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ISSN 2292-9754

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05.05.2018


गुनाहों की दुनिया में

 “ओह ! .... कितना बीहड़ पथ है जीवन का?”

मधुर आवाज़ ने, जिसमें पीड़ा थी; निस्तब्धता का निवारण किया, परन्तु निवृत वह भी हो गयी जग से, अखण्ड हो गयी नीरवता फिर से। नभमण्डल का तारा पथ सजाये विभावरी अलभ्य अलौकिक शृंगार किये प्रीतम के मधुर मिलन की प्रतीक्षा में मधुरस घोल रही थी। मारुत के मन्द श्वास निखिल धरिणी की काया में बिखर रहे थे-सनसनी सी होती थी। कुमुद की कौमुदी में सौरभ फैल रही थी। तारादीप झिलमिला रहे थे। विचारों का आवर्त विवर्त कल्पना की उड़ानें भरता हुआ मन की घाटियों से टकराकर लौट-लौट आता था।

महानील के नीचे धरती की गोद में बीहड़ कानन पथ पर एक अनिन्द्य सुन्दरी बैठी थी; माया भी छलना भी। माया क्यों थी? विधि के उपहारों से, सुन्दर बहारों से। छलना क्यों थी? जग उसको कहता जो था, विभावरी की भान्ति उसकी आहों में प्रियतम की मिलन माधुरी के रत्नदीप नहीं थे वरन् उसी के चतुर्दिक फैले निविड़, तमिस्र, सम्भ्रान्त कानन के मौन के सदृश् मौन-मौन नैराश्य दहक-दहक जाता था जिसकी शाश्वत वह्नि से उसका मन झुलस रहा था। भूत भविष्य की स्मृतियों में उसे नीरव वर्तमान भी कलरव क्रन्दित प्रतीत हो रहा था। जग जगती जब सोती थी, तब वह अपने नीरव सोये हुए वेदनाक्रान्त भाग्य को जगाने जा रही थी; परन्तु, वह यामिनी के अनिन्द्य सौन्दर्यविहित आँचल में सोता ही जाता था। विचारावलि की झिलमिलाहट अचानक रुकी, एक आहट के साथ। वन्य पशुओं से उसको उतना भय न था जितना कि मनुज पशु से। वन्यों के द्वारा उसका जीवन निमिषमात्र में महानिद्रा में सो सकता था, जिससे वह अह रह संतापित था। क्योंकि उसकी आशायें रजनी के निविड़ अन्धकार के सदृश बीहड़ भविष्य में विलय हो रही थीं। मनुज से उसे घृणा हो रही थी क्योंकि उसके सन्तापों ने उसके जीवन को निरीह बना दिया था। निराशाओं में घुल-घुल कर उसको स्वयं से भी घृणा होने लगी थी। परन्तु, यह आहट मानव और पशु दोनों में से किसी का कृत कार्य नहीं था अपितु मारुत के झोकों ने उसे भयातुर कर दिया था। तरुवर से एक सूखा ईंधन गिरा था ...कड़क.... कड़क ...खट्.... खट्.... सरड़... सरड़..सटक.....। देर तक अवाक्, निश्चेष्ट रहकर वह पुनः स्वस्थ हो गई परन्तु मन को अवकाश कहाँ?.…

जीवन के धुँधलके में भावावेश..... नवनवीन घटनाक्रम..... विविध युद्ध जीवन संगर के…

न भाई न बहिन... माता-पिता की इकलौती बेटी, दीन कृषक रघुआ की बेटी- निमि। गाँव की सुन्दर छवि ने उसे सँवारा था। पिता जीवट के कर्म करते-करते पुत्र की उद्विग्न आशा को मन में एक कृपण की पूँजी के सदृश निहित किये ही वृद्ध हो गये। तब वह सात वर्ष की थी। शिशिर की वक्र दृष्टि द्रुमदल पर विचर रही थी। सिसकियाँ भरकर पवन के झकोरों के साथ पीतपर्ण लताओं से विदा लेते थे। सन्ताप भरा पवन आगे बढ़ रहा था; किसी अदृष्ट की ओर।

“भयंकर शीत है, प्राण निकले से जाते हैं,” माता का अवसाद मुखर हो रहा था।

आ..!! ...बेटी निमि !....अग्नि के निकट बैठ, यहाँ शीत कम है।”

पिताजी को भी बिठा दो न माँ आग के निकट, खाट पर पड़े ठिठुर रहे हैं वे।”

“नहीं बेटी नहीं.... वह नहीं बैठ सकेंगे। अच्छा तो चल अग्नि कुंड उन्हीं के समीप ले चलें।”

“और ओढ़ा दो माँ उनको कुछ।”

“अब नहीं रहे बेटी, दो ही कम्बल तो थे उनको भी ओढ़ा दिया मैंने।”

“और हम कैसे सोयेंगीं माँ!”

“आ!...निमि... आग के पास मेरी गोदी में सो जा।”

“और माँ तुम?”

दीनता विदग्ध वेदना से माँ के नेत्र सजल हो उठे। माता के अनुकूल न जानकर फिर उसने यह बात न पूछी।

“अच्छा माँ अब नहीं लगेगा शीत अग्नि के निकट।”

अर्द्ध रात्रि की भयावह श्याम वेला! विश्व निद्रापक्षी के पंखों में सिमटकर नीरव हो गया, परन्तु; इस वेला में यह परिवार जाग रहा है, रुग्ण कृषक का परिवार, नग्न खाट पर दो कम्बलों को तन पर लपेटे हुए रुग्ण कृषक पड़ा है। आसन के लिए घर में चटाई नहीं। सीलन से माँ बेटी ठिठुर रही हैं। कितना प्रतिरोध है उनके तन में। क्षण क्षण आँखों से गुज़र रहा है रजनी का।

वृद्ध का श्वास अवरोध पा रहा था, रह-रह कर वृद्धावय चिर संगिनी खाँसी धौंकनी की तरह शरीर का आलोड़न -विलोड़न कर रही थी। वृद्ध कृषक के विवर्ण मुख पर कातर –सतृष्ण आँखें पुत्री को निहार रही थीं।

“निमि!....आ...बेटी!!…," खाँसी का कर्कश-स्वर यन्त्रित होता है, सम्पूर्ण जरा-जर्जर अस्थि-पिंजर आक्रान्त होकर आर्त वेदना से कराह उठता है।

“आ...बेटी आ मेरे पा...स आ....।”

निमी उठकर पिता के शयन के पास बाल सुलभ चंचलता लेकर खड़ी हो जाती है। वृद्ध ने कठोर जराग्रस्त रक्त वाहिकाओं से युक्त हाथों से निमि के बाल करों को थाम कर चूम लिया। दीपक के धुँधले प्रकाश में वृद्ध ने उसकी माँ पर एक दृष्टि क्षेप के साथ एक दीर्घ निःश्वास लिया जो मारुत में ऐसा विलीन हुआ कि फिर कभी न लौटा।

“पिताजी!... पिताजी !!! हैं!!!... तुम कैसे देख रहे हो मुझको....पिताजी.....!!!!”

अब घर में तीन शरीर थे परन्तु प्राणी दो ही थे। अकेले घर में दरिद्रता के अतिरिक्त उनका कौन था? माता के आर्त रुदन से सकल वातावरण असहाय हो रहा था जो श्यामला यामिनी में अति भयावह प्रतीयमान हो रहा था। टुकुर-टुकुर निमि की आँखें निश्चेष्ट पिता का विवर्ण मुख निहार रही थीं।

ऊषा की मधुर स्मिति का आलोक विश्वमण्डल को नव जागरण, नव नवीन प्रेरणाओं का सन्देश विकीर्ण कर रहा था किन्तु निमि को आज वह मृत्यु की प्रवंचना, दुर्दान्त घुटन और महाकाल का अट्टहास प्रतीयमान्‌ हुआ था तथा वह प्रेमिल अरुणिमा महाकालिका के खप्पर के रुधिर की विभीषिका प्रस्तुत कर रही थी। जिस ग्राम सुषमा ने उसका रूप सँवारा था वह आज उसके कोमल बाल हृदय को चीर कर काटने दौड़ रही थी। कठोर जग का पाठ पढ़ा रही थी।

विधि के ये कुटिल विधान थे। रघुआ की चिता में अग्नि प्रबल हो रही थी। दूर चिता से ऊँचा उठता हुआ धूम गृह के अजिर से राका और निमि सजल नेत्रों से देख रही थीं। निमिषमात्र में पंचभूत का चंचल संयोग विखण्डित होकर विलीन हो गया और स्मृति के लिए कटु वेदना इस भौतिक जीवन के कोरक में छोड़ गया।

उसने गगनांगन में निरीह दृष्टि से देखा इस सम्भावना से कि सम्भवत: चिता दग्ध धूम गगनाच्छादन कर रहे होंगे और पार्श्व में माता होगी। परन्तु, वहाँ कुछ और ही था – महानील में विभावरी का परिणय मंदिर किसी अनिर्दिष्ट स्थान से लेकर देहली तक तारा पथ से आलोकित था, पार्श्व में माता नहीं थी वरन् मुखमण्डल पर अश्रु खेल रहे थे।

दीर्घ नि:श्वास के साथ स्मृति पथ भ्रान्त हो गया, आश्रुकाणों को भी साहचर्य से दूर करने के लिए उसने उर से आँचल ढूँढा परन्तु वह तो पवन से खेल-खेल कर अंक में सो चुका था।

****2****

दूर चक्रवाक् का स्वर मुखरित होकर नीरवता के अबाध साम्राज्य में अस्तप्राय हो गया। नेत्र निद्रा क्रान्त हो रहे थे, समीपस्थ कुञ्ज में किसी जीव की आहट से भयातुर होकर पंख फड़फड़ाते हुये पक्षी उड़ गये। पुनः कोलाहल समय की गति में विलीन होने लगा। चन्द्रकान्त मणि विनिर्मित वक्रमण्डलवत् हिमकर की रजत चन्द्रिका में उसने उस सघन कुञ्ज से एक वन बिलाव पलायन करता हुआ देखा। चञ्चल मन की त्वरित झंकृति सामान्य होने लगी, निद्राक्रान्त नयन अनिद्र होकर मानस सरोवर की उर्मिल लहरियों में जीवन की पुनरावृत नौका खेने लगे-

अवनी की शिशिरोत्तापश्लथ काया में वसन्तोत्सव का नव अङ्गराग मण्डित होने लगा। विभिन्न वर्णावृत्तियाँ सौरभित होकर नियति के विवर्ण वसन अलंकृत करने में रत थीं। वसन्तोत्सव हितार्थ नानाकण्ठस्वर उद्गलित होकर श्रवण माधुरी विकीर्ण करते थे। हिमस्निग्ध नियति हेमस्निग्ध होने लगी। जब जन-जन के मन पर उल्लास का कुंकुम मण्डित था तब देवल ग्राम का एक भवन दो प्राणियों के सन्ताप में विदग्ध होकर छिन्न उर तथा विक्षिप्त मानस हो गया था।

रघुआ के हाथों बोई हुई खेती लहलहा रही थी-सुनहरे रंगों में, मानो नियति स्वर्णकार ने गेहूँ-जौ पर सोने का रंग चढ़ाया था। चने-मटर की फलियों से, गेहूँ-जौ की बालों से, अरहर की मालाओं से खेती के खज़ाने भरे थे। विविध वर्ण की तितलियाँ पुष्पों पर मण्डराती थीं, मानों फूल फूलों को, सौन्दर्य के वशीभूत होकर; चूमते थे मधुमास की मस्ती में, सब कुछ था पर रघुआ नहीं था, इस दुनिया में; तभी तो राका को अपने पति की अन्तिम खेती पर मोह था। पति के हाथों की अन्तिम खेती.....यादगार.....। बार-बार यह खेती बोई जायेगी परन्तु अब उसे रघुआ नहीं बोयेगा....वह भगवान का हो चुका। फिर-फिर कर ऋतुयें आयेंगी-वसन्त , ग्रीष्म, वर्षा, शरद और हेमन्त....शिशिर उनको याद दिलायेगा जीवनभर परन्तु रघुआ नहीं आयेगा। मधुमास आयेगा, कोयल का स्वर सुना जायेगा परन्तु रघुआ कभी न बोलेगा-उसका मूक स्वर प्रणव में मिल चुका, पुत्र की असीम जीवन्त आशा वेदना बिखेर कर मिट गयी। सोते, खाते, उठते, बैठते माँ-बेटी के मन में उसकी याद अन्यमनस्कता छिटका जाती थी।

वासन्ती रजनी बीती, गर्मी जागी; सूर्य का आरक्त बिम्ब पृथ्वी को तपाने लगा, शस्यश्यामला धरती सूखने लगी। धान्य पक गये, सात वर्षीय कन्या-निमि के साथ माता ग्रीष्म की दुपहरी तक गेहूँ जौ काट-काटकर खलिहान तक पहुँचाती। निमि के बाल कर भी कार्य के लिए विवश थे, आतुर थे, दैव की मार जो थी। सात वर्ष की बाला खेत पर कार्य करती है, ऊपर से सूर्य तपाता है, कोमल बाल शरीर पिघलता है। जीवन का सजीव रूप! आजन्म-कठोर भी, निश्कलुष भी। ओह! यदि यह धनिक-सुता होती तो सातवें वर्ष सूर्य भी यदा-कदा देखती।

अन्तिम खेत कट रहा है, राका के मुख से कार्य के वाद्यन्त्रों से स्वर मिलाकर गान फूट रहा है- “पिया मोरे गये परदेश, अब न लौटेंगे....”
अविरल अश्रुधारा बह रही है, दुःख बह रहा है। सूर्य के डूबते-डूबते कटाई का सारा काम समाप्त हो गया, अब दाँय होगी कल से; ग़रीब के घर में अन्नपूर्णा आयेगी।

रजनी आई, माँ-बेटी ने विश्रान्ति की साँसें लीं, भोजनोपरान्त थका हुआ शरीर जीवन की शान्ति में लीन हो गया। प्रात: दोनों देर से उठीं। सूर्य के भू को स्वर्णिमोत्तरीय ओढ़ाते-ओढ़ाते खलिहानों में पहुँची, आँखों के आगे धरती परिक्रमित होने लगी, कम्पित शरीर धम्म से भू पर गिर पड़ा...कुहराम!.....दुखद वातावरण.....जिसके जीवन में सुख न हो वह कहाँ से पायेगा। विगत निशि की सुखद निद्रा का यह प्रायश्चित था। कल के भरे-पूरे खलिहान का कुछ भाग रिक्त था, माता सिसक रही थी। निमि अपलक मूक वेदना व्यक्त करती हुई देख रही थी। दरिद्र का धन था, भगवान ने दिया था; किसी ने हर लिया...न जाने किसने। समस्याओं के बीहड़ निर्जन अरण्य में राका के चक्षु निराश होकर कुछ देख रहे थे खलिहान में पर वह उसको देखती न थी, उर कातर था, धैर्य मानो उस ऋतु में नहीं पुष्पित होता था, कहा भी है-

एक स्वर्णकण खो जाने से उर हो उठता है कितना कातर,

वह कैसे धीरज धरे, जिसका लुट जाता है रत्नाकर!

दरिद्र का रत्नाकर ही तो था उसका गेहूँ से भरा पूरा खलिहान। दिन बीतते थे, दरिद्रता फैलती थी, निमी का तन इठलाता था मन में दुःख कहीं गहरे पैठ रहा था। दुनिया-दुष्कर्मों का फल नादान बालिका सहती थी। गुनाहों ने जन्म लिया था प्रवंचना के घर, मासूमियत के यहाँ वे फलित होने लगे।

****3****

‘इक्कीस वर्ष बाद।’

आज निमि २८ वर्ष की है। उसके जीवन के दो दशक और आठ वर्ष बीत गए। इन इक्कीस वर्षों में उसने क्या देखा, क्या नहीं। यादों का महाभारत दिनों दिन अध्याय पर अध्याय जोड़ता रहा। उस तामसी अँधेरे में फिर मन इक्कीस वर्षों की व्यथा कथा लिखने लगा।

‘माँ पर महाजन का क़र्ज़ ा बढ़ता गया। इधर उम्र का तकाज़ा, उधर क़र्ज़ का, मज़दूरी करते-करते शरीर का विशाल वृक्ष कोटर बन गया। किस लिए? उसी शरीर के लिए जो कोटर बन ढहने वाला था और निमि के हाथ पीले करने के लिए। इधर एक शरीर का ढहना निश्चित था उधर शरीर का इठलाना। निमि अब यौवन की प्रतिमा थी, दिव्य कान्ति दिनों दिन पा रही थी-वह काया। वृद्धावस्था की सन्तान दुःख के लिए या सुख के लिए।

उधर क़र्ज़ -व्याल पल रहा था...बेबसी का दूध पी-पीकर। एक दिन वह फुफकार उठा जिसकी अप्रत्याशित फुफकार का विष जीवन का गरल बन गया। क़ानून ने बीन बजाई, विषधर रघुआ की सम्पति, उसकी राका के पास रही धरोहर-मकान व ज़मीन दोनों पर कुण्डली जमा बैठा। महाजन के सामने बहुत-बहुत रोना रोया परन्तु, वह क्या जाने पीर पराई जाके पैर फटी न विवाई, महाजन को न पसीजना था और न पसीजा।

एक प्रचण्ड वज्रपात था यह। परन्तु भाग्य की मार सहनी ही होती है। माँ बेटी अब मजदूरिनें या भिखारिनें! दर-दर माँगना, भला-बुरा सुनना और पेट भरना, भिखारिन! भीख! निकृष्ट कर्म!

भिखारिन की बेटी का अंचल कौन थामे?

*****4*****

इधर भाग्य की मार! उधर इठलाता यौवन! चारों ओर से घेरती हुई जन-जन की स्वार्थी काम दृष्टि! और उनमें घिरी निमि तथा उसकी दयनीय लाजभरी झुकी नज़रें। माँ दुनिया को देखती, मुँह फेर लेती और एक भिखारिन कर भी क्या सकती थी। दुनिया के गुनाहों का साया उस पर जो था। जिन वृद्ध नज़रों में कभी कर्म! कर्म!! की आशाओं भरी चमक थी, उनमें अब आँसुओं भरे कर्म की निराशा और निस्तेजता व्याप्त थी। जिसको निमि तब देख, समझ सकती थी, समझती थी।

जर्जर शरीर क्या मज़दूरी करता। भीख पर दिन गुज़रते थे।

एक दिन प्रात:काल लोगों ने देखा-गाँव के अश्वत्थ वृक्ष के नीचे निमि धाड़ मारकर रो रही है। उसके सामने ओस के काफ़ीीन से ढका एक शरीर था जो कभी राका थी। आज के सूर्योदय को देखकर उसे पिता के मृत्यु दिन की याद आयी। आज महाकालिका के इस खप्पर में माता-पिता दोनों का रक्त उसे दिखायी दिया और उसका रोना विक्षुब्ध हो उठा। आँखों के आँसू सूख गए जो भीतर ही भीतर घुटन बन गए। उसके भाग्य में अब इसी घुटन का सम्बल था।

जिस वृक्ष को ढहना था वह ढह ही गया। अब सामने उसका वीभत्स अवशेष पड़ा था जो चन्द घड़ियों में मिटने वाला था। जिसे जाना था वह चला गया उसे रोकता भी कौन और रोक भी कौन सकता है।

रघुआ पुत्र की अपूर्ण आशा में गया था, राका पुत्री को असहाय छोड़ गयी थी। कौन किसका परिवार? कहाँ किसी की मकान-ज़मीन? कौन पिता, कौन माता? कौन किसका अपना?

और भाग्य गगन से दो सूर्य अस्त हो गए।

*****5****

बेटी पिता का घर छोड़ती है जब वह पिया के घर जाती है। वैवाहिक वाद्यों-शहनाइयों के स्वर में उसकी विदा के करुण स्वर सुखद हो उठते हैं। और पिया के घर प्रिय उसे प्रेम बाहुपाश में ऐसा भुलाता है कि उसका पुराना संसार नए सुखमय संसार से जुड़ता प्रतीत होता है, जिसमें दोनों आते-जाते हैं।

और आज निमि अपने पिता का घर छोड़ चली है-सदा-सदा के लिए। उसे अब कौन बुलाएगा कौन भेजेगा? उसे कोई विदाई देने न आया, वह पिया के घर नहीं जा रही, वह तो अपने भविष्य के अँधेरे में कोई चिनगारी खोजने जा रही है-शायद कोई उजेरा पक्ष मिले, यह आस लिए। वह वहाँ जा रही है जहाँ उसका पुराना संसार भविष्य के अँधेरे में याद बनकर खो जायेगा, शायद वह भी खो जाये।

काल खून की स्याही से उसके काले-काले स्याह भूत वर्तमान और भविष्य की कथा नहीं लिख रहा वरन् जीवन पट पर धब्बे छोड़ रहा है जो धीरे-धीरे सुधियों के संसार में घाव बन गए हैं जो रिस-रिस कर बेबसी के आँसू गिराने को मजबूर है। शरीर पर जीवन के घाव-शरीर कम घाव अधिक। काल! पिघलते दर्द का वहशी।

उसके महाभारत के जीवन में नया पर्व जुड़ता है।

मुँह फेर केर उसने गाँव की ओर देखा फिर अपने कभी के मकान की ओर, सूर्य ढल रहा था। चारों ओर से बदल घिर रहे थे। जाने क्यों उसकी आँखों में आँसू घिर आये। वह फूट-फूट कर रोने लगी। यादों की बारात सजी! परन्तु वहाँ दुल्हन की डोली नहीं थी, न शहनाइयों के स्वर थे, न वह दुल्हन। थी तो....यादों की बारात.....बस!

धीरे-धीरे सारा गाँव – ग्राम प्रान्तर उसकी आँखों से ओझल होने लगा। दूर एक दोराहे पर उसे एक बालक मिला।

“दीदी कहाँ जा रही हो?”

वह ठिठक गयी। उसे गौर से देखा-राधे था वह। उसने सुना, एक करुणा भरी मुस्कान बिखेरी और आगे चल दी। बालक ताकता रह गया। थोड़ी देर खड़ा रहा फिर चल दिया-अपने और निमि के गाँव की ओर।

भोला बालक उस करुण मुस्कान का मर्म क्या समझता। शायद ठीक-ठीक निमि भी नहीं समझ पायी थी उस दिन और आज उसे उस मुस्कान का मर्म ठीक समझ में आ रहा है। एक आशा थी उस मुस्कान में और यादों के अतीत की विस्मृति-उस करुणा में।

और ग्राम प्रान्तर उसकी आँखों से ओझल हो गया। अब वह अकेली थी, अकेली तो पहले भी थी, परन्तु; अब उसे न कोई पहचानता था और न वह किसीको। बेपहचान दुनिया में नादान षोडशी।

सोलह वर्ष में जीवन में अलंकार सजाये जो कलंक बन गये,परन्तु, हृदय अभी निष्कलंक था। दुनिया के कलंक शायद और जगह के नहीं।

****6****

काल के दण्ड पर सुख व दुःख के दो पलड़े हैं। जीवन में कभी एक भारी होता है तो कभी दूसरा। निमि के जीवन में सदा दुःख वाला पलड़ा ही भारी रहा। आज निमि एक सम्भ्रान्त कुल की बहू है। यहाँ कैसे पहुँची? शायद ये ही शब्द भगवान ने उसे सुख रूप में उसे दिए थे। सम्भ्रान्त कुल की बहू है वह। परन्तु, किसी की हँसते चेहरे से सम्भवतः यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि वह हृदय से भी उतना हँस रहा है जितना बाहर से। दुनिया की हँसी ख़ुशी में स्वर मिलाना सरल है पर हृदय उतना ही मुश्किल।

जिस दिन इस घर में आई थी उस दिन सोचा था कि अतीत का दुःख इस घर के सुख में धुँधलाता जायेगा परन्तु, वह आज इतना गहरा गया है कि स्वयं वही खो गयी है। काफ़ी रात रहते उठना-भरे घर का काम-आधा पेट भोजन और काफ़ी रात गए सोना। सभी की प्रसन्नता का प्रयत्न। शायद जीवन के दुःख भूलने के लिए। बहू या नौकरानी? शायद बहू कम नौकरानी अधिक।

सास-नाम था शीलवती परन्तु काम से-महाकृत्या! प्यारी दुलारी बेटी अंजू को सराहते दिन बीतता या निमि के मनगढ़न्त पापाचार की कथा कहते। घर पर माँ का राज्य था, स्वसुर-मक्खीचूस कंजूस। पुत्रवधु को जौ का आटा आता। भिखारिन की भान्ति ही तो था उसका जीवन। पति-मनोहर वासना का कीड़ा! और अंजू निमि के लांछित जीवन की भूमिका लेखक। किंबहुना? सारा घर कंजूस पंसारी की दुकान-गुप्त मन्त्रणाओं का माहौल या एक पक्षीय वाक्युद्ध का मैदान था। बेचारी निमि! जिसके शरीर पर अब कुलटा, भ्रष्टा, व्याभिचारिणी के गहने थे, चुप सहती थी। आँखों में कभी आँसू आते थे वे भी साथ छोड़ चुके थे। करती भी क्या? कौन था यहाँ भी उसका?

कहने को पति उसका अपना। पति था वह या पशु? प्रणय का मधुर मधु उसने पिया था पर उसके पास वह मधु न था जिसे निमि पी सकती। पशु का भावजगत तो शून्य होता है। निमि के उभरते आँसू उसकी क्रोधाग्नि को ज्वालामुखी बना देते। फिर .....सड़ाक्.... सड़ाक्... सड़ाक्.... और निमि का सिर नीचा किये सहे जाना, उसके सम्मुख भी तो वह माँ बहिन के कारण व्याभिचारिणी थी, छलना थी।

दाम्पत्य प्रेम की तड़पन उसके मन में दर्द बनकर गहराने लगी। गदराया वदन, उफनता यौवन, प्राञ्जल सौन्दर्य पति-पशु की वासना में भीतर ही भीतर कहीं सड़ता गया। उसके अन्दर कहीं दबा हुआ विद्रोह कह-कह पुकारता...“क्या इसीलिए मैं नारी हूँ?” परन्तु वह पुकार होठों पर न उभरती। आहें और सिसकियाँ उसकी हो गयी थीं-हमजोली।

दाम्पत्य? पति का बाहुपाश सर्प की जकड़न बन गया। वेश्यागामी पति के अत्याचारों ने उसे कुलटा, व्याभिचारिणी और छलना बना दिया।

स्वसुर की उपेक्षा, अंजू की वज्र भूमिका, शीलवती की जलीकटी, पति की निर्दयता भरी मार, मूर्त वासना का राक्षस! निमि का नि:स्वार्थ आहभरा आत्मसमर्पण ! निराहार व्रत! दाम्पत्य-प्रेम.....

एक बार जीवन में आशा-किरण चमक उठी। वह चार पुत्रों की माता बनी,परन्तु वह अधिक दिनों तक उसके न रहे। दर्द पिघलता रहा। हृदय में चार शूल और चुभ गए।

क्या यही उसका नया संसार है, हर बेटी वधू बनते समय जिसकी कामना करती है?

उसका जीवन वीरान खण्डहर बन गया जिसकी एकाध दीवार जगत के मरु में खड़ी थी। उसके सामने धरती घूम रही है शायद। शायद वह बेहोश हो जायेगी।

*****7*****

दूर किसी पेड़ पर कोई पक्षी बोला-‘केऊँ.....’

दूर से उत्तर आया – ‘केऊँ.....’

शायद उषाकाल होने को है।

‘उसे लगा...उसके अनिन्द्य सौन्दर्य,मोहक यौवन तथा गदराये वदन की अर्थी निकल रही है और वह भीतर ही भीतर कहीं टूट रही है...निरन्तर।

चार पुत्रों की मृत्यु के शूल! जन्म से ही दुखों का कारवाँ चला आ रहा था, एक और जुड़ गया। अट्ठाईस वर्ष के अन्तराल में शरीर सारा जीवन भोग चुका या जीवन ने उसका भोग किया। अभी से वृद्धावस्था के गलियारे नज़र आने लगे। वासना का दुर्दान्त राक्षस! पति! फिर भी वह आश्रय माने हुए है। उसकी एक आशा है वह। परन्तु, मद्यप और क्षय रोगी की क्या आशा जो जीवन की वर्जनाओं का शिकार हो चुका है। ऐसा है निमि का आश्रय! स्वयं क्षय होता हुआ, जाने किस दिन पूरा क्षय हो जाये।

और एक दिन वही हुआ। अब घर में उस पर दुखों का वज्राघात होना था। अंजू की भूमिका में एक नया शीर्षक जुड़ गया-‘पतिघातिनी’

निमि अवाक् थी। सम्भ्रान्त कुलवधू होने का यह प्रसाद था। काल ने उसकी सुहाग बिन्दिया मिटा दी थी। भाग्य के गुनाहों की वही गुनाहगार कही गयी इस दुनिया में। यही तो गुनाहों की दुनिया है।

माँ-बेटी ने उसको जी भरकर पीटा। स्वसुर मौन देखता रह गया। शायद छुड़ा देता पर उसका वश कहाँ था इस नारी राज्य में। नारी राज्य में नारी का अपमान! पीले सुन्दर शरीर पर नीले निशान उभरे, कहीं रक्त का कुंकुम। वेदना की गलियों में आज उसे बेतरह अपमानित करके निकाल दिया गया। क्या था अब उसका यहाँ? तो क्या नारी पति तक ही सीमित थी? यही था, यही होना था और हुआ भी यही। कौन उसे इस दुःख भरे चैन की साँस लेने देता यहाँ और आज वह गुनाहों की दुनिया से भटक-भटक कर छलना नाम लेकर इस वन पथ पर आई है।’

विभावरी का अलभ्य शॄंगार मिट गया था शायद उसके प्रिय नहीं आये थे। प्रभात तारा उग चुका है। उषा का आलोक बिखर रहा है। लाली में उसके पिता, माता, चार पुत्रों और पति का रुधिर आरक्त हो उठा है। एक कोरक अभी भी गगनमण्डल में अरुणिमाविहीन है। शायद उसमें निमि के रक्त की लाली उभरेगी।

वह इधर-उधर देख कर उठ खड़ी हुई। एक अधखिली कली पर उसकी अंगुलियाँ ठहर गयी जो कुछ देर में फूल बनेगा। वह ठिठक कर सोचने लगी-आँखों में एक चमक उभरी-.... “शाम की कलिका के कोमल बन्द दलों में छिपा हुआ रंग रात भर किन तैयारियों में सज सँवर कर सबेरे चटक सुंदर फूल बन जाता है। दिन भर हँसकर, रोनेवालों को हँसाकर, शाम को मुरझाकर दूसरे दिन जन्मवेला आते-आते गिर जाता है। सुन्दरता उसका गुण है। हँसना-स्वभाव और खिलकर मुरझाना उसकी नियति। मैं भी तो एक कलिका थी। इसी अरुणोदय की निरभ्रता में अधखिली ही मसल दी गयी हूँ परन्तु टहनी से चिपकी हूँ। शायद हँसना मेरा स्वभाव होता।”

उसकी आँखों से झर-झर दो मोती गिर पड़े। अनायास ही उसके मुख से निकल पड़ा- “ओह कितना बीहड़ पथ है जीवन का?”

और वह आगे बढ़ गयी-शायद जीवन के महाभारत में अगला पर्व जोड़ने के लिए।....


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