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ISSN 2292-9754

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10.02.2016


निराला का काव्य : डॉ. रामविलास शर्मा की नज़र में

सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" का पदार्पण हिंदी साहित्य के अंतर्गत एक युगांतकारी एवं पावन वेला का परिचायक है। निराला जी ने अपने लेखन के माध्यम से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। यद्दपि आरंभिक दौर में निराला जितने विवादों के घेरे में थे उस दौर में उतना विवाद किसी लेखक को लेकर नहीं था। उनपर आये दिन मार्क्सवादियों और गैर मार्क्सवादियों द्वारा प्रहार हो रहा था। उनकी कवितओं पर दुरुहता आदि का आरोप लगाया जा रहा था। उनकी कविताओं को आधार बनाकर आलोचकों ने यहाँ तक कह दिया की उन्हें छंदशास्त्र का ज्ञान ही नहीं है। डॉ. रामविलास शर्मा निराला पर आरंभिक दौर में लगाये गए आरोपों को "निराला" नामक पुस्तक में बहुत सुंदर ढंग से चित्रित करते हैं- "निराला ऊटपटांग लिखते हैं, उन्हें छंदशास्त्र का ज्ञान नहीं है, बंगला कविताओं से भाव उधार लेकर रचना करते हैं- यह प्रचार तो उनके कवि जीवन के आरंभ से ही शुरू हो गया था। सन् ३२ में जब उनका लेख "वर्तमान धर्म" भारत में छपा, तब छायावाद के विरोधियों ने अपना प्रचार अभियान तेज़ किया और इस अभियान के नेताओं ने उन्हें पागल करार दे दिया।"1

इस प्रकार निराला पर आरोपों का सिलसिला दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही चला गया। ऐसे त्रासद समय में डॉ. शर्मा ने निराला के साहित्य का गंभीरता पूर्वक अध्ययन एवं विश्लेषण किया, तथा उनकी प्रगतिशील भूमिका को समझा और समझाया। डॉ. शर्मा निराला पर अपनी पहली आलोचनात्मक लेख सन्‌ 1934 में लिख चुके थे, पर उन्होंने उनपर स्वतंत्र पुस्तक "निराला" नाम से 1946 में लिखा। इस पुस्तक के लिखने के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए डॉ. शर्मा लिखते हैं- "इस पुस्तक के लिखने का मूल उद्देश्य यह रहा है कि साधारण पाठकों तक निराला-साहित्य पहुँचे; दुरुहता की जो दीवाल खड़ी करके विद्वानों ने निराला को उनके पाठकों से दूर रखने का प्रयत्न किया था, वह दीवाल ढह जाय, इस उद्देश्य को ध्यान में रखने से पाठक अधिक सहानुभूति के साथ यह पुस्तक पढ़ सकेंगे।"2

निराला अपने युग के बड़े कवि हैं और बहुश्रुत भी। वे बड़े इसलिए हैं कि उन्होंने अपने युग को देखा, समझा, समस्याओं को खंगाला, गहराई से विश्लेषण किया और निर्भीक स्वर में सत्य को सामने रखा। निराला के काव्य का मूल्यांकन के क्रम में डॉ. शर्मा विचारधारा, भावबोध, कला, गद्द साहित्य और परम्परा शीर्षकों से उनके रचना-कर्म को समझने और समझाने की कोशिश करते हैं। डॉ. शर्मा निराला की रचना-प्रक्रिया का मुख्य स्रोत उनके भावबोध को मानते हैं। वे उनके भावबोध को उनकी विचारधारा से भले ही सम्बद्ध मानते हैं, किन्तु उसका प्रतिबिम्ब नहीं मानते। उन्होंने निराला के भावबोध को स्वाधीनता प्रेम, क्रांति की आकांक्षा, नया मानवतावाद, नव निर्माण और विनाश, प्रकृति-पूजा, माया और ब्रह्म, आकाश और धरती, कमचेतना, ऋतुचक्र, आत्मप्रवंचना, मोहभंग, विकृति, हास्य और करुणा, संघर्ष, अंतर्द्वंद्व तथा मृत्यु आदि बिन्दुओं के माध्यम से विश्लेषित करने की कोशिश करते हैं। निराला की कला को वे वकृत्व कला, संवाद, स्वगत, कविता का नक्शा, लोक-संगीत, अलंकरण, अर्थ-चमत्कार, मुक्त छंद, रूप, रस, छायावाद और यथार्थवाद आदि शीर्षकों से मूल्यांकन एवं विश्लेषण करते हुए निराला की प्रगतिशील भूमिका को स्पष्ट करते हैं। डॉ. शर्मा यह स्पष्ट करना चाहते थे कि निराला जितने विषयवस्तु के प्रति सतर्क थे, उतने ही कला के प्रति भी।

निराला के लिए स्वाधीनता आन्दोलन अभिन्न रूप से सामाजिक क्रांति से जुड़ा है। देश के नाम पर वे देश की जनता को भूलते नहीं है। डॉ. शर्मा निराला को संघर्ष और क्रांति का कवि मानते हैं। पर उनके लिए क्रांति का लक्ष्य देश को स्वतंत्र करना ही नहीं, बल्कि जनता को सामाजिक जीवन में मौलिक परिवर्तन कराना भी है। निरालाजी स्वाधीन शोषण मुक्त समाज के लिए क्रांति को आवश्यक मानते हैं। कहीं धारा, कहीं बादल, कहीं शिव और काली, कहीं पुराने पत्तों का झड़ना आदि निराला में क्रांति का जो रूप दिखलाई पड़ता है वह विनाशात्मक अवश्य है, किन्तु इसके पीछे सदियों की घुटन और लाखों मनुष्यों का हाहाकार है। डॉ. शर्मा लिखते हैं- "क्रांति की मूल प्रेरणा मानव-करुणा है, जो मनुष्य का दुःख दूर करना चाहती है। क्रांति का विनाशात्मक उद्देश्य तात्कालिक और अस्थायी है, उसका मूल उद्देश्य रचनात्मक और स्थायी है।"3

भारतीय स्वाधीनता का प्रश्न किसान-क्रांति से जुड़ा हुआ है। जिस प्रकार प्रेमचंद किसान-क्रांति का स्वप्न देख रहे थे उसी प्रकार निराला भी देख रहे थे। निराला को मालूम था कि बिना किसान-क्रांति के किसान ज़मींदारों और सूदखोरों के शोषण से मुक्त नहीं हो सकता। डॉ. शर्मा "राग-विराग" की भूमिका में लिखते हैं- "प्रेमचंद और निराला का ऐतिहासिक महत्व यह है कि उन्होंने समझा की भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन की धुरी है- किसान-क्रांति, साम्राज्यवाद के मुख्य समर्थक सामंतों के ख़िलाफ़ ज़मीन पर अधिकार करने के लिए किसानों का संघर्ष।"4 निराला के "बादल राग" कविता में किसान क्रांति की स्पष्ट झलक दिखलाई पड़ती है –

"जीर्ण बाहु है जीर्ण शरीर
तुझे बुलाता कृषक अधीर
ऐ विप्लव के वीर!
चूस लिया है उसका सार
हाड़ मात्र ही है आधार
ऐ जीवन के पारावार!
"5

निराला की क्रन्तिकारी भूमिका इस बात में निहित है कि उन्होंने हिंदी में मुक्त छंद का प्रवर्तन किया। परिमल की भूमिका में निराला लिखते हैं- "मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है। मनुष्यों की मुक्ति कर्मों के बंधन से छुटकारा पाना है, और कविता की मुक्ति छंदों के शासन से अलग हो जाना।"6 यद्दपि निराला का मुक्त छंद पूर्ण रूप से मुक्त नहीं है क्योंकि निराला ने मुक्त छंद का आधार कवित्त को माना है। इस सन्दर्भ में डॉ. शर्मा लिखते है- "मुक्त छंद पूर्णतः मुक्त नहीं है, इसका प्रमाण यह है कि उसका भी एक आधार है। वह आधार है कवित्त। निराला ने "पंत और पल्लव" निबंध में काफ़ी विस्तार से समझाया है कि मुक्त छंद, कवित्त के आधार पर ही सफल हो सकता है तथा कवित्त हिंदी का जातीय छंद है। इस निबंध में उनका तर्क अंतर्विरोधों में फंस जाता है। वह इस धारणा को छोड़ नहीं सकते कि भावों की मुक्ति छंद की मुक्ति चाहती है, साथ ही मुक्त छंद के लिए उन्हें कवित्त का आधार भी चाहिए"7

निराला का प्रकृति वर्णन अनोखा है। वे प्रकृति के ऐसे चित्र उकेरते है जो हिंदी कविता में बिल्कुल नये थे। निराला गंगा के कगार, धरती पर लू के झोंके, आकाश में जलता सूर्य, चारों ओर चिनगारियों की उड़ती धूल, धरती की गंध को व्यक्त करते पुष्प, बादलों का गर्जन, तर्जन, वर्षण, ऋतुचक्र सब पर लेखनी चलाते हैं। उनकी प्रकृति सम्बन्धी गीतों में श्रृंगार भावना का भी संयोग यत्र-तत्र दिखाई देता है। जुही की कली, सूखी री यह डाल, मेघ के घन केश, रंग गई पग-पग धन्य धरा, आदि कविताएँ श्रृंगार के संस्पर्श से निखर उठी है। डॉ. शर्मा लिखते हैं- "बहुत से प्रकृति सम्बन्धी गीतों में भी उन्होंने श्रृंगार–भावना का आरोप किया है.........निश्चय ही वह नई हिंदी कविता को मानव जीवन के अधिक निकट लाया है। उसमें वह मांसलता है जिसके अभाव ने अन्य छायावादियों को यथेष्ट अपकीर्ति दी। इन गीतों में उसके सजीव व्यक्तित्व की छाप है।8

डॉ. शर्मा की दृष्टि में निराला सामंती रुढ़िवाद से संघर्ष भी करते हैं और ऋग्वेद के दार्शनिक चिंतन को पुनर्जीवित भी करते हैं। निराला के काव्य में नवजागरण का जो स्वर वे सुनते हैं वह रवीन्द्रनाथ और विवेकानन्द के यहाँ अनुपस्थित पाते हैं। डॉ. शर्मा को निराला के यहाँ वाल्मीकि, भवभूति, और कालिदास की प्रतिध्वनियाँ सुनाई देती हैं और तुलसीदास के दार्शनिक दृष्टिकोण और कलात्मकता का प्रभाव भी दिखाई पड़ता हैं।

उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि डॉ. शर्मा ने निराला के साहित्य का समग्रता में मूल्यांकन किया तथा उन्हें विभिन्न आरोपों से मुक्त किया। डॉ. शर्मा निराला के मूल्यांकन करते समय निराला में व्याप्त अन्तेर्विरोधों को नज़रअंदाज़ नहीं करते, बल्कि उन अन्तेर्विरोधों सबके समक्ष उजागर करते हैं।

संदर्भ-ग्रन्थ

1. शर्मा रामविलास, निराला, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2004 भूमिका
2. वही द्वितीय संस्करण की भूमिका
3. शर्मा रामविलास, निराला की साहित्य साधना, भाग-2, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली प्रथम संस्करण 1972 पृष्ठ-150
4. शर्मा रामविलास (संपादक), राग-विराग, लोकभारती प्रकाशन, इलाहबाद, 1976 पृष्ठ-22
5.वही, पृष्ठ-56
6. इंद्रनाथ मदान (संपादक) निराला, लोकभारती प्रकाशन, इलाहबाद, 2008 पृष्ठ-
7. शर्मा रामविलास, निराला की साहित्य साधना, भाग-2, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली प्रथम संस्करण 1972 पृष्ठ-423
8. शर्मा रामविलास, निराला, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2004 पृष्ठ-73

शोधार्थी:
अश्विनी कुमार लाल
हिन्दी विभाग (कलकत्ता विश्वविद्यालय)
पता -110/1एल चितपुर बाजार काशीपुर रोड कोलकता
पिन संख्या -700002
मोबाईल संख्या - 8013172069
ई -मेल -monuteghoria@gmail.com


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