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07.28.2007
 
तेरी महक
अशोक वशिष्ट


तेरी हर चीज से, तेरी ही महक आती है,
तेरी हर चीज से, तेरी ही झलक आती है।

कितनी मेहनत से, इस जगको बनाया तूने,
कितने अरमानों से, इस जगको सजाया तूने,
इसके कणकण से, तेरे प्यार की भनक आती है।

तूने सूरज को, यूँ अंबर में टिकाया कैसे?
तूने चंदा को, यूँ अंबर में बसाया कैसे?
तारे तारे से, तेरे नूरकी चमक आती है।

तेरी तारीफ में, मैं शब्दों को कहाँ से लाऊँ?
तुझको गाने को, मैं गीतों को कहाँ से लाऊँ?
जबकि हर चीज से, तेरी ही महक आती है।


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