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ISSN 2292-9754

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11.25.2018


इतिहास और जातीयता के विषय में आचार्य शुक्ल
और डॉ. रामविलास शर्मा की मान्यताएँ

 ‘इतिहास, जातीयता और साहित्य के रूप’ शीर्षक अध्याय में डॉ. शर्मा ने कुछ विशेष समस्याओं पर विचार किया है। जिसमें उन्होंने मुख्य रूप से तीन समस्याओं पर विचार किया है जो इस प्रकार है – हिंदी साहित्येतिहास में काल-विभाजन की समस्या, साहित्य के जातीय रूप और उसकी जातीय विशेषताओं की समस्या और नाटक, उपन्यास, निबंध आदि साहित्य के रूपों की समस्या। डॉ. रामविलास शर्मा लिखते हैं- “इन सभी पर शुक्ल जी की कुछ विशेष मान्यताएँ हैं और उनके खंडन की भी विशेष कोशिश की गई है, कुछ की ओर ध्यान कम गया है या ज़्यादातर आलोचक उनकी ओर उदासीन रहे हैं।”1 आचार्य रामचंद्र शुक्ल की पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ सन् 1929 ई. में प्रकाशित हुई जो ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ काशी द्वारा छपी थी। आचार्य शुक्ल से पूर्व जिन विद्वानों ने साहित्येतिहास लेखन में अपनी भूमिका अदा की, उससे उन्होंने लाभ उठाया। आचार्य शुक्ल ने स्वयं स्वीकार भी किया है कि “कवियों के परिचयात्मक विवरण मैंने प्राय: ‘मिश्रबंधु विनोद’ से ही लिए हैं।”2 इससे स्पष्ट है कि आचार्य शुक्ल ने अपने पूर्ववर्ती विद्वानों से बहुत कुछ ग्रहण करके अपने साहित्येतिहास को एक व्यवस्थित आधार प्रदान किया, जिसका पूर्ववर्ती साहित्येतिहासकारों के यहाँ अभाव दिखाई पड़ता है।

आचार्य शुक्ल ने हिंदी साहित्य का काल-विभाजन दो आधारों पर किया है। पहला कालक्रम के आधार पर और दूसरा साहित्यिक प्रवृत्तियों के आधार पर। कालक्रम के आधार पर उन्होंने आदिकाल, पूर्व मध्यकाल, उत्तर मध्यकाल, आधुनिक काल में हिंदी साहित्ये‍तिहास को बाँटा है तथा साहित्यिक प्रवृत्तियों के आधार पर हिंदी सा‍हित्येतिहास का काल विभाजन उन्होंने इस प्रकार किया है– वीरगाथा काल, भक्तिकाल, रीतिकाल और गद्यकाल। आचार्य शुक्ल ने साहित्यिक प्रवृत्तियों के आधार पर किए गए काल-विभाजन को महत्वपूर्ण माना है। आचार्य शुक्ल लिखते हैं- “किसी काल के भीतर जिस एक ही ढंग के बहुत प्रसिद्ध ग्रंथ चले आते हैं, उस ढंग की रचना उस काल के लक्षण के अंतर्गत मानी जाएगी, चाहे और दूसरे ढंग की अप्रसिद्ध और साधारण कोटि की बहुत-सी पुस्तकें भी इधर-उधर कोनों में पड़ी मिल जाया करें। प्रसिद्धि भी किसी काल की लोकप्रवृत्ति की प्रतिध्वनि है।”3 इस प्रकार आचार्य शुक्ल ने काल-विभाजन को जो आधार प्रदान किया उसी आधार को बाद के विद्वानों ने स्वीकार किया है। शुक्ल के बाद भी बहुत से साहित्येतिहास ग्रंथ लिखे गये हैं पर उसमें कुछ नया नहीं है। पर जिन लोगों ने कुछ नया जोड़ने की कोशिश की, उन लोगों ने भी शुक्ल के मूल आधार को नहीं छोड़ा। इस संदर्भ में डॉ. शर्मा का कथन बहुत सार्थक जान पड़ता है- “शुक्ल जी के बाद संक्षिप्त और सुबोध इतिहासों की बाढ़ आ गई। कुछ वृहत्काय इतिहास भी लिखे गए। इसमें ज़्यादातर चोरी का माल है, शुक्ल जी की निधि से माल लेकर टके सीधे करने का व्यापार है, बहुत कम लोगों ने नये सिरे से अध्ययन करके हिंदी साहित्य के इतिहास में कुछ नया जोड़ने की कोशिश की है। विद्यार्थियों के लिए लिखना बुरा नहीं है, लेकिन जहाँ इसे लिखने का उद्देश्य ज्ञान-वृद्धि न होकर परीक्षा पास कराना भर होता है, वहाँ इतिहास-लेखन पैसा-कमाऊ व्यापार मात्र हो जाता है।”4 इस प्रकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल का साहित्येतिहास ग्रंथ परवर्ती साहित्येतिहासकारों के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।

आचार्य शुक्ल के बाद अगला महत्वपूर्ण साहित्येतिहास ग्रंथ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का है। यद्यपि आचार्य द्विवेदी ने आचार्य शुक्ल के ढाँचे एवं व्यवस्था को स्वीकार किया है। लेकिन द्विवेदी जी ने आदिकाल की तरह आधुनिक काल नाम तो रखा लेकिन मध्यकाल नाम छोड़ दिया। इस संदर्भ में डॉ. रामविलास शर्मा लिखते हैं- “आदिकाल से लेकर छायावाद तक द्विवेदी जी ने उन्हीं धाराओं के हिसाब से इतिहास लिखा है जिनका विवेचन शुक्ल जी ने किया था। एक अंतर है। द्विवेदी जी ने आदिकाल की तरह आधुनिक काल नाम तो रखा है लेकिन मध्यकाल नाम छोड़ दिया है। आदि है और आधुनिक है तो मध्य भी होना चाहिए, उसे छोड़ने का कोई संगत कारण नहीं दिखाई देता। इसके सिवा और युगों में जहाँ द्विवेदी जी ने उन्हीं साहित्यिक धाराओं और प्रवृत्तियों को मुख्य माना है जिनकी चर्चा शुक्ल जी ने की थी, वहाँ आदिकाल की मुख्यधारा उन्होंने स्पष्ट नहीं की। जैसे मध्यकाल में यह नाम न लेते हुए भी उन्होंने भक्ति और रीतिकाव्यों की चर्चा की है, वैसे आदिकाल के अंतर्गत ऐसा कोई शीर्षक नहीं दिया।”5 शर्मा जी के अनुसार वीरगाथा काल के अध्ययन में शुक्ल जी ने जो तथ्य दिए हैं, उनका विश्लेषण लगभग सही परिप्रेक्ष्य में किया है, यही कारण है कि उनका खंडन करने वाली आलोचना भी उन्हीं की स्थापनाओं को दुहराती है या थोड़ा बहुत परिवर्तन के साथ उपस्थित करती है। इस संदर्भ में डॉ. शर्मा ने एक से ज़्यादा उदाहरणों का उल्लेख किया जिसमें द्विवेदी जी शुक्ल की अवधारणाओं को दुहराते हुए नज़र आते हैं। उदाहरण स्वरूप खुमान रासो के बारे में शुक्ल जी ने लिखा है- “इस समय खुमान रासो की जो प्रति प्राप्त है वह अपूर्ण है।”6 आचार्य द्विवेदी जी इसी से मिलता जुलता वाक्य लिखते हैं- “आजकल खुमान रासो की जो प्रति मिलती है वह अपूर्ण है।”7 अत: इस तरह से अनेकानेक उदाहरण मिल जाएँगे। इस संदर्भ में डॉ. शर्मा का कथन बहुत महत्वपूर्ण है कि “द्विवेदी जी ने शुक्ल जी की स्थापनाओं को नहीं दोहराया, कभी-कभी उनके वाक्यों को भी दोहराया है।”8 इस प्रकार स्पष्ट रूप से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भले ही द्विवेदी जी को ‘वीरगाथाकाल’ की तुलना में ‘आदिकाल’ नाम सार्थक जान पड़ता है लेकिन आदिकाल की मुख्य धारा वीरगाथा काव्य की है। इस संदर्भ में डॉ. शर्मा लिखते हैं- “वीरगाथा काव्य हिंदी की एक विशेष धारा है, इस धारणा के प्रति‍निधि ग्रंथ अधिकतर अप्रमाणिक है, लेकिन उनसे एक वीरगाथा काव्य की परंपरा का अस्तित्व सिद्ध होता है।”9

साहित्यिक जातीय रूप और विशेषताओं की चर्चा करते हुए डॉ. शर्मा लिखते हैं- “भाषा साहित्य का रूप है। हमारे साहित्य का जातीय रूप हिंदी भाषा है। हिंदी भाषी क्षेत्र में अनेक बोलियाँ बोली जाती हैं। इनमें खड़ी बोली हमारी जातीय भाषा बनी बाकी बोलियाँ नहीं। शुक्ल जी ने खड़ी बोली के प्रसार के मुख्य ऐतिहासिक कारणों का उल्लेख किया और साहित्य में उसकी विकास की रूपरेखा तैयार की।”10 डॉ. रामविलास शर्मा ने हिंदी भाषी प्रदेश को एक पिछड़ा हुआ प्रदेश कहा है। क्योंकि यहाँ के लोगों में जातीय चेतना का प्रसार उस तरह नहीं हुआ जैसे बंगाल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु या आंध्र में। इसका मूल कारण यह है कि हिंदी प्रदेश में सामंतवाद का गहरा असर है। यहाँ वर्ण-व्यवस्था की कट्टरता, हिंदू-मुस्लिम भेद-भाव अपने चर्मोत्कर्ष पर है। इन सब कारणों से यहाँ का औद्योगिक और सांस्कृतिक विकास अवरुद्ध रहा है। हिंदी प्रदेश में रहने वाले लोग ही यहाँ की भाषा और साहित्य को 'गँवारू' कहते हैं और अंग्रेज़ी भाषा को 'श्रेष्ठ' मानते हैं। इस संदर्भ में डॉ. शर्मा का कथन बहुत सार्थक है, “हिंदी साहित्य की जातीय विशेषताओं और उसके सहज विकास के सबसे बड़े शत्रु वे हिंदी वाले ही हैं जो रूढ़िवाद के गुलाम हैं, और हिंदी को तंग सामंती दायरे से बाहर निकलने नहीं देना चाहते। इनके लिए सा‍हित्य का जो कुछ विकास होना चा‍हिए था वह संस्कृत में हो चुका, हिंदी में अगर कोई अच्छाई है तो यह कि वह संस्कृ्त के नजदीक है और तत्सम् शब्दों की भरमार करके और भी राष्ट्रीय बनाई जा सकती है। इन लोगों का दिमाग संस्कृत ही नहीं, अंग्रेज़ी और फ़ारसी के लिए पायन्दाज़ है। हिंदी के ज़्यादातर रूढ़िवादी हिंदी के बारे में शोर मचाने के बावजूद हिंदी साहित्य से अपरिचित हैं, उनके मन में हिंदी के लिए ज़रा भी सम्मान की भावना नहीं है।”11 इस प्रकार हिंदी प्रदेश में रहने वाले लोग अंग्रेज़ी और संस्कृत से इस क़दर आतंकित हैं कि वे हिंदी भाषा के महत्व को भूल गए हैं। वे नहीं जानते हैं कि हिंदी हमारी जातीय भाषा है जो हमारी जातीय एकता को सुदृढ़ करती है। आचार्य शुक्ल में शर्मा जी ने जातीय चेतना एवं जातीय सम्मान की भावना को देखा है। आचार्य शुक्ल ने हिंदी-उर्दू को एक ही जाति की भाषा माना है। डॉ. शर्मा ने शुक्ल जी के संदर्भ में लिखा है- “आचार्य शुक्ल हिंदी प्रदेश की पददलित और अपमानित जनता के सम्मान के रक्षक थे। विरोधियों से ज़्यादा बहस में न पड़कर उन्होंने हिंदी आलोचना को समृद्ध करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने हिंदी के अलावा संस्कृत, अंग्रेज़ी, बंगला आदि साहित्य का गंभीर अध्ययन किया और अपने मौलिक चिंतन से हिंदी आलोचना में युगान्तर पैदा कर दिया। इस कार्य में उनके मनोबल को दृढ़ करने वाली प्रेरणा जातीय सम्मान की भावना थी, इसमें संदेह नहीं। एक पराधीन देश में जातीय सम्मान की भावना एक साम्राज्यविरोधी क्रांतिकारी भावना है।”12

डॉ. शर्मा ने एक बहुत गंभीर समस्याओं की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करने का प्रयास किया है। जहाँ वे सभी भारतीय भाषाओं पर अंग्रेज़ी भाषा और साम्राज्यवादी संस्कृति के दबाव को देखते हैं। अंधविश्वासों को क़ायम रखने, अंग्रेज़ी के प्रभाव को जमाकर नवजवानों को देश से विमुख करने में सबसे ज़्यादा प्रयत्नशील यहाँ के अंग्रेज़ शासक थे। यही कारण है कि आचार्य शुक्ल ने सबसे ज़्यादा उन्हीं पर वार किया। अंग्रेजों ने यह प्रचार किया था कि अंग्रेज़ी भाषा पढ़कर ही उच्च नौकरियाँ पायी जा सकती हैं और वे यहाँ की भाषाओं को नीचा दर्जा देते थे। इस परिस्थिति की चर्चा करते हुए शुक्ल जी ने अपने इतिहास में लिखा है- “देशी भाषा पढ़कर भी कोई शिक्षित हो सकता है, यह विचार काफ़ी समय तक लोगों का न था।”13 इससे स्पष्ट है कि अंग्रेज़ ने हमारी भाषा से देश के नवजवानों को दूर करते जा रहे थे। यह स्थिति भारतेन्दु् काल में बनी हुई थी, द्विवेदी युग में थोड़ी कम हुई। लेकिन आचार्य शुक्ल निरंतर ‘निज भाषा’ को महत्वपूर्ण मानते थे। डॉ. शर्मा लिखते हैं- “शुक्ल जी उन देशभक्त लेखकों में थे, जो यह सिद्ध करना चाहते थे कि देश-भाषा में शिक्षा ज़रूरी है और इसके बिना और सब शिक्षा अधूरी है।”14 आचार्य शुक्ल ने स्पष्ट रूप से कहा कि अंग्रेज़ी या संस्कृत या अरबी-फ़ारसी जानने से कोई हिंदी का जानकार नहीं हो जाता। हिंदी की अपनी विशेषताएँ हैं, जिसे सीखे-समझे बिना कोई हिंदी का लेखक नहीं बन सकता। डॉ. शर्मा ने शुक्ल के संदर्भ में लिखा है- “उन्होंने ऐसे लोगों को फटकारा है जो हिंदी लेखक होने की अपेक्षा अंग्रेज़ी, संस्कृत या अरबी-फ़ारसी का विद्वान कहने-कहलवाने में ज़्यादा गौरव समझते थे।”15 हिंदी प्रदेश में जातीय चेतना का कितना अभाव है यह हम आचार्य शुक्ल के कथन में देख सकते हैं जो उन्होंने द्विवेदी युग के संदर्भ में लिखा है- “इस काल खण्ड के बीच हिंदी लेखकों की तारीफ़ में प्राय: यही कहा सुना जाता रहा कि ये संस्कृ‍त बहुत अच्छी जानते हैं, वे अरबी-फ़ारसी के पूरे विद्वान हैं, ये अंग्रेज़ी के अच्छे पंडित हैं। यह कहने की आवश्यकता नहीं समझी जाती थी कि ये हिंदी बहुत ज़्यादा जानते हैं। यह मालूम ही नहीं होता था कि हिंदी भी कोई जानने की चीज है। परिणाम यह हुआ कि बहुत-से हिंदी के प्रौढ़ और अच्छे लेखक भी अपने लेखों में फ़ारसीदानी, अंग्रेज़ीदानी, संस्कृतदानी आदि का कुछ प्रमाण देना ज़रूरी समझने लगे।”16 अत: हिंदी के प्रति जिस तरह का रवैया हिंदी प्रदेश में दिखाई पड़ रहा था, उससे साफ़ स्पष्ट था कि वहाँ जातीय चेतना का अभाव था। क्योंकि उनमें हिंदी भाषा के प्रति कोई ख़ास लगाव नहीं था। अत: जैसे-जैसे अपनी भाषा के प्रति लगाव, अपनी संस्कृति के प्रति लगाव उत्पन्न होगा वैसे-वैसे हमारी जातीय चेतना सुदृढ़ होगी।

शुक्ल जी के काव्य विषयक धारणा पर डॉ. शर्मा अरस्तू के प्रभाव को देखते हैं, जिसके अनुसार काव्य मानव कर्मों की छवि है। साहित्य के लोकपक्ष पर शुक्ल जी यदि बल देते हैं तो वह उनकी पूँजीवादी विचारधारा में निहित व्यक्तिवादी प्रवृत्तियों की समझ का परिणाम है। आचार्य शुक्ल ने नाटकों पर विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने हिंदी गद्य साहित्य के‍ विकास में नाटकों की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। आचार्य शुक्ल ने नाटक के उद्देश्य, नाटक और काव्य में अंतर को भी बहुत सुंदर ढंग से स्प्ष्ट किया है। भारतीय साहित्यशास्त्र का हवाला देकर नाटक का लक्ष्य बतलाते हुए शुक्ल जी ने लिखा है- “उसका लक्ष्य भी निर्दिष्ट शील स्वभाव के पात्रों को भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में डालकर उनके वचनों और चेष्टाओं द्वारा दर्शकों में रस संचार करना ही रहा है।”17 आगे डॉ. रामविलास शर्मा नाटक और काव्य दोनों के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए लिखते हैं- “नाटक और काव्य दोनों ही का उद्देश्य रस-संचार करना है। पात्रों का भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में पड़ना नाटक और प्रबंध दोनों ही की विशेषता है। लेकिन पात्रों के वचनों और चेष्टाओं द्वारा दर्शकों में रस संचार करना नाटकों की अपनी विशेषता है।”18 आचार्य शुक्ल जी की मान्यताओं के अंतर्विरोध की ओर संकेत करते हुए डॉ. रामविलास शर्मा ने लक्ष्य किया है कि एक ओर शुक्ल जी यथार्थवाद के पक्ष में हैं, दूसरी ओर यथार्थवाद के नाम पर नाटकों से काव्यत्व‍ लोप के विरोधी हैं। इस प्रकार डॉ. रामविलास शर्मा ने शुक्ल जी के परिप्रेक्ष्य‍ में नाटक संबंधी विचारों का सटीक ढंग से मूल्यांकन किया। आचार्य शुक्ल उपन्यास को एक बहुत बड़ी शक्ति मानते हैं। उन्होंने उपन्यास की विशेषता को परख लिया था, जो उसे साहित्य की अन्य विधाओं से अलग करती है। उपन्यास के संदर्भ में आचार्य शुक्ल लिखते हैं- “वर्तमान जगत में उपन्यासों की बड़ी शक्ति है। समाज जो रूप पकड़ रहा है, उसके भिन्न-भिन्न वर्गों में जो प्रवृत्तियाँ उत्पन्न हो रही हैं, उपन्यास उनका विस्तृत प्रत्यक्षीकरण ही नहीं करते, आवश्यकतानुसार उनके ठीक विन्यास, सुधार अथवा निराकरण की प्रवृत्ति भी उत्पन्न करते हैं।”19 आचार्य शुक्ल उपन्यास को समाज सुधार का विशेष अस्त्र समझते हैं। यही कारण है कि वे प्रेमचंद के यथार्थ चित्रण की तारीफ़ करते हैं क्यों कि प्रेमचंद के उपन्यासों का कथानक सर्वसामान्य जीवन पर केंद्रित है। आचार्य शुक्ल ऐतिहासिक उपन्यास लेखन को एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी मानते हैं। वे ऐतिहासिक उपन्यासों को रोमांटिक कल्पना का खेल नहीं मानते हैं। ऐतिहासिक उपन्यासकारों में शुक्ल जी ने वृन्दावनलाल वर्मा की बड़ी प्रशंसा की है। आचार्य शुक्ल उपन्यासों की तरह निबंधों को भी साहित्य का बहुत ही महत्वपूर्ण अंग मानते हैं। शुक्ल जी लिखते हैं- “यदि गद्य कवियों या लेखकों की कसौटी है, तो निबंध गद्य की कसौटी है। भाषा की पूर्ण शक्ति का विकास निबंधों में ही सबसे अधिक संभव होता है।”20 आचार्य शुक्ल निबंधों पर व्यक्तिगत विशेषताओं की छाप को स्वीकार करते हैं, पर इस शर्त पर नहीं कि उसमें विचारों की शृंखला और लोक से जुड़ाव न हो।

आचार्य शुक्ल ने परम्परा से चली आ रही आलोचना पद्धति का तीव्र खण्डन किया। संस्कृत साहित्यालोचन की सीमाएँ बतलाते हुए उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य लक्षण ग्रंथों के अनुसार गुण-दोष विवेचन होता था। यह गुण-दोष वाली आलोचना पद्धति हिंदी में मिश्रबंधुओं और पंडित पद्मसिंह शर्मा आदि तक चलता रहा। आचार्य शुक्ल ने इस रूढ़िवादी आलोचना पद्धति का तीव्र विरोध किया। मिश्रबंधुओं के ‘हिंदी नवरत्न’ में देव बिहारी विवाद नयी आलोचना के विकास के लिए कितना निरर्थक था, यह शुक्ल जी ने विस्तार से दिखाया है। डॉ. शर्मा ने हिंदी आलोचना मौलिक कर्तव्य को शुक्ल जी के परिप्रेक्ष्य में इस प्रकार स्पष्ट किया है- “हिंदी आलोचना का मौलिक कर्तव्य यह था और शुक्ल जी ने उसे पूरा किया, रीतिशास्त्र के बदले यथार्थवाद के अनुरूप नये साहित्य सिद्धांतों की प्रतिष्ठा, रूढ़िवादी साहित्य का विरोध और नये राष्ट्रीय और जनवादी साहित्य का समर्थन। इस कर्तव्य को ध्यान में रखते हुए ही शुक्ल जी ने दूसरे आलोचकों की नुक्ताचीनी की थी।”21 इस प्रकार आचार्य शुक्ल ने परंपरागत आलोचना पद्धति को ध्वस्त कर प्रगतिशील मूल्यों से ओतप्रोत आलोचना को प्रश्रय दिया।

संदर्भ सूची

1. शर्मा रामविलास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सन् 1993, पृष्ठ -169
2. शर्मा रामविलास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सन् 1993, पृष्ठ -6
3. शुक्ल रामचंद्र, हिंदी साहित्य का इतिहास, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, 24वां संस्करण, सन् 1991, पृष्ठ- 4-5
4. शर्मा रामविलास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सन् 1993, पृष्ठ-171
5. वही, पृष्ठ-171-172
6. वही, पृष्ठ-172
7. वही, पृष्ठ-172
8. वही, पृष्ठ-177
9. वही, पृष्ठ-177
10. वही, पृष्ठ-172
11. वही, पृष्ठ-178
12. वही, पृष्ठ-178
13. वही, पृष्ठ-179
14. वही, पृष्ठ-179
15. वही, पृष्ठ-180
16. वही, पृष्ठ-180
17. वही, पृष्ठ-184
18. वही, पृष्ठ-188
19. वही, पृष्ठ-186
20. वही, पृष्ठ-188
21. वही, पृष्ठ-190

अश्विनी कुमार लाल
शोधार्थी
कलकत्ता विश्वविद्यालय
पता- 110/1L चितपुर बाजार
काशीपुर रोड कोलकाता-700002
संपर्क-8013172069
ई-मेल- monuteghoria@gmail.com


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