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ISSN 2292-9754

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06.08.2016


दुहाई है दुहाई

.बधाई हो भाई, बधाई हो, मेरा मतलब दुहाई है, दुहाई हो! क्या कहा, बेगम ने खाने में आज कुछ बनाया है...मेरे मौला, मैं क़ुर्बान जाऊँ, अगर उसके मन में आज कुछ बनाने का विचार भी आया है तो...!

भाई मेरे, बेगम ने अभी कुछ नहीं बनाया है। उसके दिल में बस कुछ बनाने का ख़्याल आया है...इस मुद्दे को लेकर ...उसने एक योजना बनाई है.... अपने और मेरे बीच एक "मीटिंग" भी बुलाई है। विचार-विमर्श के बाद ही हम मिल-जुलकर, भाईचारे और प्रेमभाव से, सद्भावना-पूर्ण वातावरण में, बिना किसी "हॉकी-मैच" खेले, (बिना गाली-गलोच के, बिना कोई कप-प्लेट एक दूसरे पर फेंके आदि) यह तय करेंगे कि आज बेगम खाने में क्या बनाये? अगर इस बात पर आज रात्रि से पहले हम दोनों में कोई सहमति हो जाती है तो आज हमारे घर में खाना पकेगा, नहीं तो खाना पकाने और खाने की बात अगले कल तक "पेंडिग" हो जायेगी और कल किसने देखा है? कल की कल सोचेंगे!

"हनी, आज खाने में मैं क्या बनाऊँ?" बेगम की मेरे कान में आवाज़ पडती है।

यदि कभी आप की धर्मपत्नी भी ऐसा ही सवाल करे तो मैं अपने पच्चीस वर्षों के "सिल्वर जुबली" शादी-शुदा तजुर्बे के आधार पर किसी से भी यह शर्त लगाकर कह सकता हूँ कि हमारे या आपके घर में सिर्फ़ ख़्याली-पुलाव ही पक रहे हैं... और घर में आज कुछ नहीं पकने वाला! क्यूँ इस विवाद में आप पड़ते हैं या अपना समय बर्बाद करने पर तुले हैं? राम का नाम लें और "नागा" या वो क्या कहते हैं "फाका" करने का संकल्प लेकर अपने सोने का इंतज़ाम करें। कहते हैं, जितनी ज़्यादा उम्मीद रखो, बाद में उतनी ही ज़्यादा निराशा होती है!

यह ज़रूरी नहीं कि इंसान अपने ही हाथ जलाकर कुछ सीखे, आदमी वही समझदार होता है जो अपने हाथ जलाये बिना ही दूसरों के तजुर्बे से कुछ सीखे...और जनाब अपना तजुरबा हम "नो फी बेसिस" पर आप से सांझा कर रहे हैं!

मेरे इस लेख को पढ़ने के पीछे अगर आपकी यही एक दिलचस्पी है कि मेरे घर में आज क्या पका या बेगम ने आज खाने में क्या परोसा तो आप का और मेरा साथ बस यहीं तक का था।

मुझे ख़ुद को भी इस बात का ज्ञान नहीं है कि आज "डिनर" में क्या सर्व होगा और कुछ सर्व होगा भी कि नहीं। यह मर्द जात भी बड़ी शक्की होती है और मैं भी आप मर्दों से अलग नहीं हूँ! वैसे तो रामदुलारी की कभी भी कुछ पकाने-बनाने की इच्छा और "नीयत" नहीं होती और अगर वह कभी कुछ बनाने की हिम्मत करने की सोचती भी है तो मुझे विश्वास नहीं होता! कहते हैं "बद से बदनाम बुरा"।

फिर भी पेट भरने का मसला होता है...भूखे भजन न होई गोपाला...इसलिये मैं भी बेगम से ख़ुद ही पूछ लेता हूँ - "हनी, आज खाने में क्या बना रही हो?"

बेचारी मेरा दिल कभी नहीं तोड़ती, मेरा मन रखने के लिए पूछती है, "आप ही बताओ?"

बेगम का जवाब सुनकर मेरा दिल ख़ुश हो जाता है और कुछ क्षणों के लिये मेरा मुँह भी बंद हो जाता है!

मुझे भी बेगम का मान रखना पड़ता है हालाँकि मुझे परिणाम का पहले से ही पता होता है। यह जो रिश्ते हैं दो-तरफ़ा "स्ट्रीट" की तरह है जिस पर चलकर हम हर-रोज़ एक दूसरे से मिलते हैं! हमारे संबंध यदि एक-तरफ़ा गली होते तो शायद हम एक-दूसरे से कभी न मिलते और कहीं दूर निकल जाते!

मैं भी दिखावटी ज़िद्द करता हूँ और कहता हूँ, "आज जो भी बनाना तुम्हें आसान लगे, वही बना लो।"

लेकिन, मेरी पालनहारी…रामदुलारी... बस, एक कृपा करो, जल्दी से बना लो जो भी तुम्हें बनाना आसान लगता है। "डिश" को नाम मिलकर हम बाद में दे लेंगें। पेट में चूहे कूद रहें हैं...!
"आप हुक्म करें, स्वामी, मैं क्या बनाऊँ, मुझे क्या खाना बनाना नहीं आता या इससे पहले मैंने कभी खाना नहीं बनाया क्या?"

"आज "हवाई-गोश्त" बना लूँ..?" बेगम मेरे गले में अपने हाथ डालते हुए पूछती है जैसे किसी हलवाई की बिटिया हो। सुल्ताना की बेटी का अपने गले में स्पर्श पाकर पहले तो में डर गया, फिर याद आया कि अगर बेगम को मैंने ऐसा करने दिया तो – न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये? – बेगम के हाथों का स्पर्श अपने गले में पड़ते ही मुझे उस हास्य कवि की यह पंक्ति याद हो आई जो कुछ दिन पहले हमारे शहर में मुशायरा करने आया था!

अपने गले तक रामदुलारी के हाथ पहुँचते देख कर मेरी तो भूख वहीं की वहीं उतर जाती है!

मैं भूख का मारा, लाचार-बेचारा, बुद्धि का मारा, बेगम पर खाने के लिए निर्भर, यतीम-सा, फिर पूछता हूँ, "यह हवाई गोश्त क्या होता है? मैंने पहले कभी इस "डिश" का नाम अपने या किसी अपनों के यहाँ सुना नहीं। भला, इसकी "रेस्पी" क्या है "हनी"?" मैं फिर बेगम से आग्रह करता हूँ कि बनाने से पहले मुझे वह यह बताये कि "डिश" में क्या-क्या पड़ता है।

...तो बड़े नाज़ से बेगम कहती है "हवाई गोश्त...जैसा नाम वैसे इसकी सामग्री - इसमें कुछ नहीं पड़ता...इसीलिये उन्होंने ने इस "डिश" का नाम "हवाई गोश्त" रखा है...?"

"यह "उन्होंने" कौन? इन सबको मौला, तुम्हें मिलाकर सब को थोड़ी अक्कल दे…लगता है तुम्हारी यह सब सहेलियाँ एक ही "पाक-विद्या" के स्कूल की ग्रेजुएट हैं?" मैं झल्लाता हुआ कहता हूँ!

"चलो, ग़ुस्सा छोड़ो, बताओ खाने में क्या बनाऊँ?"

"ऐसा करो, आज ज़रा ज़हर ही पका लो...!" सच कहता हूँ कि मेरे पास अगर कोई दीवार होती तो मैं अपना सिर पटक लेता… मेरा तो बिना सिर-पटके ही "हर्ट" होने लगा है।

एक बात कहूँ, बेगम राम दुलारी दिल की है बहुत अच्छी...उसके माँ-बाप ने उसे... वो क्या कहते हैं... बड़े अच्छे संस्कार दिये हैं..! मेरे पूछे बिना बेचारी कुछ नहीं करती, इसलिये उसे यह फ़ैसला लेने में बहुत मुश्किल आती है कि खाने में वह हर रोज़ क्या बनाये!

आज क्या बनाना है? जल्दी से कोई फ़ैसला हो तो पेट में कुछ जाये...और फिर उसके बाद कोई दूसरा काम हो।

रामदुलारी फिर पूछती है, "खाने में क्या बनाऊँ?"

"कुछ भी बना लो, क्या बनाओगी, भला?"

"जो आप कहो? आप बताओ मैं क्या बनाऊँ?"

"चलो, आज दाल-रोटी ही बना लो...!"

"हाय... हाय...दाल-रोटी खा के तो मेरा नाक सड़ा-पड़ा है, आपको इसके अलावा कुछ और अच्छा नहीं लगता...और मेरे पास तो आटा भी गूँधा हुआ नहीं पड़ा, घड़ी देखो, पहले ही नौ बज़ गए हैं, कब आटा गूँधूँगी और कब चपातियाँ बनेंगी और कब हम खाना खाएँगे...?"

"मैं तुमसे सहमत हूँ, चलो ऐसा करो "राईस-पुलाव ही बना लो!"

"पुलाव अभी परसों ही तो खाया था...!" रामदुलारी मुझे याद दिलाती है , जैसे मुझे "एलज़ाईमर" (Alzheimer) की बीमारी हो (वह बीमारी जिसमें व्यक्ति अपनी याददाश्त खो बैठता है!)

मैं कुछ सोचने के बाद कहता हूँ, "तो छोले पूरी बना लो।"

रामदुलारी बोली, "बच्चे नहीं खायेंगे। वे तली हुई चीज़ें नहीं खाते।"

(बच्चे,... क्या फिर स्वाहा-मिट्टी खाते हैं, मैंने मन ही मन में खीज़ कर कहा।)

"अंडे की भुर्जी बना लो।"

"ओहो, भला क्या हो गया है आपको?...आज मंगलवार है, आज के दिन घर में अंडा-मीट नहीं बन सकता!"

"वैजिटेरियन चाईनीज़ बना लो...!"

"मेरे पास नूडल और उसमें पड़ने वाला सामान नहीं है..."

"कढ़ी चावल....?"

जवाब मिला, "घर में दही नहीं है।"

"इडली सांभर?"

"इडली सांभर तो पूरे रात दिन पहले करने का काम है, पहले बोलना था।"

"एक काम करो मैग्गी बना लो। जल्दी भी बन जायेगी!" फिर मैं सुझाव देता हूँ!

"पेट नहीं भरता मैग्गी से।"

"कहो तो होटल से मँगवा लेते हैं।"

रामदुलारी ने आपत्ति दर्ज की, "रोज-रोज बाहर का नहीं खाना चाहिए।"

"तो.... फिर क्या बनाओगी?" विनम्रतापूर्वक मैं पूछता हूँ.

"जो आप कहेंगे।"

"तुम ऐसा करो...अपना मुँह बना लो, उसे देखकर ही मेरा पेट भर जायेगा...आज कोई नई बात थोड़ी है, तुम्हारी?

" ओहो, कब से तो आप से पूछ रही हूँ कि क्या बनाऊँ...मुझे नहीं समझ आ रहा कि रोज़-रोज़ मैं क्या बनाऊँ?"

अफ़सोस, खाना बनाने वाले लोग लगभग लुप्त होते जा रहे हैं। हाँ, खाने के नाम पर रेस्पियाँ देने वालों की संख़्या ज़रूर बढ़ रही है!

इसलिए रेस्पियाँ देने वालों के लिए मैं यह कहता हूँ -

"इन्हें खाना बनाने से क्या मतलब?
यह लोग बस रेस्पियाँ बताने वाले हैं!"

अफ़सोस, हमारे रसोई घर आज एक शृंगार-गृह अथवा सजावट के केंद्र मात्र बनकर रह गए हैं। आज न उनमें से धूएँ की कोई गंध आती है और न ही किसी चीज़ के पकने का कोई संकेत ही मिलता है!

आपको यह सुनकर ताजुब नहीं होगा यदि आने वाले समय में लोग अपने पौते-पौतियों को यह कहानियाँ सुनाया करेंगे.. बहुत साल पहले की बात है... तुम्हारी अम्मा ...आटा गूँधकर...सबसे पहले एक गेंद के आकार का कुछ गोल सा बनाती थी ...शायद उसे लोग 'पेड़ा' कहते थे…वह फिर उस पर पलेथन लगाकर उसे चकले-बेलने पर गोल आकार में बेलती थी, फिर उसे तवे पर सेंकती थी जिसे लोग रोटी कहते थे ...!

आजकल तो लड़की वाले शादी करने से पहले ही पूछ लेते हैं – "आपको नौकरी वाली पत्नी चाहिये या रोटी पकाने वाली माई?"

कई बार तो मेरा यह "फ़ार्मूला" भी लग जाता है। मैं मिन्नतें करके अपनी सासू माँ को अपने घर "डिनर" पर बुला लेता हूँ। अपनी मम्मी के आने का समाचार सुनकर बेगम की टाँगों में बिजली की-सी फुर्ती आ जाती है! इस तरह खाने के साथ मुझे भी खाने को रोटी के अलावा खीर या रसगुल्ले भी मिल जाते हैं!

और अगर मुझे किसी दिन एकांत चाहिये होता है तो उस दिन मैं अपनी मम्मी को अपने इधर आने का न्यौता दे देता हूँ ...बेगम को उस दिन सिरदर्द होने लगता है और वह अपने कमरे में चली जाती है। उसे मेरी मम्मी के आने की सूचना दी जाये तो मैंने अकसर उसके माथे पर सिर दर्द के बहाने रुमाल बँधते देखा है।

पिछले कल जब बेगम ने फिर यही सवाल किया कि वह 'डिनर' में क्या बनाएँ तो जनाब मेरा जवाब था, "खाना-बनाने की छोड़ो, चलो तुम्हें माल ले चलता हूँ!"

"मुझे शॉपिंग करवाने ले जा रहे हो...?"

"नहीं, आज वहाँ पोलियो के टीके फ्री में लग रहे हैं ...!"


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