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ISSN 2292-9754

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03.15.2016


बैकुंठ में जन्म लेती कुंठाएँ

 बैकुंठ के राजा बैकुंठाधिपति अपने कैबिनेट रैंक के मंत्री कुबेर और लक्ष्मी के साथ आगामी वित्त वर्ष के लिए पेश किए जाने वाले बजट के कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा कर रहे थे। मसलन, बैकुंठ की भोगवादी संस्कृति के विकास हेतु बैकुंठ के एरीस्टोक्रेटों को करों में अबके फिर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कैसे छूट दी जाए जिससे बाज़ार भी बचा रहे और सरकार भी। वहाँ के मध्यमवर्गीय नौकरी पेशा कर्मचारियों को अबके कर में छूट का कितना प्रावधान किया जाए? किया जाए कि नहीं? या उसके हाथ पहले की तरह इस बार भी आश्वासन का झुनझुना थमा दिया जाए, ताकि वे उठ ही न सके। बेचारी एक यही तो क्लास है जो न चाहते हुए भी ईमानदारी से टैक्स दे रही है मर- मर के साँसें ले रही है, कि तभी उनके पीए ने आकर उन्हें हड़बड़ाते हुए सूचना दी, "हे बैकुंठाधिपति! क्षमा करें! आपकी महत्वपूर्ण बैठक में अवरोध उत्पन्न कर रहा हूँ, पर बैकुंठ में ज़ोर-ज़ोर से पहली बार नारे लग रहे हैं। बैकुंठ की शांति संकट में है। ख़ुफ़िया विभाग से अभी-अभी सूचना मिली है कि हड़तालियों ने पेड़ काट कर सड़कों को अवरुद्ध कर दिया है। जगह-जगह पर आगजनी की घटनाएँ हो रही हैं। रेलों की पटरियों को बाधित कर दिया गया है। राजधानी को जाने वाले रास्ते रोके जा रहे हैं। कहने को ही स्थिति नियंत्रण में है। बैकुंठ की जनता को भारी मुश्किलों से गुज़रना पड़ रहा है। यही नहीं, राजधानी को होने वाली जल आपूर्ति तक को रोक दिया गया है। राजधानी का जीवन संकट में है प्रभु! लगता है जीव प्यासे न मर जाएँ।"

"बैकुंठलोक में नारे?? बैकुंठ में चक्का जाम? बैकुंठ में भी जीव कुंठित!! सरकारी वाहनों को नुकसान? ख़ैर, जनता तो होती ही मुश्किलों को झेलने के लिए है। वह चाहे मृत्युलोक की हो या बैकुंठ की। पर ये सब किसलिए? किसका हाथ हो सकता है इसमें? विपक्ष की चाल तो नहीं है ये? वे हमें सत्ता से हटाना तो नहीं चाहते? बैकुंठ में सत्ता का दूसरा लालची कौन आ गया?"

"प्रभु! बैकुंठ में हड़ताल हो गई है! किसके कहने पर हुई, किसने करवायी, कोई पता नहीं चल रहा। सब गोलमोल लग रहा है।"

"ये हड़ताल क्या बीमारी है पीए? यह शब्द तो हम पहली बार सुन रहे हैं। सरस्वती से कहो कि हमें इसी वक़्त इस शब्द का अर्थ विस्तार से बताएँ। बैकुंठ में तो किसी भी बीमारी को कोई जगह नहीं, तो ये बीमारी कहाँ से प्रवेश कर गई?"

"प्रभु लगता है यह बीमारी, मृत्युलोक से जो चालू आत्माएँ किसी न किसी तरह जुगाड़ कर बैकुंठ में घुस आई हैं, उनकी देन है। इस लाइलाज बीमारी के बारे में जितनी मेरी नॉलेज है उसके आधार पर मैं इतना ही कह सकता हूँ कि प्रभु, इस बीमारी के बारे में जो कुछ न पूछो, तो ही भला प्रभु। यह बीमारी बड़ी से बड़ी सरकारों का दिन का चैन, रातों की नींद हराम कर रख देती है। शरीफ़ लोग तो इस बीमारी का नाम तक सुनने से काँप उठते हैं। ये किसी भी समाज, सरकार के लिए कैंसर से भी अधिक ख़तरनाक बीमारी है। यह किसी भी सरकार, समाज के लिए ऐसी बीमारी है कि जिस समाज, सरकार को एक बार यह लग जाए तो उसे बरबाद करके ही दम ले। हर बीमारी का इलाज संभव है पर इस बीमारी का नहीं।" यह सुन बैकुंठाधिपति का सिहांसन तो काँपने लगा साथ ही साथ वे काँपने लगे। गर्मी आने से पहले ही उन्हें पसीने छूटने लगे तो उनके पीए ने अपने रूमाल से उनका पीसना पोंछा। उन्होंने पास रखे कोक का घूँट लेने के बाद कहा, "तो फ़ौरन एडवाइज़री कमेटी की बैठक का इंतज़ाम करो, अभी के अभी। पर क्या सच्ची को इस बीमारी का इलाज संभव नहीं।" बैकुंठाधिपति ने अपने पीए से पूछा तो वे गंभीर हो बोले, "नहीं सरकार! भारत खंड में हर बीमारी का इलाज ढूँढा जा सकता है पर साइंटिस्टों का कहना है कि इस बीमारी का इलाज ढूँढना असंभव ही नहीं नामुमकिन है। इसलिए बेकार में धन और श्रम बरबाद क्यों करना।"

"तो??? ये हड़ताली आख़िर हैं कौन?"

नीचे से आए तथाकथित समाज सेवक हैं सर। जनता तो बेचारी यहाँ आने से रही।"

"तो ये चाहते क्या हैं?"

"कह रहे हैं हमें यहाँ भी परसेंटेज चाहिए।"

"परसेंटेज बोले तो??"

"हिस्सेदारी।"

"किसके हित के लिए? जनहित के लिए?"

"उन बेचारों का तो बस नाम है।"

"पर यहाँ हम सबको समान रूप से, जात-पात, धर्म से ऊपर उठ बिन नस्लीय भेदभाव, बिन कहे सब दे तो रहे हैं। क्या यहाँ कोई प्रताड़ित है? नहीं न? इस कैटेगरी के वहाँ तो मौज करते ही हैं पर यहाँ भी मौज करते हैं। क्या यही इनका समाजवाद है? जीते जी भी मौज और उसके बाद भी मौज। जहाँ देखो, बीसों उँगलियाँ घी में। और बेचारी जनता! जिसके भाग्य में ज़िंदा जी भी नरक और मरने के बाद भी नरक। अच्छा तो ऐसा करो, हालात सामान्य करने के लिए फ़िलहाल इन्हें सत्ता में हिस्सेदारी का आश्वासन दे दो और आगे से बैकुंठ आने के ख़ासतौर पर इनके नियम अमेरिका से भी कड़े कर दो ताकि एक भी इन जैसा यहाँ प्रवेश न कर सके। हम बैकुंठ को इंडिया नहीं बनाना चाहते।"

"पर प्रभु! एक बार यह शब्द जो यहाँ की आबो-हवा में तैर गया तो फिर... कल दूसरे भी यह माँग कर सकते हैं। परसों तीसरे... पर यह सुविधा दें किसे? प्रभु! जिस जीव को एक बार सरकारी सुविधा की लत पड़ गई वह इसे मरने के बाद भी छोड़ने को तैयार नहीं होता। तब सुविधा को वह अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान डराने-धमकाने लग जाता है। और फिर शुरू हो जाता है हड़ताल, धरनों का कभी न ख़त्म होने वाला दौर। कल को इसे लेकर ही यहाँ भी राजनीति होने लगी तो? वहाँ की तरह ज़रूरतमंदों के बदले ऊँचे तबक़े वाले, रसूख़ वाले ही इसका लाभ लेने लग गए तो?"


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