अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
10.18.2017


ईश्वर पैदा किए जाते हैं

एक लड़की ने बहुत मारा मुझे
वह बहुत सुंदर थी
और बहुत बोलती भी थी
लास्ट बार मैंने उसे रसोई में घुसते देखा
वह हल्दी की तरह हरी थी,
उसे यक़ीन न हो भले ही
और यक़ीन दिलाना मेरा काम भी नहीं
कि
मर्म और विचार...
ये बन्द कमरों में घुटने वाली दुनिया की सबसे सुंदर चीज़ें हैं,
जब आधी रात के बाहरवें पहर में
कोई कुत्ते जैसे जीव गली में भौंकते हैं
तो मैं थूक देना चाहता हूँ,
दुनिया के तमाम वादों
और "नीतियों" पर।
तुम्हारे सर पर नहीं उगाई गई है घास,
आदमी नहीं मरता दुखी होकर
और
देखना-सुनना किसी पंखे से नहीं चिपका होता।
आदमी के पास आदमी,
औरत के पास औरत
और दीवार के पास दीवार
जब मेरे सीने में चाकू मारा उसने,
मैं भागकर गुलाल लाया रसोई से
और उसके माथे पर रगड़ा,
वह और भी सुंदर होकर नदी की तरह लिपटी मुझसे,
जबकि नदी होना, उसके लिए
रसोई से होकर नहीं आया।
बेहतर होता अगर
हम तंजश्निगारी से कविताएँ लिखते,
हमारी माँएँ डायरियाँ जलाती जातीं,
बूढ़े लोग भगवद् गीता से जान बचाते,
और हम बेमन से मोहब्बत पाते
जैसे
क्लास में पहली बार जाने पर
बच्चों को आगे बैठने शौक़।
एक ग़रीब आदमी गटर में गिरा रोकर,
मज़दूरों के आन्दोलन सफल नहीं हुए
तब हमारे पड़ोसी ज्योतिषी ने खोज कर बताया,
दोनों का मुहूर्त नहीं निकलवाया था
और ग़ज़ब की बात यह कि
ज़हर से चुपड़ी हुई रोटी
नहीं खाई जा सकती दो साल से ज़्यादा।
दुनिया के सबसे पागल आदमी को
आप नहीं देखना चाहते मुस्कुराते हुए
यह नियम है।
नहीं रोके जा सकते वे पैर,
जो राष्ट्रगान सुनकर भी चलते रहते हैं।
हर कोई इतिहास की सबसे गहरी… गहरी मौत मरना चाहता है,
कि आँखें हैं, कान हैं, दिमाग़ है
पर विचारधाराएँ ख़त्म हो चुकीं हैं
यह मज़बूरी है,
विडम्बना है,
शोक सन्देश जैसा है
जैसे रेत के घड़े में
हम लोग अपना सुख ढूँढ़ते हैं।
इस कविता में न ईश्वर है
और न ही कारण,
बेबसी है, लाचारी है, हत्या है।
!
बेहतर होता मैं कोई अच्छी बात लिखता
ख़ैर,
उसने चाकू मारा था मेरे भूखे पेट में
फिर भी
सुबह अख़बार के आठ नम्बर पेज पर
मैं रसोई की नदी में कूदकर मरा,
मुब्तिला हुए कई
उदास लोगों के कानों में
मैं अपना दर्द चिल्लाना चाहता हूँ,
कि ईश्वर खोजे नही जाते ,
पैदा किये जाते हैं
लेकिन
हैरानी की बात तो यहाँ होती,
जब मैं आपको बताता कि
महमूद ग़ज़नवी सुबह उठते ही‚
दो घंटे रोज़ नाचता था।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें