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ISSN 2292-9754

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10.26.2016


ज़िंदा-जी हरिद्वार यात्रा

ता उम्र व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ते-लड़ते मरने को आ गया तो अचानक याद आया कि मरने के बाद मैं कहीं जाऊँ या न, कम से कम हरिद्वार तो जाना ही पड़ेगा। तो क्यों न कम से कम ज़िंदा-जी वहाँ कि स्थितियों का जायज़ा ले लिया जाए ताकि मरने के बाद वयवस्था से अपने को एक और शिकायत न हो।

सच पूछो तो मैं मरने से उतना नहीं डरता जितना धर्म से डरता हूँ। ये धर्म ही है जो समाज में कभी भी कुछ भी करने का माद्दा रखता है। कहते हैं, धर्म जोड़ता है। पर मैंने तो इस तोड़ते-मरोड़ते ही बहुधा देखा। एक ही आदमी को सैंकड़ों हिस्सों में टाँकते देखा। मरने के बाद बंदा ही जाने कि वह कहाँ जाता है, कहीं जाता भी है या नहीं, पर हम फिर भी लाख सेक्युलर, समाजवादी होने के बाद भी उसके जीते जी उसके बारे में उतने चिंतित नहीं होते जितने चिंतित उसके मरने के बाद उसके बारे में होते हैं।

बस, यही सोच सारे काम-धाम छोड़ हरिद्वार के लिए बस पकड़ी और नाक पकड़े हरिद्वार जा पहुँचा। वहाँ पहुँचते ही एक पहुँचे हुए पंडित जी टकर गए। गोया वे मेरा ही इंतज़ार कर रहे हों। आत्माओं के प्रति उनके मन में इंतज़ार देख मन बाग़-बाग़ हो उठा। मुझे सिर से पाँव तक तोलने-देखने के बाद अलापे, "कहो, कैसे आना हुआ?"

"मरने के बाद तो सभी टाँगें न होने के बाद भी यहाँ की यात्रा चाहे-अनचाहे करते ही हैं, पर मैं मरने से पहले बस यों ही चला आया। यहाँ की व्यवस्था देखने। सोचा, हांडी-लोटे में पड़े तो सभी आपके दर्शन करते ही हैं, जीते जी भी जो आपसे एक बार साक्षात्कार हो जाए तो....," मैंने कहा तो वे चौंक कर बोले, "मान गया तुम्हारा दुस्साहस हे जीव! जो ज़िंदा रहते ही हमारे से मिलने चले आए। यहाँ तो जीव मरने के बाद भी आने से, हमसे मिलने से डरता है वहाँ तुम ज़िंदे ही चले आए?"

"पंडित जी, इसलिए आया हूँ कि मरने के बाद यहाँ कि सुव्यवस्था देख परेशान न होना पड़े। पहले ही कहीं की व्यवस्था के बारे में पता हो तो कुछ भी घटते देखते मन नहीं दुखता। बस इसीलिए......."

"गुड! वैरी गुड! बहुत दूरदर्शी मालूम होते हो?" कह वे अपनी राह होने को हुए तो मैंने उन्हें तनिक रोकते पूछा, "माफ़ करना, पर सुना है जीवों को स्वर्ग पहुँचाने वाला रास्ता यहीं से शुरू होता है?"

"हाँ! कोई शक़?"

"नहीं! आप पर शक़ कर नरक को जाना है क्या? बंदा अपने कर्मों से स्वर्ग को जाए या न पर आपके बूते नरक को जा ज़रूर सकता है। मैं चाहता था कि जो आपकी मेहरबानी हो तो... इस नरक में रहते-रहते असल में बहुत तंग आ गया हूँ.....," कह मैंने जेब में हाथ डाला तो वे बोले, "नहीं। हम विधि के विधान के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कर सकते। इसलिए बेहतर होगा अपना हाथ जेब से निकाल लो। बंदे के मरने के बाद तो हम ख़ुद ही उसके लाख जेब पकड़े रखने के बाद भी उसकी जेब में हाथ डाल लेते हैं। हमारी भी एक जीव ट्रांसपोर्ट कंपनी है आइएसओ। पर हमारे क़ायदा है कि हम मरने के बाद भी जीव को स्वर्ग को भेजते हैं।"

"क्यों? ज़िंदा-जी क्यों नहीं? ज़िंदे जीव के पास दिमाग़ और आँखें तो दोनों होती हैं?"

"होती हैं। इसलिए तो ये नहीं हो सकता। ज़िंदे आदमी के पास पर वे आँखें नहीं होतीं जिनसे स्वर्ग-नरक का रास्ता दिखे। नश्वर आँखें तो अपने स्वार्थ से आगे रत्ती भर नहीं देख सकतीं। स्वर्ग-नरक का रास्ता मरने के बाद ही जीव को दिखता है। जीवित की आँखों और दिमाग़ पर माया के बहुत गाढ़े पर्दे पर पर्दे पड़े होते हैं," उन्होंने सतर्क तर्क दिया।

"पर मेरी आँखें तो सब देख सकती हैं," मैंने अपनी आँखों पर ठोक-बजा कर दावा प्रस्तुत किया तो वे बोले, "बस! यहीं तो जीव धोखा खा जाता है बुद्धू! सब्सिडी वाले राशन के चलते राशन कार्ड पर अंकित आटे-दाल के अतिरिक्त और कुछ असल में बंदे को दिखता ही नहीं, चाहे वह कितनी ही कोशिश क्यों न कर ले। धर्म के विनाश का कारण भी यही तर्क है। जीव दूसरों की आँखों से अधिक जब अपनी आँखों पर विश्वास करता है तभी तो सारे तीर्थ करने के बाद भी जीव नरक में औंधे मुँह जाकर पड़ता है। तुम्हें भी स्वर्ग का द्वार हम दिखाएँगे तो ज़रूर, पर तुम्हारे मरने के बाद ही... एक बार मर कर आओ तो फिर देखना हमारा कमाल! पुश्तों से पूरी ईमानदारी से ये काम कर रहे हैं। पर क्या मजाल जो किसी ने भी एक भी शिकायत की हो कि हमने उसे स्वर्ग भेजा और नरक में जा पहुँचा। पूरे देश में एक भी केस ऐसा निकाल कर बात दो तो अपनी मूँछें कटवा कर रख दूँ। ये लो उस्तरा और ये लो मेरा कार्ड! ज़रूरत पड़े आ जाना। हम मोक्ष के लिए आतुर जीवों की दिन-रात सेवा में हाज़िर रहते हैं।" बंदे ने अपनी जेब से विज़िटिंग कार्ड निकाला और उस्तरा मुझे देने की बजाय अपनी जेब के हवाले कर मुझे खैनी से सड़े दाँत दिखाते खिसियानी हँसी हँसते कहा तो मैं तो उसका मुरीद हो गया।

हर घाट पर घूमते-घूमते स्वर्ग को भेजी जा रही आत्माओं को ठूँस ठूँस कर रिक्षा में बैठाते-बैठाते देखने के बाद कुशाघाट पर जा पहुँचा। अब तक मेरे मन में पाप-पुण्य सावन के झूलों की तरह हिलोरे मारने लग गए थे। मुझे लग रहा था कभी पेट भर रोटी न खाने वाला भी पाप तले दब सा रहा है। मैंने वहीं घाट पर अपने कपड़े उतारे और अवांछित पापों से मुक्ति के लिए गंगा में डुबकी लगाने को हुआ कि कहीं से आवाज़ आई। लगा जैसे कोई मेरा नाम लेकर मुझे पुकार रहा हो। इधर-उधर देखा तो कोई नहीं। फिर नाक पकड़ हिम्मत कर डुबकी लगाने को हुआ कि लगा जैसे कोई मेरा नाम ले रहा हो। मैंने डुबकी लगाने को पकड़ा नाक छोड़ा और कहा, "कौन?"

"मैं गंगा!"

"गंगा में गंगा?" मैं चौंका।

"हाँ गंगा," पहले तो विश्वास ही न हुआ क्योंकि धर्म के नाम पर, भगवान के नाम पर विश्वास करने लायक़ अब कुछ बचा ही नहीं है। पर जब गंगा ने दृढ़ता से कहा तो सामने साक्षात् गंगा को पा लगा मैं स्शरीर मोक्ष पा गया।

"पर तुम यहाँ पंडों-पापियों के मेले में क्या कर रहे हो?"

"सोचा, बहती गंगा में मैं भी नहा ही लूँ।"

"तुम्हें तो नहा कर मुक्ति मिल जाएगी पर मेरा क्या होगा? कभी इस बारे में भी सोचा? अब मैं कहाँ नहाने जाऊँ? है कहीं कोई ऐसी नदी?" गंगा ने उदास हो पूछा तो मुझे काटो तो खून नहीं। कुछ देर तक एकटक मुझे देखने के बाद गंगा ने कहा, "नहीं सोचा तो अब सोचो।"

"सरकारी स्तर पर तो हे गंगा हम सोच-सोच कर हार गए। अब किसी को स्वच्छ नहीं होना हो तो हम भी क्या करें?" मैंने अपनी ज़िम्मेदारी से बचने की कोशिश की तो वह बोली, "अपने स्तर भी कुछ सोचो तो बात बने। अपनी मुक्ति की बात तो युगों से करते रहे हो। मेरी मुक्ति की बात करो तो मेरा भी कल्याण हो," कह अंतरध्यान हुईं तो कि पीछे मुड़कर देखा तो एक पंडा मेरे कपड़े चुरा बदहवास दौड़े जा रहा था।


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