अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
05.12.2016


जनकवि केदारनाथ सिंह

7 जुलाई 1934 को उत्तर प्र देश के बलिया जिले के चकिया गाँव में जन्मे डॉ केदारनाथ सिंह स्वातंत्र्योत्तर समकालीन साहित्यकारों में अग्रणी स्थान रखते हैं। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 1956 में हिंदी विषय में एम्. ए. तथा सन् 1964 में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। गोरखपुर में उन्होंने कुछ समय तक अध्यापन कार्य किया तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली के हिंदी विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत हुए।

अज्ञेय द्वारा सम्पादित तीसरे सप्तक(1959) के आधार पर कहा जा सकता है कि समकालीन कविता के सशक्त हस्ताक्षर कविवर केदारनाथसिंह ने व्यवस्थित लेखन सन् 1950 से आरम्भ किया। तीसरे सप्तक में अन्य छः कवियों के साथ उनकी कविताएँ प्रकाशित हुईं। केदारनाथ जी के "जमीन पक रही है", "यहां से देखो", "अकाल में सारस", "बाघ", "सृष्टि पर पहरा" आदि काव्य संग्रह प्रकाशित हुये हैं।

केदारनाथ जी का रचना संसार एकांगी न होकर बहुआयामी है, उसमें जीवन के अनेक रंगों की छटा दिखाई देती है। गद्य एवम् पद्य पर उनकी पकड़ समान रूप से है। और यही एक उत्कृष्ट साहित्यकार का प्रमुख लक्षण है। उनके प्रमुख लेख एवम् कहानियों में "मेरे समय के शब्द", "कल्पना और छायावाद", "हिंदी कविता बिम्ब विधान" और "कब्रिस्तान में पंचायत" उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त सम्पादन कार्य में भी उनकी विशेष रुचि रही है। ताना-बाना (आधुनिक भारतीय कविता से एक चयन), समकालीन रूसी कविताएँ, कविता दशक, साखी पत्रिका व शब्द पत्रिका का उन्होंने सम्पादन किया।

सामाजिक परिवेश, परम्पराएँ, संस्कृति व युग परिवेश का साहित्य सृजन पर प्रत्यक्ष एवम् अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में प्रभाव पड़ता है। व्यापक सामाजिक परिवेश से ही सृजनशीलता को सही दिशा एवम् यथार्थ प्रेरणा प्राप्त होती है। जटिल विषयों पर अत्यंत सरल एवम् आम भाषा में लेखन कार्य करना केदारनाथ जी की विशेषता है। और यही कारण है कि वे अधिकाधिक पाठकों तक पहुँच पाये हैं। उनके रचना संसार को पढ़ने पर यह एहसास होता है कि वे भौतिक रूप से तो महानगर में हैं किन्तु मानसिक रूप से पूर्णतः लोक जगत से जुड़े हुए हैं। लोकजीवन ही उनकी मनोभूमि व काव्यभूमि है। उनको रचनाकर्म की ऊर्जा उनकी जड़ों अर्थात लोक से ही प्राप्त होती रही है।

केदारनाथ जी की कविताओं का संग्रह "अकाल में सारस" सन् 1988 में प्रकाशित हुआ। यह 61 कविताओं का संकलन है जिसमें कि कवि की 1983 से 1987 तक की कविताओं को संकलित किया गया है। इस काव्य संग्रह की प्रमुख शीर्ष कविता अकाल में सारस सीधे अर्थों में अकाल पर केंद्रित होते हुए भी अर्थ का अतिक्रमण करती हुयी प्रतीत होती है। अकाल में सारस कविता में सुदूर प्रदेशों से सारस पानी की खोज में आते हैं। एक बुढ़िया अपने आँगन में एक पानी से भरा कटोरा रखती है लेकिन सारस उस कटोरे का पानी नहीं पीते हैं और उड़ जाते हैं।

"अचानक
एक बुढ़िया ने उन्हें देखा
ज़रूर ज़रूर
वे पानी की तलाश में आये हैं
उसने सोचा
वह रसोई में गयी
और आँगन के बीचोंबीच
लाकर रख दिया
एक जल भरा कटोरा।"1

पानी का कटोरा ही यहाँ पर अकाल में दूब की स्थिति को दर्शाता है। "अकाल में सारस" कविता शहर को व शहरी जीवन को दयनीय मानने की टिप्पणी के साथ समाप्त होती है। शहर में जीवन तत्व अर्थात पानी की उपलब्धता के विषय में सारस शंकित हैं

"पानी को खोजते
दूर देसावर तक जाना था उन्हें
सो उन्होंने गर्दन उठाई
एक बार पीछे की ओर देखा
न जाने क्या था उस निगाह में
दया कि घृणा
पर एक बार जाते जाते
उन्होंने शहर की ओर
मुड़कर देखा ज़रूर।"2

"अकाल में दूब" नामक कविता में दूब जीवन की एक अंतिम आशा की किरण व जीवन की जिजीविषा को दर्शाती है और यह बताती है कि अभी बहुत कुछ बचा है इस धरती पर-

"कहते हैं पिता
ऐसा अकाल कभी नहीं देखा
ऐसा अकाल कि बस्ती में
दूब तक झुलस जाये
सुना नहीं कभी
×××××××××
अचानक मुझे दिख जाती है
शीशे के बिखरे टुकड़ों के बीच
एक हरी पत्ती
दूब है
हाँ हाँ दूब है
पहचानता हूँ मैं
लौटकर यह खबर
देता हूँ पिता को
अँधेरे में भी
दमक उठता है उनका चेहरा
है अभी बहुत कुछ
अगर बची है दूब।"3

कविवर केदारनाथ मानवता के कवि हैं। वे मानव मन की पीड़ा को भलीभाँति जानते हैं। विश्वनाथ तिवारी जी का यह वक्तव्य समीचीन लगता है कि - "केदारनाथ सिंह की कविताओं में "मैं" की चेतना कवि की कविताओं को आत्मपरक बनाती हैं। वह मनुष्य की नियति को, उसकी पीड़ा को,समय के दबाव को अपने भोग के स्तर पर निजी बनाकर व्यक्त करता है। आशा, आकांक्षा, प्यास अतृप्ति बेचैनी अकेलेपन की उदासी इस कवि में बहुत गहरी है।"4

वर्तमान स्थिति में नयी कविता पर जो दोषारोपण किया जाता है, उसमें यह कहा जाता है कि यह मात्र एकांगी और अति वैयक्तिक कविता है, जिसमें साहित्यिक मर्यादाओं का और परम्पराओं का उल्लंघन करके केवल व्यक्तिगत सीमाओं को ही स्वीकार किया जाता है। किन्तु केदारनाथ जी इन सभी मान्यताओं को ध्वस्त करते हुए आगे बढे हैं। "केदारनाथसिंह चीज़ों का ठीक-ठाक वर्णन करने वाले हिंदी के विरले कवियों में से हैं और चीज़ों का ठीक-ठाक वर्णन जहाँ एक ओर सौंदर्य व उल्लास की ओर ले जाता है वहीं जीवन की विसंगतियों एब्सडीर्टीज़ की ओर भी ले जाता है।"5 सम्पन्न जीवन क्या है और इस जीवन के उनके लिए क्या मायने हैं? यह उनसे बेहतर कोई नहीं जानता। प्रतीकार्थ में वे जीवन को दोने की संज्ञा देते हुए लिखते हैं कि-

"मेरा जीवन
एक दोना है
सींक से बुना हुआ पत्तों का दोना
जिसमें मेरे जन्म के दिन से ही
टप टप टपक रही है धूप
मैं उसे पीता हूँ
उतना ही बूँद बूँद भरता जाता है मेरा दोना
दोना ही तो है
कोई एक दिन उठाकर फेंक देगा बाहर
पर उसी को लेकर अपने दोनों हाथों में
मैं सूर्य से भी ज्यादा सम्पन्न हूँ
इस पृथ्वी पर।"6

सन् 1989 में कवि के इस काव्य संकलन को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया।

केदारनाथ सिंह जी की सबसे चर्चित एवम् प्रमुख कृति "बाघ" नामक कविता है जो की उनकी काव्य प्रतिभा का लोहा मनवाती हुयी प्रतीत होती है।बाघ कविता सर्वप्रथम आलोचना पत्रिका में प्रकाशित हुयी थी। इसमें छोटे बड़े 21 खण्ड हैं। पूर्व में इसका आकार छोटा था किन्तु बाद में कवि ने इसको विस्तार प्रदान किया तथा भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन ने इसको पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया।

"बाघ" नामक कविता लिखने की प्रेरणा कवि को हंगरी भाषा के रचनाकार यानोश पिलान्स्की की एक कविता पढ़ने के बाद मिली थी। वह कविता पशुओं के लोक से सम्बंधित थी। भारतीय साहित्य परम्परा के संस्कृत भाषा के अंतर्गत पंचतंत्र भी पशुलोक से सम्बंधित था इस कारण कवि का ध्यान अनायास ही पंचतंत्र की ओर गया और बाघ नामक कविता लिखी।

केदारनाथ जी की विशेषता यह है कि वे अपने काव्य को प्रभावपूर्ण व सशक्त बनाने के लिए वे निरंतर नए-नए मार्ग बनाते रहे हैं, यह उनका काव्य कौशल ही है जो कि बाघ जैसे खूंखार जीव को भी एक नए रूप में स्थापित करते हैं। उनकी कृति "बाघ" में बाघ निरंतर गतिमान रहते हुए अर्थ संभावनाओ की निरंतर वृद्धि करता रहता है। बाघ के जितने भी रूप कवि ने उकेरे हैं उनमे वह उत्सुक, मानवीय जिज्ञासा युक्त, शांत, अहिंसक व संवेदनशील रूप में हमारे सामने आता है। कविता में बाघ की संवेदनशीलता को व्यक्त करता यह शब्द चित्र दृष्टव्य है-

"उसे पता था
कि जिधर से भी उठता है धुँआ
उधर होती है बस्ती
उधर रंभाती हैं गायें
उधर होते हैं गरम-गरम घर
उधर से आती है
आदमी के होने की गंध।"

केदारनाथ जी की कविताओं में ग्रामीण जनजीवन की अनेक झलकियाँ मिलती हैं। और अपने ग्रामीण जीवन के प्रति उनको बेहद लगाव है। वे कहते हैं- "मैं गाँव का आदमी हूँ और दिल्ली में रहते हुए भी एक क्षण के लिए भी नहीं भूलता कि मैं गाँव का हूँ। यह गाँव का होना कोई मुहावरा नहीं बल्कि इसके विपरीत मेरे जीवन की एक गहरी लगाव भरी वास्तविकता है, जिसे मैं अनेक स्तरों पर जीता हूँ। साल में कम से कम डेढ़ दो महीने मैं गाँव में गुजारता हूँ और वहां के सुख दुःख में हिस्सा लेता हूँ।×××× गाँव की चेतना और आधुनिक जीवन की वास्तविकता के बीच एक संतुलन पूर्ण तनाव समकालीन हिंदी कवि के लिए ज़रूरी है। मेरी कोशिश उसी दिशा में है।"7 अपनी इसी कोशिश के बल बूते उन्होंने काव्य भाषा को नए आयाम प्रदान किये। जिसका कि एक पक्ष ग्रामीण लोक जीवन से चेतना प्राप्त करता है और दूसरा पक्ष नूतन प्रतिभा से अनुप्राणित लगता है। उनका काव्यबोध एवम् उसके सम्बन्ध में विकसित काव्य शैली दोनों का ही आग्रह विशिष्टता को स्थापित करना रहा है। "वे काव्य विकास के अपने हर दौर में वस्तु के स्तर पर जमीन से जुड़े रहे हैं और विधान के स्तर पर बिम्ब से। सामान्यतः जमीन की महिमा का बखान करने वाले अधिकतर कवि अभिधा और सपाट बयानी पर आश्रित रहते हैं जैसे नागार्जुन, सुमन या कि आगे चलकर धूमिल। केदारनाथ सिंह का रास्ता इनसे अलग है,जो कि कवि कर्म की दृष्टि से जितना कठिन है उपलब्धि की दृष्टि से उतना ही सर्जनात्मक।"8

मनुष्य अपने पुरुषार्थ एवम् योग्यता के बल पर जीवन में सम्मान, पद, प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। कविवर केदारनाथ जी ने भी अपनी लगन व योग्यता के आधार पर अनेक पुरस्कार व सम्मान प्राप्त किये। सन् 1997 में उन्हें "उत्तर कबीर व अन्य कविताएँ" कृति पर व्यास सम्मान से सम्मानित किया गया तथा उनके सम्पूर्ण साहित्यिक योगदान पर वर्ष 2013 का ज्ञानपीठ पुरस्कार 10 नवम्बर 2014 को प्रदान किया गया।

जीवन पथ के 81वें पड़ाव पर भी कविवर केदारनाथ जिस ऊर्जा के साथ रचना कर्म में लगे हुए हैं वह जीवन एवम् जगत के प्रति उनकी गहरी आस्था तथा जीवंतता का प्रमाण है। उन्हीं के शब्दों में-

"उसके हाथ को
अपने हाथ में लेते हुए
मैंने सोचा
सारी दुनिया को
हाथ की तरह
गर्म और सुंदर होना चाहिए।"

सन्दर्भ :-

1- केदारनाथ सिंह : अकाल में सारस पृष्ठ 21
2- तदैव पृष्ठ 23
3- तदैव पृष्ठ 20-21
4- विश्वनाथ प्रसाद तिवारी : समकालीन हिंदी कविता, पृष्ठ 159
5- विष्णु खरे : कवि केदारनाथ सिंह, पृष्ठ 240
6- जन्मदिन की धूप में, अकाल में सारस पृष्ठ 64
7- केदारनाथ सिंह : मेरे समय के शब्द, पृष्ठ 182
8- रामस्वरूप चतुर्वेदी : हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, पृष्ठ 242

अशोक दत्त नौटियाल

(शोधार्थी हिंदी)
हेमवती नंदन बहुगुणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल
दूरभाष 09536464562
Email - ashoknautiyal9@gmail.com


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें