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ISSN 2292-9754

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09.19.2017


 चार्ज हैंडिड ओवर, टेकन ओवर

आज उनकी सेवानिवृत्ति की घड़ी थी या उनकी अंतिम घड़ी जैसा वे फील कर रहे थे वे ही जानें। उनके चहेते अपने-अपने वे लटके चेहरे लिए, जो कल तक पतझड़ में भी सुर्ख़ गलाब थे, गले को जकड़ने वाली टाई लगाए इस घड़ी को अपने जीवन की सबसे मनहूस घड़ी क़रार दे रहे थे तो दूसरे दल के अपने सावन में भी पतझड़ी चेहरों को लगाने वालों के चेहरे ऐसे दमक रहे थे कि... वे उनकी सेवानिवृत्ति के मौक़े पर फूले नहीं समा रहे थे, औड़े नहीं अड़ रहे थे। देश सन सैंतालीस में आज़ाद हो गया हो तो हो गया हो, पर वे सही मायने में अपने को आज आज़ाद महसूस कर रहे थे।

वैसे उनकी सेवानिवृत्ति को लेकर बड़ी-बड़ी अटकलें थीं कि उनको एक्सटेंशन मिल सकती है। वे पक्का आगे भी कांटीन्यू करेंगे। सीएम की बगल के जो हैं। वे जब चाहेंगे, तब रिटायर होंगे। और भी राम न जाने क्या- क्या! कि वे सरकार के बिल्कुल क़रीब के बंदे हैं। जब भी उनकी एक्सटेंशन को लेकर चर्चा होती और बहस का अंत साहब की फ़ेवर में होता तो कइयों को टेंशन हो जाती तो कई कुर्सी पर आराम से पसर जाते। उनके शुभचिंतक चाहते थे कि वे हमेशा ऑफ़िस में बने रहें, न होने के बाद भी तने रहें। पर जिनकी उनके साथ माश की तो छोड़िए, मलका तक जैसी दाल नहीं गली, वे चाहते थे कि अब वे सेवानिवृत्त हो जाएँ तो उनके लिए आने वाले साहब में संभावनाओं के नए द्वार खुलें। उम्मीद पर ही सरकारी नौकरी चलती है।

.......पर आख़िर उनकी सेवानिवृत्ति हो ही गई। उस दिन कइयों की चलती साँसें रुक गईं तो कइयों को लगा कि अब उनके चैन से साँस लेने के दिन आए। इसलिए वे आज अपनी नाक चकाचक करके आए थे। कइयों की चाल में उनकी सेवानिवृत्ति वाले दिन अजीब सी लचक थी तो चेहरे पर अजब सी चमक । पर दूसरी ओर कुछ ऐसे भी थे कि जो मर-मर कर कमर पकड़े चल रहे थे। मानों उन्हें लकवा मार गया हो। चेहरे नींबू से निचुड़े हुए। कुल मिलाकर उनकी सेवानिवृत्ति पर दृश्य त्रासदी और कामदी का मणिकांचन के संयोग सा था।

जो उनकी कुर्सी के चौपाए थे उन्होंने बिलखते हुए उनके सुखद भविष्य के लिए सूखा-रुँधा गला होने के बाद भी पुरजोर शुभकामनाओं पर शुभकामनाएँ दीं। वे ख़ुद सिसकते-बिलखते उनके भावी जीवन को आनंदपूर्ण बनाने की प्रभु से याचना-प्रार्थना करते रहे। और जो उनकी कुर्सी के नजदीक नहीं फटक पाए थे या दूसरों ने उन्हें फटकने का मौका ही नहीं दिया था, वे भरे पूरे मन से उन्हें उनकी सेवानिवृत्ति पर उनका उतरा हुआ चेहरा देख गोलगप्पों से भी अधिक चटखारे ले रहे थे।

उनकी फ़ेअरवेल पार्टी में उन्हें असली-फ़सली फूलों की मालाएँ पहनाने के बाद तारीफ़ों के जितने पुल चाटुकार बाँध सकते थे, बाँध कर जब निढाल हो गए तो सेवानिवृत्त होने वाले को बीसियों विरोधों के बाद ख़रीदा स्मृति चिह्न भेंट किया गया ताकि जब भी वे इस स्मृति चिह्न को देखें ,उन्हें ऑफ़िस में मस्ती से काटे-चाटे दिनों का मधुर स्मरण हो आए।

लंबे समय तक एक दूसरे को कहा-सुनी माफ़ करने का दौर ख़त्म हुआ तो किसी ने उनके आने वाले समय में सुखी और स्वस्थ रहते हुए विदाई दी, तो किसी ने भाव भीनी श्रद्धांजलि तो किसी ने तिलांजलि।

तभी स्टाफ़ सेक्रेटरी का आदेश पा हाल में लगे लंच की ओर कूच किया गया। ये बात दूसरी थी कि कई तो मूँग के हलवे के स्टाल पर काफ़ी पहले से ही मँडराने लगे थे। उस ग़मगीन माहौल में कुछ आँखें हद से अधिक नम थीं मानों उन्होंने दूसरे गुट की आँखों की नमी भी चुरा कर अपनी आँखों में सजा लीं हो, तो कुछ आँखों में उनके ऑफ़िस से जाने के मौक़े पर कतई भी आँसू नहीं। आँखों के तारा आँखों और आँखों के नागवार आँखों में क्या अंतर होता है, यह उस वक़्त नैनसुख भी साफ़ देख सकता था। कुछ को भूख नहीं तो कुछ ऐसे कि जो भी मिले उस ख़त्म कर दें। ऑफ़िस में कई सालों के भूखे जो थे।

लंच के बाद नए साहब को चार्ज लेने-देने का काम शुरू हुआ तो सारी फ़ाइलों को जाते साहब से फ़ॉर्मैलिटी के लिए समझ लगे ताकि उन्हें ऐसा न लगे कि अब उनका काम ख़त्म। करना तो नए साहब ने सब बाद में अपनी मर्जी से ही था। कुछ देर फ़ाइलों पर ख़ानापूर्ति की चर्चा करने के बाद नए साहब ने सेवानिवृत हुए साहब से कहा, "थैंक्स सर! लग तो बुरा रहा है कि मैं आपको सेवामुक्त कर रहा हुँ पर...... पर रूल इज़ रूल! फूल इज़ फूल! काजल की कोठरी में रहते चेहरे पर कालिख का एक निशान भी लिए बिना रिटायर होना आज सबसे बड़ी उपलब्धि है। यह सौभाग्य तो देवताओं को भी नसीब नहीं होता। अब आपसे एक विनती है कि....."

"नहीं! नहीं वर्मा जी! आप इस ऑफ़िस के बारे में जो कुछ भी जानना चाहें, मैं हर वक़्त आपकी हैल्प के लिए तैयार हूँ। इस ऑफ़िस ने मुझे बहुत कुछ दिया है। ऐसे में मेरा रिटायर होने के बाद भी दायित्व बनता है कि......," शर्मा जी ने मन में दबे दुख को और दबाने की कुचेष्टा करते मुस्कुराते हुए कहा।

"तो आप जाते-जाते ये भी बता देते कि......," कह नए साहब उनकी आँखों में झाँकने लगे।

शर्मा जी कुछ देर तक तो बंद दरवाज़े की ओर देखते रहे और जब उन्हें लगा कि दरवाज़े से कोई कान नहीं लगा है तो चैन की साँस लेते बोले, "अरे हाँ! वर्मा जी! असली चार्ज देना तो मैं आपको भूल ही गया था। ऑफ़िस में फ़ाइलें उतनी काम की नहीं होतीं जितने काम के धर्म के बंदे होते हैं," उन्होंने एक बार पुनः बंद दरवाज़े की ओर देखा और जब आश्वस्त हो गए कि वहाँ कोई नहीं तो उन्होंने कहा, "आप बेझिझके टीके को अपना ही समझिए। अपना धर्म का बेटा ही समझिए। बड़े काम की चीज़ है हरामी ये। पूँछ ही नहीं हिलाता, पूरा का पूरा हिलता है साहब के आगे पीछे।"

"पर क्या वह मेरे आगे भी......?" उनके मन में निर्मूल सी शंका जाग्रत हुई।

"नहीं, ऐसी बात नहीं। वह हर साहब के लिए समर्पित होने वाला जीव है। साहब की चाटुकारी का गुण उसमें नैसर्गिक है। भले ही उसे अपने बारे में कोई जानकारी हो या न, पर वह आप तक सारे ऑफ़िस की और ऑफ़िस वालों की एक-एक ख़बर चौबीसों घंटे बिन रुके आप तक पहुँचाता रहेगा। और साहब को चाहिए भी क्या? साहब के चरणों में रहने को ही वह अपना जीवन मानता है। जिस चापलूसी को वह भ्रष्टाचार की चरम सीमा मानता है। भ्रष्टाचार की चरम सीमा जहाँ आकर ख़त्म होती है, उसकी चापलूसी वहाँ से शुरू होती है। बस, उसे आपको..... असल में क्या है न कि मेरे पेट में रहते-रहते उसकी आदतें बिगड़ी हुई हैं। उसकी क्या! ऐसा कोई भी हो। उसकी आदतें ख़ुद-ब-ख़ुद बिगड़ जाती हैं। पर आप आँखें मूँद कर इसपर विश्वास कर सकते हैं। यह मैं दावे से कह रहा हूँ। इसका पेट इतना गहरा है कि वह आपके हर राज़ को उसमें छुपाकर रख सकता है। क्या मजाल जो कभी ...... मेरा पिछले पाँच सालों का तुजुर्बा है। मैं आपको इस ऑफ़िस का एक नगीना सौंपे जा रहा हूँ। आप भी क्या याद करेंगे!"

"इतना फ़ेथफ़ुल है ये जीव?? ऐसा तो मैंने अपनी तीस साल की नौकरी में देखना तो दूर सुना तक नहीं जैसा आप बता रहे हैं शर्मा जी। और कोई.......," वर्मा जी ने ऐसे कहा जैसे संसार के आठवें अजूबे के बारे में सुन रहे हों।

"हाथ कंगन को आरसी क्या? पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या? कल से आप ख़ुद ही देख लेंगे। आप भी क्या याद करेंगे कि...... पर औरों के बारे में मैं इतने विश्वास से कुछ नहीं कह सकता। और हाँ। एक बात तो मैं आपको बताना ही भूल गया था। पीके से ज़रा बचकर रहना। वह कुछ भी कर सकता है। बड़ा चुस्त है वह। बातें ऐसी लच्छेदार कि........ सीएम-पीएम से नीचे वह बात नहीं करता। चाय तक एसपी, डीसी, चीफ़ इंजीनियर के साथ ही पीता है। उसके पास अपनी पत्नी का नंबर भले ही न हो, पर काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के हर अफ़सर का हर नंबर उपलब्ध मिलेगा, अफ़सर की बीवी के पास वह नंबर हो या न। पहली बार तो किसीको भी लगे कि उससे बढ़कर उसका सगा कोई और नहीं। पर धीरे-धीरे आप सब उसके बारे में जान जाओगे। इसलिए मुझे कुछ अधिक कहने की ज़रूरत नहीं। असल में उसका पेट बहुत उथला है। उसे कुछ पचता ही नहीं। उस बेचारे को हमेशा अपने क़द से ऊँचा दिखने की बहुत लालसा रहती है। इसके लिए वह कुछ भी कर सकता है। उसे बड़ा दिखने का बड़ा शौक़ है। इसलिए हो सकता है वह आपकी जगह अपने साइन भी कर दे। हो सकता है वह बाहर अपने को ही ऑफ़िस का मुखिया बताए। सो, बीवेअर अबाऊट पीके। वैसे है, तो वह डीके भी विश्वास करने लायक़, पर कभी-कभी वह अपना दिमाग़ इस्तेमाल कर लेता है। ऐसे में ऑफ़िस की पुख़्ता जानकारी देने के बाद भी उस पर विश्वास करने के लिए सोचना पड़ता है। पर टीके में ऐसा कुछ नहीं। वह मेरा जाँचा-परखा है। वह अपने लिए समर्पित हो या न, कुर्सी के लिए पूरी तरह से समर्पित होने वाला है।"

"मतलब आप कहना चाह रहे हैं कि वह टेस्टिड बंदा है?" वर्मा जी ने चाय का घूँट लेते पूछा।

"जी वर्मा जी! वह एक समर्पित टेस्टिड चाटुकार क़िस्म का है। सच पूछो तो मैं तो उस पर आँखें मूँद कर विश्वास करता था। ऑफ़िस की कुछ बातें तो मुझे और केवल उसे ही पता होती थीं। वैसे अगर आप उसे अपने से अलग भी रखेंगे तो भी वह अपने को आपके दिल में रखने के लिए चौथे ही दिन मजबूर कर देगा। उसके पास आर्ट ही ऐसा है कि.......," चाय का घूँट ले चाय का कप टेबल पर रखते हुए शर्मा जी ने कहा।

"ऐसा क्या है उसमें?"

" उसमें अपने को हर शीशे में उतारने का हुनर आता है। उसके लिए मूरत खंडित हो या महिमा मंडित, वह उससे अपनी मनोकामना मनवा कर ही दम लेता है......" कि तभी पीउन ने दरवाज़ा खोला तो नए साहब ने घूरते हुए पूछा,"क्या बात है? आने से पहले दरवाज़ा नॉक नहीं कर सकते थे?"

"गलती हो गई साहब! पर बाहर साहब जी को छोड़ने के लिए गाड़ी तैयार है," कह मन ही मन नए साहब को गालियाँ देते पीउन ने ग़ुस्से से दरवाज़ा बंद किया तो शर्मा जी ने वर्मा जी को समझाते कहा,"और हाँ, इस पीउन पर कभी भी ग़ुस्से मत होना। ये भी बड़े काम का है। ऑफ़िस की हर ख़बर पर इसकी भी पैनी नज़र रहती है। प्यार से सँभाल कर रखना। बड़े काम आएगा...।"

"मैनी-मैनी थैंक्स शर्मा जी! आपका अहसान मैं ज़िंदगी भर नहीं भूलूँगा। असली चार्ज तो अब हैंडिड ओवर, टेकन ओवर हुआ। जब भी मन करे बेहिचके आराम करने आ जाया करना यहाँ। आपके लिए इस ऑफ़िस के दरवाज़े हमेशा खुले थे, खुले हैं और हमेशा खुले रहेंगे," उन्होंने उनका हाथ अपने हाथों में बड़े प्यार से दबाया ही था कि तभी गए साहब को उनके घर छोड़ने के लिए स्टाफ़ द्वारा मँगावाए ढोलिए ने ज़ोर-ज़ोर से ऑफ़िस के बाहर ढोल बजाया तो जाते साहब ने अपने गले में पड़ी मालाएँ ठीक करते अपना सिर पीटना शुरू कर दिया।


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