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ISSN 2292-9754

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12.01.2014


इंसान होना बाक़ी है

उस दिन,

सन्नाटों से घने कोहरे ने चीखकर कहा
आदमी का अभी इंसान होना बाक़ी है..।

कहते हैं...

गुलाब का कवच होते है काँटे.....
काँटों को अभी और समझना बाक़ी है..।

नस्ल के सफ़ेद ख़ून से शर्मसार है सब,
इधर मौसम को अभी और बदलना बाक़ी है.।

आँख का आँसू क़हर बन बरपा है अब,
शैतान का अभी और बदलना बाक़ी है..।

दिलों में दहशत हो, हैवान के भी....
नए तूफ़ान का अभी आना बाक़ी है...।

काले साये से लिपटे अँधेरों को बतला दो,
नए सूरज का अभी अंगड़ाई लेना बाक़ी है।

पलभर में,

ज़मीन के जलजले को मिटा सकता है,
बस! आदमी का अभी इंसान होना बाक़ी है...॥


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