अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
10.13.2007
 

किस तरह ख़ाना ख़राबां फिर रहें हैं हम जनाब

चाँद  शुक्ला ’हदियाबादी’

 

किस तरह ख़ाना ख़राबां फिर रहें हैं हम जनाब

नींद में भी सो ना पाएँ देखते रहते हैं ख़ाब

 

वोह हसीं हैं हमने माना और है वोह पुर शबाब

हम भी उनसे कम नहीं दिल के हैं यारो नवाब

 

दिल नहीं है अपने बस में ना है बस में दिमाग

दर्द हमको दे दिये हैं इस जहां ने बे हिसाब

 

तुझको फ़ुरसत से बनाया है ख़ुदा ने ख़ुश जमाल

फूल सा चेहरा तेरा और मस्त आँखें लाजवाब

 

लोग कहते हैं शराबी यह ग़लत इल्ज़ाम है

जिस क़द्र आँसू पियें हैं उसके कम पी है शराब

 

तू अंधेरे में छुपी है मेरी जाने ग़ज़ल

चाँद हूँ आख़िर तुझे मैं ही करूँगा बे निक़ाब



अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें