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06.01.2008
 
तुझे दिल में बसाना चाहता हूँ
चाँद शुक्ला ’हदियाबादी’

तुझे दिल में बसाना चाहता हूँ
तुझे अपना बनाना चाहता हूँ

ज़रा भी दूर हो आँखों से जब तू
मैं मिलने का बहाना चाहता हूँ

मेरी आँखों में है तस्वीर तेरी
जिसे तुझ को दिखाना चाहता हूँ

जो गहरी झील सी आँखें है तेरी
में इन में डूब जाना चाहता हूँ

जो बरसों की है दूरी तुझमें मुझमें
में लम्हों में मिटाना चाहता हूँ

घटा सावन की तू मैं खेत सूखा
मैं प्यास अपनी बुझाना चाहता हूँ

ग़मों से उमर भर पाला पड़ा है
मैं अब हँसना हँसाना चाहता हूँ

ग़ज़ल है तू मेरी मैं तेरा शायर
तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ

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