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ISSN 2292-9754

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10.20.2018


समाज, साहित्य और भाषा के संवर्द्धन के विचारों का संग्रह

कुछ विचार,
लेखक : प्रेमचंद
प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स (प्रा.) लि.
नई दिल्ली, सं. 2011,
मूल्य – 50रु.
पृष्ठ- 107

अपनी विलक्षण रचनात्मक प्रतिभा के कारण हिंदी साहित्य में प्रेमचंद युग-प्रवर्तक के रूप में जाने जाते हैं। इनकी रचनाओं में पहली बार सामान्य जनता की समस्याओं की कलात्मक अभिव्यक्ति दिखलाई पड़ती है, जिससे आम जनजीवन का प्रामाणिक एवं वास्तविक चित्र पाठकों को सुलभ होता है। इनकी रचनाएँ राष्ट्रीय आंदोलन, कृषक समस्या, मानवतावाद, भारतीय संस्कृति, शोषण, विधवा विवाह, अनमेल विवाह, दहेजप्रथा जैसे विषयों को सरल और सहज तरीक़े से प्रस्तुत कर पाठक को चिंतन-मनन के लिए विवश करती हैं। आमजन की समस्याओं-परिस्थितियों को सहज बोधगम्यता के साथ अपनी रचनाओं में समेटने की कला ही प्रेमचंद को कालजयी रचनाकार बनाती है।

हिंदी साहित्य, ख़ासकर कथा-साहित्य को मनोरंजन स्तर से ऊपर उठाकर जीवन के साथ जोड़ने वाले यशस्वी रचनाकार प्रेमचंद के साहित्य और भाषा संबंधी विचारों के संकलन का नाम है- ‘कुछ विचार’। इस संग्रह में प्रेमचंद के विचारपरक लेखों के साथ विभिन्न संस्थाओं के कार्यक्रमों में साहित्य एवं भाषा संबंधी दिए गए उनके भाषणों को भी सम्मिलित किया गया है। इन भाषणों में प्रमुख हैं-

  •  ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के लखनऊ अधिवेशन में सभापति के आसान से दिया गया भाषण।

  •  ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास’ के चतुर्थ उपाधि वितरणोत्सव के अवसर पर 29 दिसंबर, 1934 ई. को दिया गया दीक्षांत भाषण।

  • बंबई के ‘राष्ट्रभाषा सम्मलेन’ में स्वागताध्यक्ष की हैसियत से 27 अक्टूबर, 1934 ई. को दिया गया भाषण।

प्रेमचंद के उपन्यास हों या कहानियाँ, लेख हों या भाषण, उन्होंने सहजता व सरलता को वरीयता दी है। मानवीय जीवन के साथ भाषा व साहित्य में भी वह सहजता-सरलता के पक्षधर हैं। साहित्य को जीवनानुभूति बताते हुए प्रेमचंद कहते हैं- “हम जीवन में जो कुछ देखते हैं या जो कुछ हम पर गुज़रती है, वही अनुभव और चोट कल्पना में पहुँचकर साहित्य-सृजन की प्रेरणा करती है। कवि या साहित्यकार में अनुभूति की जितनी तीव्रता होती है, उसकी रचना उतनी ही आकर्षक और ऊँचे दर्जे की होती है।” (साहित्य का उद्देश्य, पृष्ठ- 10)। कहने का तात्पर्य यह है कि साहित्य-सृजन के समय रचनाकार को मानव जीवन के सामाजिक परिवेश से तादात्म्य स्थापित करना अनिवार्य है। अगर वह ऐसा नहीं करता तो उसका सृजन पाठक में रोचकता और जीवन-मूल्यों से जुड़ाव उत्पन्न करने में सफल नहीं होगा और जो साहित्य पाठक को रोचकता के साथ आध्यात्मिक-मानसिक तृप्ति, कठिनाइयों पर विजय पाने की दृढ़ता न प्रदान करे, वह साहित्य कहे जाने लायक़ नहीं है।

साहित्य सर्जक का यह प्रयत्न रहता है कि उसके पात्र प्रत्येक परिस्थिति में मनुष्य की तरह आचरण करें, जिससे पाठक उन पात्रों से आसानी से जुड़ाव महसूस कर सके। यदि लेखक इसमें सफल होता है तो “वह अपनी सहज सहानुभूति और सौंदर्य-प्रेम के कारण जीवन के उन सूक्ष्म स्थानों तक जा पहुँचता है, जहाँ मनुष्य अपनी मनुष्यता के कारण पहुँचने में असमर्थ होता है।” (साहित्य का उद्देश्य, पृष्ठ- 11)। प्रेमचंद साहित्यकारों की चारण-प्रवृत्तियों से खिन्न नज़र आते हैं- “साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है। उसका दर्जा इतना न गिराइए। वह राजनीति और देशभक्ति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है। (साहित्य का उद्देश्य, पृष्ठ- 17)

समय-समय पर विविध विद्वानों ने रचनाकारों के लिए मानदंड स्थापित किये हैं, लेकिन अधिकतर मानदंड कुछ समय बाद स्वतः ध्वस्त हो गए। कारण स्पष्ट है कि रचनाकार से बंधन में बँधकर उत्कृष्ट सृजन की इच्छा व्यर्थ है। इस स्थिति में रचनाकार का सृजन ‘स्वान्तः सुखाय’ पर आधारित होगा। लेकिन हम इससे भी नकार नहीं सकते कि यदि मानक-विहीन सृजन हुआ तो उसके उच्छृंखल होने की संभावना अधिक है। इसलिए अच्छा यही होगा कि रचनाकार अपने मानदंड स्वयं निर्मित करे और उनका पालन करे। यह मानदंड नैतिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक सभी स्तरों पर होने चाहिए। साहित्य को प्रेमचंद मंदिर की तरह पवित्र मानते हैं। मंदिर (पूजास्थल) एक ऐसा स्थान होता है, जहाँ व्यक्ति सांसारिकता को त्यागकर ही ईश्वरत्व को पा पाता है। विलास और भोगवृत्ति में संलिप्त लोगों से न तो साहित्य का भला हो सकता है, न ही समाज का- “जिन्हें धन-वैभव प्यारा है, साहित्य-मंदिर में उनके लिए स्थान नहीं है। यहाँ तो उपासकों की आवश्यकता है, जिन्होंने सेवा को ही अपने जीवन की सार्थकता मान लिया हो, जिनके दिल में दर्द की तड़प हो और मुहब्बत का जोश हो।” (साहित्य का उद्देश्य, पृष्ठ-18)

‘कुछ विचार’ संग्रह में प्रेमचंद द्वारा लिखित ‘कहानी कला’ और ‘उपन्यास लेखन’ से संबंधित कई लेख हैं। इन लेखों में प्रेमचंद कहानी-उपन्यास के उद्भव की पृष्ठभूमि को रेखांकित करते हुए इन विधाओं के महत्व और स्वरूप को अभिव्यक्त करते हैं। प्रेमचंद यह स्वीकार करते हैं कि ‘मनुष्य जाति के लिए मनुष्य ही सबसे विकट पहेली है।’ वह ख़ुद स्वयं की समझ में नहीं आता और किसी न किसी रूप में वह अपनी आलोचना किया करता है, अपने ही रहस्य खोला करता है। प्रेमचंद के अनुसार- “आज की कहानी में कल्पना कम, अनुभूतियों की मात्रा अधिक होती है। इतना ही नहीं, बल्कि अनुभूतियाँ ही रचनाशील भावना से अनुभावित होकर कहानी बन जाती हैं।” (कहानी कला, पृष्ठ- 26)

कहानी या उपन्यास में पाठक स्वयं के जीवन का प्रतिबिंब देखना चाहता है। इसीलिए लेखक (कथाकार) को यह स्मरण रखना चाहिए कि वह ऐसे परिवेश और पात्रों का चयन करे, जिसे साधारण बुद्धि यथार्थ समझे। प्रेमचंद के शब्दों में- “जब हमारे चरित्र इतने सजीव और आकर्षक होते हैं कि पाठक अपने को उनके स्थान पर समझ लेता है, तभी उस कहानी में आनंद प्राप्त होता है। अगर लेखक ने अपने पात्रों के प्रति पाठक में यह सहानुभूति नहीं उत्पन्न कर दी तो वह अपने उद्देश्य में असफल है।” (कहानी कला, पृष्ठ- 29)

यूरोपीय समालोचक कहानियों के लिए किसी अंत की ज़रूरत नहीं समझते। यह परंपरा अब हिंदी में भी छा गई है। अब कहानी का आधार घटना नहीं, अनुभूति है और अनुभूति में आदि-अंत की अनिवार्यता नहीं होती। प्रेमचंद के अनुसार- “इसका कारण यही है कि वे लोग कहानियाँ केवल मनोरंजन के लिए पढ़ते हैं।” (कहानी कला, पृष्ठ- 23) प्रेमचंद ने भी मनोरंजन को कहानी का प्रधान धर्म स्वीकार किया है, लेकिन वह मनोरंजन ‘साहित्यिक मनोरंजन’ होना चाहिए और साहित्यिक मनोरंजन वह है- “जिससे हमारी कोमल और पवित्र भावनाओं को प्रोत्साहन मिले। हममें सत्य, निःस्वार्थ सेवा, न्याय आदि देवत्व के जो अंश हैं, वे जाग्रत हों।” (कहानी कला, पृष्ठ- 33)

प्रेमचंद उपन्यास को मानव-चरित्र का चित्र समझते हैं। और मानव-चरित्र को उद्घाटित करना उपन्यास का मूल तत्व। प्रेमचंद उपन्यासों को यथार्थवादी और आदर्शवादी दो भागों में विभक्त कर आदर्शोन्मुख उपन्यास सृजन को वरीयता देते हैं- “वही उपन्यास उच्चकोटि के समझे जाते हैं, जब यथार्थ और आदर्श का समावेश हो।” (उपन्यास, पृष्ठ- 38)। संसार की प्रत्येक वस्तु उपन्यास या कहानी का उपयुक्त विषय बन सकती है। प्रकृति का प्रत्येक रहस्य, मानव-जीवन का प्रत्येक पहलू जब सुयोग्य रचनाकार की लेखनी से निकलता है तो वह साहित्य का रत्न बन जाता है। और रचनाकार की सार्थकता इसी में है कि वह यह अनुमान कर ले कि कौन सी बात उसे लिखकर स्पष्ट करनी है और कौन सी बात पाठक स्वयं सोच-समझ लेगा। प्रेमचंद के शब्दों में- “कोई रचना रचयिता के मनोभावों का, उसके चरित्र का, उसके जीवन-दर्शन का, उसके दर्शन का आईना होती है।” (उपन्यास का विषय, पृष्ठ- 49)

आर्य समाज के अंतर्गत ‘आर्यभाषा सम्मलेन’ के वार्षिक अवसर पर लाहौर में दिए गए भाषण में प्रेमचंद हिंदी और उर्दू भाषा की अनिवार्यता के आधार पर हिंदू-मुस्लिम एकता की तरफ़दारी करते दिखाई देते हैं- “मैट्रिकुलेशन तक उर्दू और हिंदी हर एक छात्र के लिए ला्ज़मी कर दी जाए। इस तरह हिंदुओं को उर्दू में और मुसलमानों को हिंदी में काफ़ी महारथ हासिल हो जाएगी और अज्ञानता के कारण जो बुद्धिमानी और संदेह है, वह दूर हो जायेगा।” (एक भाषण, पृष्ठ- 59)। साहित्य के अभाव में मानव-जीवन की स्थिति कैसी होगी, यह सोचना भयावह है। मानव स्वभावतः देवतुल्य होता है। परिस्थितियों के वशीभूत होकर वह अपना देवत्व खो बैठता है। साहित्य इसी देवत्व को पुनर्स्थापित करता है, मानव के भावों को स्पंदित कर उसका प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करके। प्रेमचंद सच्चे साहित्य को कालजयी मानते हैं और अमर साहित्य के रचयिता को विलास-वृत्ति से दूर- “वाल्मीकि और व्यास दोनों तपस्वी थे। सूर और तुलसी भी विलासिता के उपासक नहीं थे। कबीर भी तपस्वी थे।” (जीवन में साहित्य का स्थान, पृष्ठ- 71)

प्रेमचंद हिंदी और हिंदी भाषियों को हठता छोड़ हिंदुस्तानी भाषा अपनाने पर बल देते हैं। हिंदुस्तानी, जिसमें भारत की सभी भाषाओं के शब्द समाहित हैं। वह हिंदी और उर्दू को एक-दूसरे का पर्याय मानते हुए कहते हैं- “अगर एक समुदाय के लोगों को ‘उर्दू’ नाम प्रिय है तो उन्हें इसका इस्तेमाल करने दीजिये। जिन्हें ‘हिंदी’ नाम से प्रेम है, वह हिंदी कहें। इसमें लड़ाई काहे की।” (राष्ट्रभाषा हिंदी और उसकी समस्याएँ, पृष्ठ- 85) प्रेमचंद भी गणेशशंकर विद्यार्थी की तरह भाषा की आज़ादी को पहली आज़ादी मानते हैं- “जब तक आपके पास राष्ट्रभाषा नहीं, आपका राष्ट्र भी नहीं।” (राष्ट्रभाषा हिंदी और उसकी समस्याएँ, पृष्ठ- 88)। अपनी भाषा के प्रति निरंतर बढ़ रही उदासीनता का कारण प्रेमचंद भारतीयों के आत्मसम्मान में आ रही उस कमी को बताते हैं जो ग़ुलामी की शर्म को नहीं महसूस करती- “हम अंग्रेज़ी भाषा की ख़ैरात खाने के इतने आदी हो गये हैं कि अब हमें हाथ-पाँव हिलाते कष्ट होता है। हमारी मनोवृत्ति कुछ वैसी ही हो गई है, जैसी लाचार भिखमंगों की होती है।” (उदासीनता का कारण, पृष्ठ- 99)। अंग्रेज़ी के स्थान पर हिंदुस्तानी के प्रयोग पर ज़ोर देते हुए कहते हैं- “अगर हमें राष्ट्रभाषा का प्रचार करना है तो हमें ‘इबारत’ की चुस्ती पर नहीं, अपनी भाषा को सरल बनाने में ख़ासतौर से ध्यान रखना होगा।” (इस रूप का प्रचार कैसे हो, पृष्ठ- 103)

‘कुछ विचार’ में साहित्य और भाषा संबंधी प्रेमचंद के विचार साहित्य-प्रेमियों और रचनाकारों से उस रचनाधर्मिता से जुड़ने की अपील करते हैं, जो आम जनमानस से संबंधित है, जिसकी भाषा आम जनमानस की भाषा अर्थात सरल-सुबोध है, जो मानव मात्र में नैतिकता और आदर्श की पोषक है। सारतः प्रेमचंद रचित ‘कुछ विचार’ संग्रह समाज, साहित्य और भाषा के संवर्द्धन के विचारों का संग्रह है।

डॉ. बृजेन्द्र कुमार अग्निहोत्री
हिंदी विभाग, सिक्किम विश्वविद्यालय
5 मील, गंगटोक, सिक्किम -737102
मो. 9918695656


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