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ISSN 2292-9754

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10.24.2014


डॉ. रामविलास शर्मा : रवीन्द्रनाथ का जातीय चिन्तन

संपादक : सुमन कुमार घई
तिथी : नवम्बर ०१, २०१४

डॉ. रामविलास शर्मा हिन्दी आलोचना में मार्क्सवादी आलोचक के रूप में जाने जाते हैं। उनके चिंतन में ‘जातीय चेतना’ एक महत्वपूर्ण विषय रहा है। यही कारण है कि उन्होंने भारत के बड़े–बड़े साहित्यकारों के साहित्य का मूल्यांकन उनकी ‘जातीयता’ के सन्दर्भ में किया। उनकी दृष्टि में ‘गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर’ बांग्ला जाति के जातीय कवि हैं। उन्होंने अपनी रचनओं के द्वारा बंगला साहित्य को समृद्ध किया। वे "भारत के प्रतिनिधि कवि हैं। वह विश्वकवि भी हैं। विश्व मानवतावाद उनके साहित्य की महत्वपूर्ण धारा है। इस सबके साथ वह बंगाल के जातीय कवि भी हैं। .............बंगाल की धरती, बंगाल का इतिहास, बंगाल का साहित्य, बंगाल की सांस्कृतिक विरासत, ये सब रवीन्द्रनाथ के अक्षय प्रेरणास्त्रोत हैं।”1 रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने जातीय चेतना को विकसित करने के लिए अपने जातीय साहित्य को आधार बनाया। यह जातीय साहित्य उन्होंने परम्परा के माध्यम से अर्जित किया था। उनकी दृष्टि विशेष रूप से बांग्ला भाषा और साहित्य पर थी। जिसे उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर ऐश्वर्यशालिनी बनाया। बंगला साहित्य की श्रीवृद्धि करने में उन्हें अपार कीर्ति भी प्राप्त हुई। वह सारी कीर्ति अपने मार्गदर्शक गुरु विद्यासागर के चरणों में अर्पित कर देते हैं। विद्यासागर के प्रति उनके ह्रदय में अपार श्रद्धा एवं प्रेम है। वे चाहते थे कि बंगाली मानुष भी विद्यासागर के चरित्र का अनुसरण करके अपने जातीय चरित्र को बदलें। "बाँग्ला भाषा से वह (रवीन्द्रनाथ) विद्यासागर का ऐसा तादात्म्य स्थापित करते हैं कि समस्त उपलब्धियाँ विद्यासागर की उपलब्धियाँ बन जाती हैं। ऐसा उत्कट अनुराग सांस्कृतिक विरासत के प्रति रवीन्द्रनाथ ठाकुर के हृदय में हैं।”2 गुरुदेव ने अपनी अधिकांश रचनाओं में अपने गुरु ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के प्रति श्रद्धा व्यक्त की हैं।

गुरुदेव ने अपनी रचनाओं के माध्यम से बंगाली मानुष में जातीय चेतना का भाव जगाया। सांस्कृतिक स्तर पर उन्होंने बंगाली मानुष को एक सूत्र में जोड़ने का काम किया। उनकी प्रतिबद्धता बंगाल और वहाँ के लोगों के प्रति हैं। बंगाल के प्रति उनका यह अनुराग अनेक कविताओं में व्यक्त हुआ है :-

बाँग्लार माटी, बाँग्लार जल,
बाँग्लार वायु, बाँग्लार फल
पुण्य हऊक,पुण्य हऊक, पुण्य हऊक, हे भगवान
बाँग्लार घर, बाँग्लार हाट
बाँग्लार वन, बाँग्लार माठ
पूर्ण हऊक,पुर्ण हऊक, हे भगवान।
बांगालीर पन, बांगालीर आशा,

बांगालीर काज, बांगालीर भाषा
सत्य हऊक, सत्य हऊक,
सत्य हऊक, हे भगवान।
बांगालीर प्राण, बांगालीर मन
बांगालीर घरे जतो भाई बोन
एक हऊक, एक हऊक, एक हऊक, हे भगवान

(भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश : 2,पृष्ठ संख्या - 445)

रवीन्द्रनाथ "बंगाल की धरती, जल, वायु, प्राकृतिक सम्पदा, सबकी समृद्धि की कामना करते हैं। बंगाल के घर, हाट-बाजार, वन-मैदान, इन सबके पूर्ण होने की कामना करते हैं, बंगालियों कि आशाएँ, आकांक्षाएँ चरितार्थ हों, उनकी भाषा और उनका कर्म सफल हो, बंगालियों के मनप्राण एक हों, घर में जितने भाई-बहन हैं, वेसब एक हों। इस तरह जातीय एकता के लिए रवीन्द्रनाथ भगवान से प्रार्थना करते हैं।”3 वे चाहते हैं कि बंगाली मानुष अपनी जातीय विरासत पर गर्व करें, उसे आत्मसात करें एवं उसे आगे बढ़ाये। डॉ. शर्मा की दृष्टि में रवीन्द्रनाथ ने अपने जातीय प्रदेश से जनता के स्नेह सम्बन्ध को जोड़ा हैं। वे जातीय प्रदेश को वस्तुगत सत्य के रूप में देखते हैं। बंगाल की धरती और वहाँ की जनता से अपना तादात्म्य स्थापित करते हुए रवीन्द्रनाथ लिखते हैं –"इस बाँग्ला देश की मिट्टी, यहाँ का जल, यहाँ की वायु, यहाँ का आकाश, यहाँ के वन, यहाँ के खेत, हमें सब तरफ से घेकर विद्यमान हैं। इसने हमारे पितामहगण को अनेक युगों तक पाला-पोसा है। हमारी जो अनागत संतान है, उन्हें भी यह अपनी गोद में धारण करेगी। यह कल्याणी हमारे लिए पितृगण की अमर वाणी वहन करती हुई चलती रही है।”4

रवीन्द्रनाथ ठाकुर के जीवन का मूल उद्देश्य बांग्ला भाषा और साहित्य को आगे बढ़ाना था। उन्होंने अपनी रचनाओं में बराबर बांग्ला भाषा की रक्षा की हैं। उनके काव्य में जो मानवतावादी स्वर सुनाई पड़ता है, वह उनकी जातीय भाषा के माध्यम से ही अभिव्यक्त हुआ है। डॉ. शर्मा लिखते हैं - "जातीय भाषा के बिना किसी प्रकार के मानवतावाद की अभिव्यक्ति संभव नहीं है। जातीय भाषा छोड़कर, अंग्रेज़ी जैसी किसी भाषा को विश्वभाषा मानकर, जो लोग उसे अपनी अभिव्यक्ति का माध्याम बनाते हैं, वे अपनी समाज की मानवता से कट जाते हैं। उनके मानवतावाद का सम्बन्ध उनकी अपनी धरती से नहीं होता,वह काल्पनिक और निर्जीव हो जाता है। श्रेष्ठ मानवतावादी रवीन्द्रनाथ ठाकुर जाति और भाषा का महत्व खूब अच्छी तरह पहचानते थे।”5 इसलिए उन्होंने अंग्रेज़ी के जगह पर मातृभाषा को अभिव्यक्ति का माध्यम माना। "विदेशी साहित्य, विशेष रूप से अंग्रेज़ी साहित्य, से उन्होंने जो कुछ ग्रहण किया, वह हाशिये पर है। उसका संबंध अधिकतर काव्य रूपों से है। इन रूपों की अंतर्वस्तु बंगाली या भारतीय है।”6

गुरुदेव बांग्ला भाषा का चौमुखी विकास करना चाहते थे। उन्होंने अंग्रेज़ी के बदले हमेशा बांग्ला भाषा को आगे बढ़ाने का प्रयत्न किया। बांगला भाषा के महत्व को प्रतिपादित करते हुए वे कहते हैं - "आज बाँगला भाषा लाखों मनुष्यों की आपसी बातचीत का माध्यम है, उसका प्रकाश हजारों गली-कूचों में फैला हुआ है। उसके प्रकाश की पथ-रेखा अनुसरण करते हुए चले तों कहीं दूर दुर्गम जगत् में जा पहुँचेंगे।”7 अपने व्यवहारिक जीवन में गुरुदेव बड़े-बड़े अनुष्ठानों मे भाग लेते थे, वहाँ भी वे बांग्ला में ही बोलते नज़र आते थे। "1908 में उन्होंने बंगाल की प्रांतीय सभा के वार्षिक अधिवेशन में अध्यक्षता की। यहाँ अध्यक्ष के भाषण अंग्रेज़ी में हुआ करते थे। रवींद्रनाथ का भाषण बाँग्ला में था।”8 इस तरह रवीन्द्रनाथ ने अंग्रेज़ी की जकड़बंदी तोड़ी और बांगला भाषा के महत्त्व को समझाया। अंग्रेज़ी सरकार की शिक्षा नीति में भी उन्होंने अंग्रेज़ी के बदले मातृभाषा पर ज़ोर दिया। गुरुदेव ने जहाँ तक संभव हुआ अंग्रेज़ी के बदले मातृभाषा अपनाने के लिए जोर दिया। इतना ही नहीं अपने साहित्य में गुरुदेव ने बांगला भाषा के साथ अन्य भारतीय भाषाओँ का भी समर्थन किया हैं। डॉ. शर्मा लिखते हैं - "बांग्ला भाषा और साहित्य के प्रति अटूट निष्ठा रखते हुए भी वह बंगाल से बाहर की भाषाओं और साहित्य के प्रति अत्यंत उदार और सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाते थे। उनका जीवन उन सभी लोगों के लिए आदर्श है, प्रेरणा का अक्षय स्त्रोत है जो अपने जातीय उत्थान के साथ पूरे देश की प्रगति के लिए काम करना चाहते हैं।”9

डॉ. शर्मा ने रवीन्द्रनाथ की जातीय भाषा के साथ–साथ उनके जातीय साहित्य पर भी बराबर ध्यान दिया हैं। रवीन्द्रनाथ किशोरावस्था से ही बंगला साहित्य के प्रति सचेत थे। अपने जीवन के शुरुआती दौर में उन्होंने अनेक काव्य, नाटक आदि की रचना की थी। कविता, गीत लिखकर वे लोगों को सुनाते थे। 12 वर्ष की उम्र में उन्होंने ‘पृथ्वीराज पराजय’ नाम का नाटक लिखा था।1881 में ‘वाल्मीकि प्रतिभा’ नाम का संगीत नाटक रचा। रवीन्द्रनाथ को युवावस्था से ही नाटक लिखने, मंचित करने एवं अभिनय करने में रुची थी। नाटक का मंचन कराते समय वे मंच का विशेष ध्यान रखते थे जैसे- पात्रों के संवाद, उनकी वेश–भूषा, पार्श्व-ध्वनि, संगीत आदि। उनके नाट्य मंच की सबसे बड़ी विशेषता यह होती थी कि वे मंच को साज-सज्जा से भर नहीं देते थे। "जैसे शेक्सपियर के युग में स्टेज पर विशेष सज्जा का ध्यान न रखा जाता था, वैसे ही रवीन्द्रनाथ मंच की सज्जा को अधिक–से–अधिक सादा रखना पसंद करते थे जिससे लोगों का ध्यान पात्रों और विचारों के ऊपर केन्द्रित हो सके।”10 बंगाल में बहुत से नाटक लिखे और खेले जा रहे थे लेकिन रवीन्द्रनाथ की नाट्यधारा बिलकुल भिन्न थी। उनकी बहुत सी कविताओं में बंगाल के जन-जीवन का यथार्थ रूप में चित्रण हुआ है। "कल्पना हो या यथार्थ, नाव और नदी के बिना उनकी कविता पूरी नहीं होती। भारत में शायद ही किसी कवि के मूर्ति विधान में नाव और नदी की इतनी खपत हो जीतनी रवीन्द्रनाथ की कविता में है।........वर्तमान काल में भी बहुत-से लोगों ने उनकी कविताएँ पढ़कर मन में आनंद और उल्लास का अनुभव किया। पराधीन देश की जनता को काव्य से ऐसा आनंद देना, यह कम उपलब्धि नहीं थी। उनके साहित्य ने लोगों के मन में साहस का संचार किया, संघर्ष की प्रेरणा दी। लोगों ने उनका साहित्य पढ़कर परमुखापेक्षी होने के बदले अपनी भाषा और साहित्य पर गर्व करना सिखा।”11

गुरुदेव की बहुत सी कविताओं में लोकगीतों का प्रभाव दिखाई देता है। उनके गीतों की यह विशेषता होती थी की वह बंगाल के लोकगीतों के तत्व के साथ मिश्रित होती थी। ‘बाउल’ बंगाल का बहुत ही लोकप्रिय लोकगीत है। इन लोकगीतों का प्रभाव उनके गीतों पर भी पड़ा है। ‘बाउल’ के प्रति रवीन्द्रनाथ का जो लगाव है उसे उन्होंने स्वयं स्वीकार किया हैं। ‘बाउल पदावली’ के प्रति अपने अनुराग को व्यक्त करते हुए रवीन्द्रनाथ कहते हैं - "जिन लोगों ने मेरा लेखन पढ़ा है, वे जानते है कि बाउल पदावली के प्रति अपने अनुराग को मैंने अनेक लेखों में प्रकाशित किया है। जब मैं सियालदा में था तब बाउल दल के साथ मेरी बराबर मुलाकात और बातचीत होती थी। अपने अनेक गीतों में मैंने बाउल स्वर ग्रहण किया है और अनेक गीतों में राग –रागिनी के साथ, मेरे जानते हुए या ना जानते हुए बाउल सुरों का मिलन हुआ है।”12

डॉ. शर्मा की दृष्टि में रवीन्द्रनाथ अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद की कटू आलोचना की हैं। वे अंग्रेजो की साम्राज्यवादी नीतियों से भली-भांति परिचित थे। "अंग्रेज़ी राज में भारतीय जनता जिस तरह गरीबी और अशिक्षा में जीवन बिता रही थी, उसे वह अच्छी तरह जानते थे।”13 यही कारण है कि उन्होंने अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद की प्रखर आलोचना की। अंग्रेज़ी सरकार अपना साम्राज्य बढ़ने और उसे कायाम रखने के लिए यहाँ जातिवाद, रूढ़िवाद, सम्प्रदायवाद आदि को प्रश्रय दे रही थी। रवीन्द्रनाथ ने यह लक्ष्य किया कि अंग्रेज सरकार इन कुरीतियों को बढ़ावा देकर अपने साम्राज्य की नींव मजबूत करना चाहते हैं इसलिय गुरुदेव भारतीय समाज में फैले हुए इन कुरीतियों के लिए अंग्रेज़ी सरकार को दोषी ठहराते है एवं उनसे लड़ने के लिए पूरे भारतवासियों से विद्रोह की मांग करते हैं। रूस की तुलना भारत से करते हुए वे बहुत क्षुब्ध होते हैं। ऐसे में उन्हें भारत पर साम्राज्यवादी शासन ही दिखाई देता है। "इस साम्राज्य-विरोधी चेतना के साथ उनमें बड़ी गहराई से लोकतान्त्रिक भावना विद्यमान है। वह लोक में परिवर्तन चाहते है। शताब्दियों से वह जिस अवस्था में रहा है, उससे मुक्त देखना चाहते है। क्योंकि यहाँ उच्च वर्ग नहीं, मध्यवर्ग नहीं, बल्कि साधारण मेहनत करने वाले लोग हैं।"14

डॉ. शर्मा लिखते हैं – "बंगाल में साहित्य और शिक्षा संस्थाओं का आभाव नहीं था, फिर भी रवीन्द्रनाथ एक नयी काव्यधारा चलाई और शान्तिनिकेतन के रूप में उन्होंने नए विद्यालय की स्थापना की।”15 "वैसे तो विश्वभारती विश्व संस्कृति का प्रतिष्ठान थी लेकिन जोर भारतीय संस्कृति पर था।”16 विश्वभारती की स्थापना रवीन्द्रनाथ ठाकुर के जीवन का सपना था। इस सपने को साकार करने के लिए उन्हें आर्थिक रूप से काफी कष्ट भी उठाना पड़ा। विश्वभारती के माध्यम से वे भारतीय संस्कृति, साहित्य और कला का विकास करना चाहते थे। विश्वभारती में उन्होंने कई नए विषयों के अध्ययन की व्यवस्था की । "जनवरी,1938 में सी. एफ. एण्ड्रूज ने हिंदी-भवन का शिलान्यास किया।”17 "21 जनवरी को रवीन्द्रनाथ और सी. एफ. एण्ड्रूज की उपस्थिति में जवाहरलाल नेहरू ने हिंदी भवन का उद्घाटन किया।”18 ललित कला के विकास के लिए उन्होंने कला भवन की स्थापना की। 1919 के जलियावालाबाग हत्याकांड के बाद उन्होंने अपनी सर की उपाधि लौटा दी थी। "इस समय विश्वभारती में एक नए विभाग की स्थापना हुई। उसका नाम था विद्या भवन। उद्देश्य यह था की भारत सम्बन्धी उच्चतर अध्ययन के लिए यहाँ व्यवस्था हो।”19 फ्रांस के संस्कृत विद्वान सिल्वे लेबी की सहायता से विश्वभारती में चीनी, तिब्बती अध्ययन की व्यवस्था की गयी। शान्तिनिकेतन में गुरुदेव शिक्षा कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेते थे। अपना ज़्यादा समय वे शान्तिनिकेतन में बिताते थे। वहाँ वे स्वयं शिक्षक बने और विद्यार्थियों के साथ उन्हीं की तरह जीवन बिताते रहे।

अंततः, रवीन्द्रनाथ ठाकुर बंगला जाति के जातीय कवि हैं। उन्हें अपनी साहित्य, संस्कृति, कला, भाषा, प्रदेश और सांस्कृतिक विरासत पर बड़ा गर्व था। उनके साहित्य में बंगाल का जन-जीवन यथार्थ रूप में उभरकर सामने आया है। बंगाल के लोगों में जातीय चेतना का विकास हो, इसके लिए उन्होंने जीवन भर संघर्ष किया। बंगला भाषा के प्रति उनके मन में अगाध प्रेम था। इसलिए उन्होंने अपनी सम्पूर्ण रचनाएँ बाँग्ला भाषा में की। वे बंगाल के प्राय: हर किसी न किसी सामजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन से जुड़े हुए थे। सामजिक स्तर पर, वे ऊँच–नीच, भेद-भाव वाली पुरानी व्यवस्था को बदलकर समाज को नया रूप देना चाहते थे। जिसके लिए उन्होंने प्राचीन संस्कृति को अपनी रचना का प्रेरणा स्त्रोत बनाया।

सन्दर्भ-सूची

1.शर्मा रामविलास, भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश भाग : 2, संस्करण 2012, किताब घर प्रकाशन नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या-439
2.उपर्युक्त, पृष्ठ संख्या-439
3. उपर्युक्त, पृष्ठ संख्या –445
4. उपर्युक्त, पृष्ठ संख्या –444
5. उपर्युक्त, पृष्ठ संख्या –451,452
6. उपर्युक्त, पृष्ठ संख्या –471
7. उपर्युक्त, पृष्ठ संख्या –452
8. उपर्युक्त, पृष्ठ संख्या –458
9. उपर्युक्त, पृष्ठ संख्या –472
10. उपर्युक्त, पृष्ठ संख्या –472
11. उपर्युक्त, पृष्ठ संख्या –470
12. उपर्युक्त, पृष्ठ संख्या –443
13. उपर्युक्त, पृष्ठ संख्या –448
14. उपर्युक्त, पृष्ठ संख्या –448
15. उपर्युक्त, पृष्ठ संख्या –471
16. उपर्युक्त, पृष्ठ संख्या –461
17. उपर्युक्त, पृष्ठ संख्या –469
18. उपर्युक्त, पृष्ठ संख्या –469
19. उपर्युक्त, पृष्ठ संख्या –462

बिजय कुमार रबिदास
शोधार्थी
विश्व-भारती (शांतिनिकेतन)
मोबाइल -8100157970
ई –मेल –bijaypresi@rediffmail.com


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