अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
05.04.2016


जूते की अभिलाषा

चाह नहीं मैं विश्व-सुंदरी के पग में पहना जाऊँ,
चाह नहीं नव-गृह के छत पर, नज़र उतारने को लटकाया जाऊँ।

चाह नहीं राजाओं के चरणों में, हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं मैं बड़े मॉल में बैठ भाग्य पर इठलाऊँ।

मुझे पैक कर लेना तुम बढ़िया, उसके मुँह पर फिर देना फेंक,
नेता जो आये वोट माँगने, जिससे शर्मिंदा हो सारा देश॥


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें