अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
01.18.2016


वेदों में संगीत तत्व एवं उसकी वर्तमान उपादेयता

प्राचीन काल से ही मानव जीवन में संगीत का विशेष महत्व रहा है। संगीत का आदि स्रोत प्राकृतिक ध्वनियाँ ही रही हैं। यदि हम ध्यान से सुने तो हवाओं में, पक्षियों के कलरव में, नदियों व झरनों के प्रवाह में एक सूक्ष्म संगीत सुनाई देता है। कालांतर में इन सभी ध्वनियों को आधार बनाकर उन्हें लय में बाँधने का प्रयास किया गया। प्रकृति प्रदत्त निर्मल भाव ध्वनियों ने मानव मन को झंकृत किया और और यही सभ्यता के विकास के साथ-साथ संगीत का साधन बनी।

भारतीय संगीत का आदि स्रोत वेदों की ऋचाओं में दृष्टिगोचर होता है। यदि वेदों को आधार बनाया जाय तो भारतीय संगीत का इतिहास कम से कम 4000 वर्ष पुराना है। संसार में सबसे प्राचीन व्यवस्थित संगीत सामवेद में प्राप्त होता है। संगीत के नाना प्रकार के प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रभाओं के अनुसंधान में प्रयत्नशील ऋषियों को ऐसी चमत्कारी सिद्धियाँ तथा आध्यात्मिक व आत्मिक उन्नति का इतना विशाल क्षेत्र प्राप्त हुआ, जिसे वर्णित करने के लिए उन्हें एक पृथक वेद की रचना करनी पड़ी। जो कि सामवेद नाम से प्रसिद्ध है। सामवेद की ऋचाओं में संगीत की बहुलता है। संगीत के अंतर्गत तीन कलाओं का समावेश है – गायन, वादन और नृत्य। इनमें मुख्य गायन है इसलिए इसका नाम संगीत पड़ा। संगीत जीवन को आनंद प्रदान करने वाला है। वर्तमान समय में भी यदि हम जीवन से संगीत को विलग कर दें तो मानव जीवन नीरस बन जायेगा और जहाँ नीरसता है वहीं मृत्यु है और जहाँ आनंद है वहीं वास्तविक जीवन है। जीवन तत्व को सजीव एवं ऊर्जावान बनाने का कार्य संगीत ही संपन्न करता है। वृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार – "प्राण ही साम है। वाणी स और प्राण अम है। इन दोनों के संयोग से साम बनता है, जो इस प्रकार साम को जानता है वह उसके सायुज्य एवं सलोकत्व को प्राप्त होता है।"1 भारतीय शास्त्रकारों ने स्पष्ट स्वरों में घोषणा की कि – "स्वरेण संतलीयते योगी" अर्थात् स्वर साधना द्वारा योगी अपने को तल्लीन करते हैं।

मानसिक एवं आत्मिक उन्नति में संगीत सर्वाधिक सहायक है। हमारे ऋषियों ने हज़ारों वर्ष पूर्व इस तथ्य को जाना, परखा एवं जीवन के लिए संगीत की उपयोगिता पर अनुसंधान किया। ऋग्वेद में कहा गया है कि – हे शिष्य तुम अपने आत्मिक उत्थान की इच्छा से उसे प्राप्त करने के लिए संगीत के साथ उसे (ईश्वर) पुकारोगे तो वह तुम्हारी हृदय गुहा में प्रकट होकर अपना प्रेम प्रदान करेगा –

"स्वरन्ति त्वा सुते नरो वसो निरेक उक्थिन....."2

सामवेद में ईश्वरीय संगीत शक्ति के अनेकानेक ऐसे रहस्य प्रतिपादित किये गये हैं जिनको आत्मसात करके मनुष्य अपनी आत्मिक शक्तियों को सूक्ष्म से विराट बना सकता है। वेदों की भांति संगीत की महत्ता को स्वीकार करते हुए स्कन्दपुराण में कहा गया है कि – नाद अर्थात संगीत ही परं ब्रह्म है, इस से अधिक श्रेष्ठ या इस से परे कुछ भी नहीं है –

"नाद एव परं ब्रह्म नास्मात्किन्चिद्त्परात्परम्"3

भारतीय संगीत परम्परा में संगीत को ईश्वर के समकक्ष स्थान प्रदान किया गया है। संगीत के सात स्वरों में सात देवों का वास होता है - अग्नि, ब्रह्मा, भारती (सरस्वती), मैं (शिव), विष्णु, गणेश, एवं सूर्य क्रमशः सात स्वरों के ईश हैं।4 मनुष्य के शरीर में भी सात चक्र माने गए हैं, इन चक्रों में अंतिम चक्र सहस्रसार में ही ज्ञान की ज्योति उद्दीप्त होती है और यह भी कितना वैज्ञानिक सत्य है कि प्राचीन ऋषियों ने संगीत के सप्तम स्वर के देवता के रूप में सूर्य को प्रतिष्ठापित किया है, जो कि प्रकाश अर्थात ज्ञान के प्रतीक हैं। वैदिक परम्पराओं से लेकर वर्तमान समय तक मानव जाति का संगीत के साथ अभिन्न सम्बन्ध रहा है, कदाचिद इसी कारण मानव जीवन के सोलह संस्कारों के पारम्परिक निर्वहन में इन्हें संगीत के साथ ही संपन्न किया जाता रहा है। लौकिक एवं अलौकिक साहित्य व संस्कृति में सभी देवी देवताओं को संगीत से सम्बद्ध किया गया है। स्वयंभू शिव डमरू की ताल के साथ तांडव करते हैं, तो देवी पार्वती मृदंग के साथ लास्य नृत्य करती हैं। लोकरंजन भगवान् कृष्ण वेणु वादन के साथ रास नृत्य में भी निपुण हैं। इसी प्रकार वीणावादिनी सरस्वती, नारद, अर्जुन, रावण आदि भी संगीत कला में पारंगत थे। इस प्रकार जिस संस्कृति में देवी-देवताओं का संगीत से इतना प्रेम हो वहाँ के जनमानस का संगीत के प्रति अनुराग व समर्पण स्वाभाविक ही है।

संगीत का प्रभाव मात्र मनुष्य पर ही नहीं पड़ता अपितु सभी जीव जंतु संगीत के प्रति आकर्षित होते हैं। भारतीय दर्शन में तो भगवान कृष्ण का बांसुरी वादन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है, जिसे सुनकर के समस्त प्राणी (मनुष्य व पशु पक्षी) मुग्ध हो जाते थे। संगीत मानवीय विचारों का विरेचन करके मस्तिष्क को शुद्ध बुद्ध बनाता है और प्रफुल्लता प्रदान करता है। इसी प्रफुल्लता व आनंद के विषय में सामवेद में कहा गया है कि "आत्मा अपने आत्मिक ज्ञान के प्रवाहों में सेवन-भजन करने और ग्रहण करने योग्य व काम क्रोधादि के वर्जन करने में समर्थ ज्ञानराशि को चारों और फैलावे।"5

भक्तिमय सात्विक गानों से चित्त की सात्विक वृतियाँ जागृत होती हैं। सात्विक गानों के धारा प्रवाह से इसमें तामसी व राजसी वृतियाँ प्रवेश नही कर पाती हैं। जिस प्रकार शांत जलाशय में जलपृष्ठ में समानता बनी रहती है तथा वह जल तरंगित नहीं होता है, उसी प्रकार सात्विक संगीत से मन की चंचलता स्थिर एवं शांत हो जाती है। एकाग्र मन को विद्याध्ययन से लेकर जीवन के किसी भी क्षेत्र में लगाकर अद्वितीय सफलताएँ प्राप्त की जा सकती हैं। चित्त के शांत होने पर ही यह आत्मा ध्यान के रसों को प्राप्त करके आगे बढ़ता है, अपने मातृ रूप प्रभु की गोद में बैठता है एवं उन्हीं को प्राप्त हो जाता है –

अयं गौ पृश्रिरक्रमीदसदान्मातरं पुरः। पितरं च प्रयन्त्स्वः॥6

हिन्दू धर्म के पुरुषार्थ चतुष्टय में जीवन का अंतिम पुरुषार्थ मोक्ष है। मोक्ष ही मानव जीवन का परम लक्ष्य है। नाद ध्वनि (Musical Sound) मोक्ष अर्थात मुक्ति (मन की मुक्तावस्था) के मार्ग को प्रशस्त करता है। नाद साधना के लिए एकाग्रता, मानसिक पवित्रता व निरंतर साधना की आवश्यकता होती है। आनंद की प्राप्ति ही संगीत साधना की पराकाष्ठा है। छंद गायन वैदिक काल से ही हमारी परम्पराओं के साथ जुड़ा हुआ है। ऋग्वेद के अनुसार – अनेक मनीषी भगवान् की और संगीतमय स्वर लगाते हैं और उसी के द्वारा उसे प्राप्त करते हैं –

"अभि स्वरान्ति भुवनस्य निसते"7

संगीत की यह कला भारत में कई शताब्दियों ईसा पूर्व पूर्ण रूप से विकसित हो चुकी थी। भारत का अनुसरण करते हुए पाश्चात्य देशों में भी संगीत का आरम्भ व विकास हुआ। कालान्तर में यही प्राचीन संगीत नूतन वाद्यों के साथ जनसाधारण में लोकप्रिय हुआ और पॉप म्यूज़िक बन गया। यह अलग बात है कि वर्तमान में संगीत का स्वरूप पूर्ण रूप से बदल गया है और कहीं-कहीं वह मानवीय भावनाओ को कुचलता हुआ कुत्सित होता चला जा रहा है। किन्तु इतना सब होते हुए भी संगीत का जो मूल गुण है वह आनंद प्रदान करना रहा है और इसमें वह आज भी पूर्णतः समर्थ है। वर्तमान आयुर्विज्ञान (Medical Science) व मनोविज्ञान (Psychology) इस तथ्य को पूर्ण रूप से स्वीकार करते हैं कि यदि मानवीय गुणों व आनंद को अक्षुण्य बनाये रखना है तो जीवन में संगीत अत्यावश्यक है।

सन्दर्भ –

1 – वृहदारण्यक उपनिषद 1/3/22, संस्कृति संस्थान वेद नगर बरेली उत्तर प्रदेश, संस्करण सन 1981
2 – ऋग्वेद 8/33/2, आर्य साहित्य मंडल लिमिटेड अजमेर, राजस्थान संस्करण सन 1935
3 – स्कन्द पुराण (केदारखंड) 67/3, हिंदी साहित्य सम्मलेन प्रयाग 12 इलाहाबाद, संस्करण सन 1994
4 - स्कन्द पुराण (केदारखंड) 67/55, हिंदी साहित्य सम्मलेन प्रयाग 12 इलाहाबाद, संस्करण सन 1994
5 - पंडित जयदेव शर्मा विद्यालंकार, सामवेद संहिता भाषा भाष्य – 1/6/696 आर्य साहित्य मंडल लिमिटेड अजमेर, राजस्थान संस्करण संवत 1988 विक्रमी।
6 - पंडित जयदेव शर्मा विद्यालंकार, अथर्ववेद संहिता भाषा भाष्य 6/31/1 . आर्य साहित्य मंडल लिमिटेड अजमेर, राजस्थान. संस्करण संवत 1985विक्रमी।
7 - ऋग्वेद 8/58/13, आर्य साहित्य मंडल लिमिटेड अजमेर, राजस्थान, संस्करण सन 1935

पत्र व्यवहार का पता-

अशोक दत्त नौटियाल , ASHOK DUTT NAUTIYAL
ग्राम – खितोटिया, VILLAGE- KHITOTIYA
पोस्ट ऑफिस – सिरोली POST- SIROLI
ब्लाक- बीरोंखाल, BLOCK- BIRONKHAL
जिला- पौड़ी गढ़वाल, DISTT- PAURI GARHWAL
उत्तराखंड UTTARAKHAND
पिन कोड 246276. PIN CODE 246276
Email- ashoknautiyal9@gmail.com,
Mobile- 09536464562 & 09760278253


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें