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ISSN 2292-9754

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06.05.2017


रामविलास शर्मा : प्रेमचन्द का साहित्यकर्म

रामविलास शर्मा हिन्दी आलोचना में मार्क्सवादी आलोचक के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने अपना पहला लेख निराला पर लिखा था और पहली आलोचना पुस्तक प्रेमचन्द पर लिखी थी। प्रेमचन्द पर उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं- पहला "प्रेमचन्द"(1941) और दूसरा "प्रेमचन्द और उनका युग"(1952)। "प्रेमचन्द" उनकी पहली कृति है। यहीं से वे हिन्दी आलोचना में प्रवेश करते हैं और एक सफल आलोचक के रूप में अपनी पहचान बनाते हैं। उनकी दृष्टि में प्रेमचन्द का साहित्य वर्तमानकालीन सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों को समझने के लिए आज भी प्रासंगिक है। उनके साहित्य की प्रासंगिकता पर विचार करते हुए वे लिखते हैं, "प्रेमचन्द भारतीय समाज के लिए सदा प्रासंगिक रहे हैं पर पिछले दिनों उनकी प्रासंगिकता और बढ़ गई है। हमारा समाज आगे बढ़ने के बदले पीछे जा रहा है। जिस पिछड़ेपन के विरुद्ध प्रेमचन्द ने संघर्ष किया था, वह विशेष रूप से हिन्दी प्रदेश में सघन हो गया है। आर्थिक स्तर पर जनता की गरीबी अपनी जगह है, राजनीतिक स्तर पर देश के विघटन की समस्या और तीव्र हो गयी है। सांस्कृतिक स्तर पर द्विज और शूद्र का भेद, हिन्दू और मुसलमान का भेद, और बढ़ा है।"1 इन पंक्तियों में रामविलास शर्मा ने प्रेमचन्द के सम्पूर्ण साहित्य का उद्देश्य प्रस्तुत कर दिया हैं। उन्होंने प्रेमचन्द के माध्यम से वर्णव्यवस्था, जातिप्रथा, ज़मींदारी प्रथा, महाजनी सभ्यता, किसानों की समस्या और स्वाधीनता आंदोलन पर गम्भीरता से विचार किया हैं।

रामविलास शर्मा ने अपने चिन्तन में प्रेमचन्द की कहानियों एवं उपन्यासों का तुलनात्मक अध्ययन किया हैं। उनकी दृष्टि में प्रेमचन्द हिन्दी के अच्छे कहानीकार हैं। उनकी "लगभग पचास कहानियाँ ऐसी होंगी जो हिन्दी में अपना अमर स्थान बना चुकी हैं। हिन्दुस्तान की जिन दूसरी भाषाओं में उनकी कहानियों का अनुवाद हुआ है, उनमें भी उनकी लोकप्रियता"2 कम नहीं है। प्रेमचन्द ने ग्रामीण कथाओं से कहानी कहना सीखा था। उनकी कहानियों का सीधा संबंध ग्रामीण जीवन से है। इस सन्दर्भ में रामविलास शर्मा लिखते हैं, "उनकी काफी कहानियाँ ऐसी हैं जिनमें ग्रामीण कथाओं का रस और उनकी शैली अपनाई गई है। आमतौर से उनकी कहानियों में जो एक ठेठपन है, पाठक के हृदय में अपनी बात को सीधे उतार देने की जो ताकत है, वह उन्होंने हिन्दुस्तान के अक्षय ग्रामीण कथा-भण्डार से सीखी"3 थी। यही कारण है कि "किसानों और स्त्रियों में उनकी कहानियाँ तुरंत लोकप्रिय"4 हुई। उनकी कहानियों में एक तरह का लोकरस है। कथा में कसाव है और शैली में व्यंग्यात्मकता है जैसे "मुक्तिमार्ग" कहानी में प्रेमचन्द लिखते हैं, "सिपाही को अपनी लाल पगड़ी पर, सुंदरी को अपने गहनों पर और वैद्य को अपने सामने बैठे हुए रोगियों पर जो घमंड होता है, वही किसान को अपने खेतों को लहराते हुए देखकर होता है।"5 प्रेमचन्द ने यहाँ एक ही वाक्य में कितनी भावपूर्ण बातें कह दी है। उनकी कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने ग्रामीण जीवन को अपनी कहानी का मुख्य आधार बनाया था। लेकिन वे सारी कहानियाँ एक जैसी नहीं है। कथा की दृष्टि से उनकी प्रत्येक कहानी एक दूसरे से भिन्न है। उनमें पर्याप्त विभिन्नता है।

रामविलास शर्मा के अनुसार प्रेमचन्द ने मनोरंजन के उद्देश्य से कहानियाँ नहीं लिखी हैं। "उनकी कहानियों का संबंध उन समस्याओं से है। जिनका सामना आये दिन लोगों को अपने जीवन में करना पड़ता है।"6 उनकी कहानियों में "कोई-न-कोई सुझाव, जीवन के प्रति नया दृष्टिकोण, किसी समस्या का हल ज़रूर मिलता है।"7 जैसे "मृतक -भोज" कहानी में उन्होंने समाज में प्रचलित कुरीतियों पर प्रहार किया है। साथ ही धार्मिक अंधविश्वासों से पंडे और पुरोहित कैसे लाभ उठाते है, उसका भी चित्रण किया हैं। प्रेमचन्द अपनी कहानियों में कहीं भी उपदेश देते हुए नज़र नहीं आते बल्कि ऐसा चित्र पाठकों के सामने रखते हैं मानों सभी पात्र और घटनाएं आँखों के सामने दिखाई देने लगते हैं।

प्रेमचन्द ने अपनी कहानियों में घटना कौतूहल उत्पन्न करने के बजाय चरित्र-चित्रण करने में ज़्यादा रुचि दिखाई है। "उनकी कहानियों में घटनाओं का वैसा महत्व नहीं है जैसा चरित्र का। वह पाठक को सनसनीखेज घटनाओं से चौंका देना पसंद नहीं करते।"8 उनकी बहुत कम ऐसी कहानियाँ है, जिसमें घटना कौतूहल दिखाने की कोशिश की गई है। ज़्यादातर वे सीधी, सरल और सपाट रूप में कहानी कहना शुरू करते हैं। ऐसी कहानियों में वे चरित्र-चित्रण करने में पूरी तरह सफल रहे हैं। "उनके चरित्र-चित्रण की यह बहुत बड़ी सफलता है कि थोड़ी देर के संपर्क से ही उनके पात्र बहुत दिनों के परिचित- जैसे लगने लगते हैं और कहानी ख़त्म कर देने पर भी पाठक को बहुत दिनों तक याद रहते हैं।"9

रामविलास शर्मा ने प्रेमचन्द की कमज़ोर कहानियों पर भी ध्यान दिया है। उनका कहना हैं, प्रेमचन्द ने अपनी कुछ कहानियों में कहीं-कहीं पर घटना-वैचित्र्य दिखाने की कोशिश की है लेकिन वे वहाँ सफल नहीं हो पाए हैं। "डामुल का कैदी" ऐसी ही एक कहानी है जिसमें घटना वैचित्र्य उत्पन्न करने की कोशिश में कहानी अपनी रोचकता खो देती है। उनकी कुछ कहानियाँ ऐसी भी है, जिसे पढ़कर लगता है मानों वे अपने पात्रों का चरित्र-चित्रण करने में लगे हुए हैं। इसी तरह "उनकी सबसे असफल कहानियाँ वे हैं जिनमें उनका उद्देश्य हृदय-परिवर्तन दिखलाना है।"10 ऐसी कहानियों में यथार्थवादी चित्रण अपनी चमक खो दिया है और आदर्श का मुलम्मा ज़बरदस्ती चढ़ाने की कोशिश दिखाई देती है। रामविलास शर्मा ने प्रेमचन्द की उन कहानियों को सबसे सफल माना हैं, जिसमें वे किसानों के जीवन का चित्रण करते हैं। किसानों में राग-द्वेष, अंधविश्वास, रूढ़िवाद, जात-पात, प्रेम, भाई-चारा आदि कैसे काम करता है, उसका चित्रण करने में वे पूरी तरह सफल रहे हैं। उन्होंने अपनी कहानियों में साधारण जनों को सबसे ऊँचा स्थान दिया है। साधारण जनों में भी किसानों और अछूतों से उनकी गहरी सहानुभूति थी। "पूस की रात", "सद्गति" और "कफ़न" जैसी कहानियों में उनकी सहानुभूति स्पष्ट झलकती है।

प्रेमचन्द एक सफल उपन्यासकार भी हैं। उनकी रुचि शुरू से उपन्यास पढ़ने और लिखने की ओर थी। उन्होंने लगभग एक दर्जन उपन्यास लिखे हैं। "गोदान" उनका श्रेष्ठ उपन्यास है। रामविलास शर्मा ने उसका विश्लेषण ऋण की समस्या से अलग हटकर किसान-ज़मींदार और किसान-महाजन की समस्याओं के सन्दर्भ में किया हैं। उनके अनुसार प्रेमचन्द ने "गोदान" में महाजनों का सबसे निर्मम और क्रूर चरित्र प्रस्तुत किया है। ये महाजन मनुष्यहीनता, पैसे को दाँत से पकड़ने वाले और पैसे के लिए आसामी का चिता तक पीछा करने वाले होते हैं। दया, माया, करुणा, उपकार जैसी मानवीय भावनाओं से ये कोसों दूर हैं। इस वर्ग के प्रपंचपूर्ण जीवन को ख़ुलासा करने में प्रेमचन्द ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। गोदान में होरी मुख्य पात्र है। "वह उन तमाम ग़रीब किसानों की विशेषताएँ लिए हुए है जो ज़मींदारों और महाजनों की धीमे-धीमे लेकिन बिना रुके हुए चलनेवाली चक्की में पिसा करते हैं"11 होरी का शोषण सीधे-सीधे ज़मींदारों या अँग्रेज़ों द्वारा नहीं होता बल्कि गाँव के बड़े-बड़े सूदखोर एवं महाजनों द्वारा होता है, रामविलास शर्मा लिखते हैं, "यहाँ सीधे-सीधे रायसाहब के कारिंदे होरी का घर लूटने नहीं पहुँचते। लेकिन उसका घर लुट ज़रूर जाता है। यहाँ अँग्रेज़ी राज के कचहरी-क़ानून सीधे-सीधे उसकी ज़मीन छीनने नहीं पहुँचते। लेकिन ज़मीन छिन ज़रूर जाती है।"12 प्रेमचन्द ने गोदान में यह दिखलाया है कि गाँव में महाजनों का शोषण जितना निर्मम और प्राणघातक है उतना तो ज़मींदारों या विदेशी शासकों का भी नहीं है। ऊपर से देखने में ये एकदम साधारण सूदखोर लगते है लेकिन गहराई से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि ये किसानों के सबसे बड़े शत्रु हैं।

प्रेमचन्द ने महाजनी सभ्यता का शोषक रूप गोदान में चित्रित किया हैं। ज़मींदारों और महाजनों के अमानवीय रूप से वे भली-भाँति परिचित थे। ज़मींदार और महाजन में भेद करते हुए होरी के माध्यम से वे कहते हैं, "ज़मींदार तो एक ही है; मगर महाजन तीन-तीन हैं, सहुआइन अलग, मँगरू अलग, और दातादीन पंडित अलग।"13 पाँच साल पहले होरी ने मँगरू से साठ रुपये उधार लिए थे। वह साठ रुपये दे चुका है लेकिन ब्याज के साठ रुपये अभी बाक़ी हैं। आलू बोने के लिए उसने दातादीन पंडित से तीस रुपये उधार लिए थे। आलू तो चोर ले गए लेकिन उस तीस रुपये के अब तीन सौ हो गए। दुलारी सहुआइन नोन-तेल-तमाखू की दूकान लगाती है लेकिन बकाया ब्याज समेत वसूल करती है। इसी तरह होरी का लड़का गोबर जब विधवा झुनिया को घर लाता है, तब बिरादरी में डाड़ लगती है और बदले में होरी को अपना घर गिरवी रखना पड़ता है। होरी की तो नौबत बैल बेचने तक की आ जाती है लेकिन पटेश्वरी और दातादीन उसका विरोध करते हैं। उन्हें डर है कि अगर बैल बिक गए तो होरी खेती कैसे करेगा? यहाँ ध्यान देने वाली बात है, पटेश्वरी और दातादीन को होरी से कोई सहानुभूति नहीं है। उन्हें डर इस बात का है कि अगर होरी का सब कुछ नीलाम हो गया तो उनकी दूकान कैसे चलेगी? इस तरह गोदान में "महाजन आसामी को जान से ही नहीं मारना चाहते। वह मर गया तो उनकी कमाई का द्वार ही बंद हो जायगा। इतना उसके लिए वह करना चाहते हैं कि वह जीता रहे और कमा-कमाकर उनका घर भरता रहे।"14 होरी तबाह इसलिए नहीं होता कि वह कर्ज़ के तले दबा हुआ है बल्कि तबाह इसलिए होता है कि उसका श्रमफल महाजनों द्वारा लूटा जाता है। होरी की कथा उन छोटे निर्धन किसानों की कथा है, जो महाजनी सभ्यता के प्रसार के कारण भूमिहीन होकर मज़दूरी करने के लिए बाध्य हो जाता है।

महाजनी शोषण का सीधा संबंध ज़मींदारी प्रथा से है। महाजन उसी ज़मींदार वर्ग का एक हिस्सा है। किसानों के शोषण से लूट का जो पैसा आता है, उसका बहुत बड़ा हिस्सा ज़मींदारों के पास जाता है। गोदान में छोटे-छोटे महाजनों के मुखिया रायसाहब है। रायसाहब अपने असामियों से बड़े प्यार से मिलते हैं। उनके साथ बड़ी सहानुभूति दिखाते हैं। लेकिन जब लगान वसूल करने का समय आता है तो उनके साथ कोई रिआयत नहीं दिखाते। उनके चरित्र के बारे में रामविलास शर्मा लिखते हैं, "रायसाहब उन हिंसक पशुओं में हैं जो गरजने और गुर्राने के बदले मीठी बोली बोलना सीख गए हैं। शिकार अपनी जान से हाथ धोता है लेकिन मीठी बोली सुनता हुआ, अपाहिज होकर, गरजने और गुर्राने से सावधान होकर उस जंगली पशु से लड़ता हुआ नहीं।"15 रायसाहब अपने असामियों से देर तक बाते करते हैं। उनका व्यवहार साधारण मनुष्य जैसा लगता है। "मानो इस तरह वह जताना चाहते हों कि वह असामियों को अपनी ही तरह का मनुष्य समझते हैं"16 उनके चरित्र का दोहरापन तब दिखाई देता है जब चपरासी आकर सूचना देता है कि बेगारों ने काम करना बंद कर दिया है, इस पर क्रोध में रायसाहब कहते हैं, "चलो मैं इन दुष्टों को ठीक करता हूँ। जब कभी खाने को नहीं दिया, तो आज यह नई बात क्यों? एक आने रोज़ के हिसाब से मज़दूरी मिलेगी जो हमेशा मिलती रही है, और इस मज़दूरी पर उन्हें काम करना होगा, सीधे करें या टेढ़े।"17 इस एक वाक्य से पता चलता है कि रायसाहब अपने असामियों से कितना प्यार करते हैं। प्रेमचन्द ने महाजनी और ज़मींदारी प्रथा का भयानक रूप गोदान में चित्रित किया हैं।

"कर्मभूमि" प्रेमचन्द का दूसरा महत्वपूर्ण उपन्यास है। यह उपन्यास स्वाधीनता आंदोलन के उस दौर का है जब लोग अँग्रेज़ी शासन के अधीन रहना अन्याय समझते थे। लोग अँग्रेज़ी शासन और उनके अत्याचार के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे थे। इस उपन्यास में प्रेमचन्द ने स्वाधीनता आंदोलन का चित्र प्रस्तुत किया हैं। "कर्मभूमि" में "यह आंदोलन एक ज़बरदस्त सैलाब की तरह तमाम जनता को अपने अन्दर समेट लेता है। विद्यार्थी, किसान, अछूत, स्त्रियाँ, शिक्षक, व्यापारी, मज़दूर- सभी इसके प्रवाह में आगे बढ़ चलते हैं।"18 उपन्यास में मूल रूप से "ज़मीन की समस्या, लगान कम करने की समस्या, खेत-मज़दूरों और ग़रीब किसानों के लिए ज़मीन की समस्या"19 को उठाया गया है। प्रेमचन्द ने इस उपन्यास में अपना ध्यान भारत के उन शोषितों, गरीबों, पीड़ितों, दलितों, किसानों के ऊपर केन्द्रित किया है जो आए दिन अँग्रज़ों के शोषण का सबसे ज़्यादा शिकार होते थे। उनकी दृष्टि में "हिन्दुस्तान की आज़ादी इन ग़रीबों के लिए सबसे पहले है और वे आज़ादी की लड़ाई में सबसे बड़ी ताक़त भी है।"20 कर्मभूमि में प्रेमचन्द ने किसानों और मज़दूरों को एक ही मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है। उनका मानना है, किसान लगानबन्दी के ज़रिए अँग्रेज़ों का शासनतंत्र ठप कर सकते हैं और मज़दूर कामबन्दी के ज़रिए अँग्रेज़ों के विरोध में किसानों का साथ दे सकते हैं। कर्मभूमि में पहली बार मज़दूरों के साथ विद्यार्थियों को भी आंदोलन करते हुए दिखाया गया है। इसी तरह प्रेमचन्द ने हिन्दुओं के साथ मुसलामानों को भी इस आंदोलन में शामिल कर लिया हैं। उनका कहना है, हिन्दुओं और मुसलमानों की समस्या एक है। इसलिए उन्हें मिलकर अँग्रेज़ों का सामना करना चाहिए। इस तरह प्रेमचन्द ने राष्ट्रीय आंदोलन की एक महत्वपूर्ण कड़ी को पकड़ा था और उसका चित्र "कर्मभूमि" में प्रस्तुत किया है।

प्रेमचन्द का प्रत्येक उपन्यास किसान जीवन की गाथा है। उसमें जीवन का कोई न कोई पक्ष ज़रूर उद्घाटित किया गया है। "प्रेमाश्रम" में उन्होंने किसानों और ज़मींदारों के संघर्ष पर ध्यान दिया हैं। इस उपन्यास में उन्होंने दिखलाया हैं, "ज़मीन के वास्तविक स्वामी किसान है जबकि उसके मालिक बन बैठे हैं अँग्रेज़ और उनके दलाल। इसलिए अँग्रेज़ों के बनाए हुए क़ानून-उनकी क़ायम की हुई कचहरियाँ और शान्ति और व्यवस्था की रखवाली पुलिस-किसानों को दबाने में सबसे आगे रहते थे।"21 गोदान की तरह "प्रेमाश्रम" भी कृषक जीवन की गाथा है। अँग्रेज़ी साम्राज्यवाद एवं ज़मींदारों-जागीरदारों के आपसी संबंधों को समझे बिना "प्रेमाश्रम" को नहीं समझा जा सकता।

स्त्री जीवन की समस्या पर आधारित "सेवासदन" प्रेमचन्द का महत्वपूर्ण उपन्यास है। रामविलास शर्मा के अनुसार सेवासदन में मुख्य समस्या वेश्या-जीवन की नहीं है। सुमन उपन्यास के केन्द्र में है इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि उपन्यास वेश्या-जीवन पर आधारित है, वे लिखते हैं, "सेवासदन की मुख्य समस्या भारतीय नारी की पराधीनता है। प्रेमचन्द ने किसी तरह तमाम पुरानी सांस्कृतिक परम्पराओं को तोड़ते हुए वर्तमान समाज में नारी की पराधीनता को अपने निठुर और वीभत्स रूप में चित्रित किया है।"22 प्रेमचन्द ने "सेवासदन" में नारी समस्या की छानबीन गहराई से की है। उन्होंने दिखलाया है "वेश्यावृत्ति को पैदा करनेवाले और पालने-पोसनेवाले स्वार्थ समाज में मौजूद थे। इन स्वार्थों के निर्मूल हुए बिना किसी तरह का समाज-सुधार संभव नहीं।"23 "निर्मला" और "गबन" उनकी कला के अच्छे उदहारण है। दोनों में घरेलू जीवन का चित्रण हुआ है। दोनों उपन्यास का फलक छोटा है। फलक तब बड़ा होता है जब वे रंगभूमि या गोदान जैसे उपन्यास लिखते हैं। रियासतों के पुराने राजाओं और ज़मींदारों का भरा-पूरा चित्रण उन्होंने "कायाकल्प" में किया है।

रामविलास शर्मा ने प्रेमचन्द के पूरे कथा साहित्य को सामने रखकर उसका विश्लेषण किया हैं। उन्होंने प्रेमचन्द के उपन्यासों एवं कहानियों का विवेचन वर्गों के आधार पर किया है और उन्हें संसार के बड़े से बड़े उपन्यासकारों के बराबर माना है। उनकी दृष्टि में प्रेमचन्द बहुत अच्छे कहानीकार हैं और उपन्यासकार भी। उन्होंने बेशक़ बहुत-सी अच्छी कहानियाँ लिखी हैं लेकिन "यदि उन्हें तोल्स्तोय, दोस्तोएव्स्की, मैक्सिम गोर्की, टॉमस हार्डी जैसे कलाकारों के समकक्ष रखना हो तो वहाँ कहानियों से काम चलनेवाला नहीं"24 है। इसके लिए उपन्यासों को भी साथ रखना ज़रूरी होगा। वर्ग-संघर्ष का चित्रण करने के लिए उपन्यास जैसी विधा का प्रयोग करना पड़ता है। "यदि हम वर्ग-संघर्ष पर ध्यान केन्द्रित करें तो देखेंगे कि फ्रांस, रूस, इंग्लैंड, अमेरीका के बड़े-बड़े कथाकार उपन्यासों में ही वर्ग-संघर्ष का भरा-पूरा चित्रण कर सके हैं।"25 प्रेमचन्द ने अपने उपन्यासों में वर्ग-संघर्ष का चित्रण सफलतापूर्वक किया है। उन्होंने अपने उपन्यासों में जीवन के प्रत्येक पक्ष को उद्घाटित किया हैं, रामविलास शर्मा लिखते हैं, "दुनिया के और बड़े उपन्यासकार किसानों का चित्रण करते हैं तो उन्हें पार्श्वभूमि में रखते हैं। उनके नायक या तो धनी किसान होते हैं, जैसे हार्डी में, या उच्चवर्ग के लोग होते हैं, जैसे तोल्स्तोय में। ग़रीब किसान मुख्य भूमि में आकर नायक की भूमिका नहीं निभाते। उन्हें नायक बनाना और कथा को सरस बनाए रखना बहुत ही कठिन कार्य था। यह कठिन कार्य प्रेमचन्द ने"26 कर दिखाया है। उनके यहाँ किसान मुख्य भूमिका में है। किसानों के जीवन का जैसा भरा पूरा चित्रण उन्होंने किया है, वैसा दूसरा कथाकार अब तक नहीं कर सका। "यदि उनके उपन्यास हटा दिए जाएँ, तो वे बहुत अच्छे कहानीकार रह जाएँगें लेकिन विश्व-साहित्य में उनका स्थान उतना ऊँचा न रहेगा जितना इन उपन्यासों के बल पर आज है।"27

अंततः प्रेमचन्द का साहित्य भारतीय समाज का दर्पण है। किसानों के सामाजिक जीवन का चित्रण करने में हिन्दी साहित्य में क्या पूरे भारतीय साहित्य में उनके जैसा दूसरा लेखक पैदा नहीं हुआ। उनके साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे समाज के प्रत्येक वर्गों एवं स्तरों के लोगों का चित्रण यथार्थ रूप में करते हैं। वे पहले ऐसे लेखक हैं, जिन्होनें अपने साहित्य में यह दिखलाया है कि स्वाधीनता आंदोलन की लड़ाई किसानों एवं दलितों के बिना नहीं लड़ी जा सकती। उनका साहित्य हिन्दी भाषी जनता का गौरवपूर्ण साहित्य है। उनकी आवाज़ सुनकर हमें अपने देश एवं जनता पर गर्व होता है। उनकी आवाज़ भारत की अजेय जनता की आवाज़ है।

बिजय कुमार रबिदास
पी-एच.डी.(शोध छात्र)
विश्व भारती शांतिनिकेतन
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16 WEST KAPTE PARA ROAD
P.O-ATHPUR, DIST-24PGS(N)
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MOB 9432345604
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सन्दर्भ-सूची

1. शर्मा, रामविलास, प्रेमचन्द और उनका युग, पहला छात्र संस्करण, 1993, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 3
2. उपरोक्त, 110
3. उपरोक्त, 110
4. उपरोक्त, 111
5. उपरोक्त, 111
6. उपरोक्त, 117
7. उपरोक्त, 112
8. उपरोक्त, 112
9. उपरोक्त, 112
10. उपरोक्त, 112
11. उपरोक्त, 97
12. उपरोक्त, 97
13. शर्मा, रामविलास, प्रेमचन्द, पहला संस्करण,1941, राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 94
14. उपरोक्त, 94
15. शर्मा, रामविलास, प्रेमचन्द और उनका युग, पहला छात्र संस्करण, 1993, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 98-99
16. उपरोक्त, 99
17. उपरोक्त, 101
18. उपरोक्त, 81
19. उपरोक्त, 81
20. उपरोक्त, 81-82
21. उपरोक्त, 44
22. उपरोक्त, 31
23. उपरोक्त, 42
24. शर्मा, रामविलास, अपनी धरती अपने लोग, पेपर बैक संस्करण, 2010, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 110
25. उपरोक्त, 110
26. उपरोक्त, 111
27. उपरोक्त, 111


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