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ISSN 2292-9754

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12.01.2014


चाहता हूँ

कमनसीब मैं अँधेरों में भटक रहा हूँ
तमन्ना-ए-आरज़ू कि तेरी मोहब्बत पाना चाहता हूँ॥

बेवफ़ाई उल्फ़त से यूँही निभा रहा हूँ
बंदा तेरा हूँ, तेरा प्यार पाना चाहता हूँ॥

उजालों से, घर अपना जला रहा हूँ
जुस्तज़ू, तेरे कर्म की इन्तहां चाहता हूँ॥

ग़ुनाह कुछ कम नहीं कर रहा हूँ
तिस पर भी, तेरी रहमतों का आसरा चाहता हूँ॥

ख़ुदी पर भरोसा अब न रहा
कसम भरोसे की, तेरा भरोसा चाहता हूँ॥

क़ायदा-ए-मोहब्बत में उलझ रहा हूँ
बेअसर कोशिशों पर भी रहम चाहता हूँ॥

क्या कहूँ? क्या कर रहा हूँ
फिर भी, मंज़िल का पता चाहता हूँ॥

शामें-ज़िन्दगी में राह ढूँढ रहा हूँ
रास्ते का पत्थर! तेरी इक नज़र चाहता हूँ॥

तेरी कायनात में कहीं भी कुछ भी कम नहीं,
जो नहीं मिला, यार! उसे पाना चाहता हूँ॥

तेरे सामने अपनी क़िस्मत बिगाड़ रहा हूँ
फिर भी, मेहरबां तेरा दामन पाना चाहता हूँ॥

ख़ुशी से ख़ुशनसीब बना दे, ऐ दोस्त!
बीमार तेरा, तेरे इश्क़ की इन्तहां चाहता हूँ॥


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