हो गया, पर उसने प्रिया से मुँहज़ोरी करना ठीक नहीं समझा और चुपचाप घर से निकल गया।

चारों ओर पहाड़ियों से घिरा हुआ देवदार के लम्बे-घने वृक्षों के बीच सुनसान-सा दिखने वाला सुगन्धा का बंगला देखकर ऐसा प्रतीत होता, जैसे वह मुद्दतों से खाली पड़ा हो। गाड़ी से उतर कर गीतेश ने एक बार माहौल का जायज़ा लिया और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गया। चलते-चलते अचानक वह ठिठक कर रुक गया और सोचने लगा, यह मुझे क्या हो रहा है, मेरे पाँव, मेरा साथ क्यों नहीं दे रहे हैं? दिल को ज़रा भी लिहाज़ नहीं रहा उम्र का? कितनी बार आ चुका हूँ तुम्हारे पास, कभी तुम्हें उस नज़र से नहीं देखा, पर आज क्या हो रहा है मुझे? क्यों मैं तुम्हारे आग़ोश में खो जाना चाहता हूँ?

"आओ गीतेश, अन्दर आ जाओ, मैं तुम्हारा ही इन्तज़ार कर रही थी।"

सुगन्धा की आवाज़ से उसकी तन्द्रा टूटी और वह धड़कते दिल से सुगन्धा के साथ अन्दर गया। सीली-सीली-सी सुगन्धा सफ़ेद और नीले रंग की सलवार और कमीज़ में बहुत ख़ूबसूरत लग रही थी। गोल चूड़ी के आकार के ईयर रिंग उसके खुले बालों के बीच से आधे-आधे झाँक रहे थे। कन्धे पर झूलते बालों को सुगन्धा ने उठा कर जूड़ा बना लिया।

"गीतेश, तुम्हें तो मुझसे मिलने की फ़ुर्सत ही नहीं है, अगर मैं न बुलाऊँ, तो तुम्हें कभी मेरी याद ही न आए। अपनी तस्वीरों के संग रहते-रहते बाहर की दुनिया को भूले रहते हो। शिकायती अन्दाज़ में सुगन्धा ने कहा।

"कम-से-कम तुम तो ऐसे मत कहो सुगन्धा।"

"क्यों..? क्यों न कहूँ?"

"अच्छा ठीक है, कर लो ग़ुस्सा जी भर के।"

सुगन्धा ने मुस्कुरा कर अपने ग़ुस्से को ख़त्म किया। उसकी मुस्कुराहट को आज पहली बार गीतेश ने ध्यान से देखा था। ...उफ्फ्फ्फ...कितनी सुन्दर लगती हो तुम सादग़ी में भी ।

“कहाँ खो गये गीतेश?”

“कहीं नहीं,” सुगन्धा के सवाल से सकपका गया गीतेश।

“अच्छा लो, तुम्हारी ब्लैक-टी तैयार है,” दोनों चाय पीने लगे।

“आज तुमने फिर चाय में शक्कर डबल कर दी।”

“अच्छा, सुगन्धा ने चाय को होंठों से लगाया। ओह, आज फिर शक्कर डालना भूल गई। अच्छा रुको, शक्कर लेकर आती हूँ।”

“नहीं रहने दो, अब मैं भी तुम्हारा साथी हो गया हूँ। मेरा भी शुगर लेबल बढ़ा हुआ आया है।”

“तुम सच बोल रहे हो?” सुगन्धा के माथे पर चिन्ता की लकीरें उभर आईं।

“अब इस उम्र में तो झूठ बोलने से रहा,” दोनों ठहाका लगाकर हँसने लगे।

इतनी बड़ी भुतहा वीरान-सी हवेली में सुगन्धा बिलकुल अकेली रहती थी। पति से तलाक़ तो शादी के दो साल बाद ही हो गया था। उसके बाद न तो उसने और न ही सुगन्धा ने आपस में बात की। सुगन्धा के एक बेटा था विक्की, वह अब अमेरिका में है। कई बार उसने सुगन्धा से भी अमेरिका चलने को कहा, पर सुगन्धा ने मना कर दिया। तलाक़ के बाद सुगन्धा के पास शादी के कई प्रस्ताव आए मगर उसने किसी को स्वीकार नहीं किया।

जब से गीतेश ने सुगन्धा की ख़ूबसूरती को अपने कैनवास पर उतारा था, तब से वह सुगन्धा का ही होकर रह गया था। वह अपने मन में कहता, सुगन्धा काश! मैंने तुम्हारी तस्वीर को पहले बनाया होता, तो अब तक की ज़िन्दगी हमने तनहा न गुज़ारी होती। सुगन्धा, मैं तो तुम्हें दिल की गहराइयों से चाहने लगा हूँ, क्या तुम मुझे प्यार कर पाओगी? गीतेश ने मन में कहा और ख़ुद को सम्हालते हुए खिड़की से बाहर झाँकने लगा। सामने वाली पहाड़ी ऐसी लग रही थी, मानो उसने अभी-अभी कुहरे के आलिंगन से ख़ुद को आज़ाद किया हो। पवन छोटे पौधों पर अपना रौब जमा रही थी और बड़े वृक्ष ऐसे इतरा रहे थे, जैसे किसी के प्रेम में सुध-बुध खो बैठे हों। झमाझम बारिश की बौछार ने हवा के साथ खिड़की में प्रवेश किया और गीतेश को पूरी तरह भिगो डाला। ठण्ड से उसकी कँपकँपी छूटने लगी।

“बीमार पड़ना है क्या?” सुगन्धा ने उसे भीगते हुए देखकर कहा।

गीतेश ने घूम कर देखा। पीछे सुगन्धा तौलिया लिए खड़ी थी। सुगन्धा के मन में अपने लिए इतना प्यार देखकर गीतेश ख़ुद को रोक नहीं पाया और एकटक उसे निहारने लगा। उसकी साँसों की ख़ुशबू को महसूस करने लगा और सुगन्धा भी उसमें खो गई। मेघों की पैंजनियों का शोर संगीत की तरह सुरों में घुलने लगा था। गीतेश ने अपनी दोनों बाहें सुगन्धा के सामने फैला दीं, जिसमें सुगन्धा स्वतः ही समाती चली गई। सुगन्धा का स्पर्श पाकर गीतेश को यकायक प्रिया की याद हो आई। उसने झटके से सुगन्धा को ख़ुद से अलग किया और वहाँ से चला गया। सुगन्धा उसे देखती रह गई।


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