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ISSN 2292-9754

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05.05.2018


डेज़ी की कमर्शियल आत्मकथा

   कई दिनों से रात को मुझे उनकी ओर की परेशानियों के चलते एक तो पहले ही नींद नहीं आ रही थी और अब ऊपर से जब विदेसी अपरिचित नस्ल से कुत्ते की स्त्रीलिंग या पुल्लिंग आत्मा आकर मेरी बचीखुची नींद ख़राब कर बेले-कबेले जगा बस एक ही रट लगाती - मेरी आत्मकथा लिख हे दो टके के लेखक और लेखन से जन्म-जन्म को मुक्ति पा।

कई रातों तक इधर मैं उस आत्मा के आग्रह अथवा दुराग्रह को मैं इग्नोर करता रहा तो उधर वह मुझ परेशान को और भी परेशान करती रही। बीच-बीच में उसकी बात न मानने पर प्यार से काटने की भी धमकी दे देती, आज के दोस्तों की तरह। पहली बार तब पता चला था कि कुछ स्वाभाविक चीज़ें जीव के जीते-जी तो उसमें बनी ही रहती हैं पर जीव के मरने के बाद भी उसमें ज्यों की त्यों बनी रहती हैं।

मैं पसोपेश में, लिखूँ और वह भी एक कुत्तेजात की आत्मकथा? देश में दूसरी चीज़ें लिखने को ख़त्म हो गईं क्या? क्या दिन आ गए साहब आज आदमियों तो आदमियों, कुत्तों के आगे भी हम जैसों को हाथ जोड़ने पड़ रहे हैं?

आख़िर जब मैं उस आत्मा से बुरी तंग आ गया तो एक आधी रात सपने में मैंने उसके आगे-पीछे दोनों हाथ जोड़े कहा, "हे सर्वव्यापी जाति से अज्ञात मरे कुत्ते की आदरणीय आत्मा! आत्मकथा लिखने का इच्छुक जीव अपनी आत्मकथा ख़ुद अपने हाथों से अपनी हज़ारों बातें छिपा कर लिखता रहा है। हाँ! तेरी कोई डायरी-डुयरी कहीं हो तो उसके आधार पर तेरी कुछ जीवनी-जुवनी लिखनी हो तो मैं उसे लिखने का साहस ज़रूर कर सकता हुँ। कारण, मैं आदमी की खाल ओढ़े कुत्तों के बीच बहुत रहा हूँ जो कहीं भी टुकड़ा दिखते ही सारे आदर्श, मान सम्मान छोड़ यों भागते हैं कि मत ही पूछो तो ही भला, न पूछने पर मेरी भी नाक बची रहे और जिनके पास नाक है ही नहीं, उनकी भी।" पर उस कुत्ते की आत्मा वैसे ही अपनी आत्मकथा लिखवाने पर ही अड़ी रही ज्यों कोई नेता अपनी आत्मकथा लिखवाने को किसी ग़रीब लेखक के सामने तना रहता है। अंततः उसने मेरे जुड़े हाथ पकड़ निवेदन किया, "हे हिंदी साहित्य के अनाम लिखारी! क्या तुम नहीं चाहते कि लीक से हटकर कुछ अभिनव लिख हिट हो जाओ? हमेशा संपादकों द्वारा दुत्कारे जाने वाले के पीछे जो संपादक पूँछ हिलाते घूमें तो?? मैं अपनी आत्मकथा तुमसे लिखवा नामी प्रकाशन से छपवा तुम्हें बीस प्रतिशत रायल्टी न दिलवाऊँ तो.... मुझ पर विश्वास नहीं तो हलफनामा बना लेते हैं।"

"अब तुम जैसों पर ही तो विश्वास बचा है हे कुत्ते की आत्मा! शेष तो सबके विश्वास डगमगा चुके हैं।" और मैं रायल्टी के चक्कर में फँस उसकी आत्मकथा लिखने को तैयार हो गया। असल में लेखक अपने लेखन के कारण उतनी जल्दी नहीं मरता, जितनी जल्दी वह रायल्टी के मोह में पड़ कर मरता है।

तब सपने में ही हम दोनों के बीच एक गुपचुप समझौता हुआ और मेरे भीतर उसकी आत्मा ने मुस्कुराते हुए जब प्रवेश किया तो जाकर पता चला कि यार, ये आत्मा तो कुतिया की है। मेरे पूछने पर उसने अपना नाम डेज़ी बताया और यह भी बताया कि कभी उसके पुरखे जर्मन से आए थे। पर अब वह मिक्स डीएनए की है। कब आए थे, उसे पता नहीं। अब वह भारतीय संस्कृति की यों गई है कि.... वैसे तो अब भारतीय संस्कृति के मेरूदंड भी नहीं।

अब जब एग्रीमेंट कर लिया तो क्या कुत्ता, क्या सूअर! अपने अज़ीज़ों की तरह अपना चरित्र आज जहाँ टुकड़ा दिखा, वहीं लार टपकाना है। आदर्शवादी हो मैं मैं करते शरीफ़ों को डराना है।

मित्रो! वैसे मैं ख़ुद की भी कई दिनों आत्मकथा लिखने की सोच रहा था। पर यह सोच कर चुप रहा कि जब मेरे पास मेरी आत्मा ही नहीं तो उसकी कथा क्या लिखूँ?

पिछले हफ़्ते मैंने दुस्साहस कर अपनी उर्फ़ डेज़ी की आत्मकथा लिखने को ढीली कमर कसी एक उम्मीद लिए कि व्यंग्य लिखने से तो बंदा अमर होता नहीं लगता, तो क्यों न कुत्ती पुण्यात्मा को अपने में प्रवेश करा इसकी आत्मकथा लिख कर ही कुछ अमरता हासिल कर ली जाए।

असल में अब अपनी बोलें तो डेज़ी की आत्मकथा को लेकर कुछ लिखना शुरू करने से पहले तक मैं जो भी अपनी नज़रों तक में लिखता रहा हूँ, बकवास ही लिखता रहा हूँ। सो अबके ये भी सोचा कि क्यों न इस बार कुछ नया तथ्यों पर आधारित लिखा जाए? कल्पना और यथार्थ का कॉकटेल। अतः डेज़ी की आत्मकथा लिखने से पहले मैंने जर्मन जाति के कुत्तों की जातियों, प्रजातियों पर शोध करने वाले प्रबुद्ध इतिहासकारों से बात करने की सोची। और इसे उसकी क़िस्मत कहिए या मेरी, मुझे उसी तरह के अव्वल दर्जे के कुत्तों के इतिहास पर काम करने वाले इतिहासकार मिल गए जिस तरह से रिश्वत पर रिसर्च करने वाले आसानी से मिल जाते हैं।

पर दुखद, कोई भी डेज़ी के पुरखों के बारे में दम के साथ न कह सका कि डेज़ी के पुरखे देश में पहले पहल कब आए थे? कह सके तो बस इतना ही कि जब अँग्रेज़ों का आगमन शिमला में हुआ था, तो सरकारी काग़ज़ों में यह लिखा मिलता है कि डेज़ी के पुरखों जैसे वहाँ उनके साथ यहाँ देखे गए थे। तब देशी कुत्तों ने उनके साथ दो-दो हाथ करने की रिज पर सोची भी थी। पर अँग्रेज़ों द्वारा अपने कुत्तों की भारतीयों से कड़ी सुरक्षा के चलते यह संभव न हो सका था। उसके बाद धीरे-धीरे जैसे-जैसे अँग्रेज़ शिमला से आगे फैलते गए, वैसे-वैसे उनके साथ डेज़ी के पुरखे भी।

शिमला से दूर एक गाँव है बराड़ी। मैं पैदा तो शिमला में हुई पर उसी गाँव के एक मझोले घर में मेरा बचपन और जवानी मजे से बीते।

बराड़ी में रामदेई अपने आठ फेल बेटे, काकू के साथ रहती थी। जैसे उसके डंगर वैसा उसका बेटा। मतलब, वह बड़ा आवारा टाइप का लड़का था। सब उसे काकू के बदले गया मुआ ही कहते थे। हट्टा-कट्टा होने के बाद भी खेतों में जाने को उसका कतई मन न करता। सारा दिन गाँव में बस धींगामुश्ती।

रामदेई की दो बीघा ज़मीन सड़क किनारे थी। पंचायत प्रधान की आँख प्रधान होने से पहले ही उस ज़मीन पर गड़ी थी। जब वह मिल-मिलाकर, खिला-पिला कर प्रधान हुआ तो रामदेई ने उस ज़मीन में से चार बिस्वा ज़मीन इस वादे के साथ प्रधान को दी कि वह एमएलए से बात कर उसके लड़के को सरकारी नौकरी में लगवा दे। वादा ख़िलाफ़ी उस वक़्त कम ही होती थी। सो इधर रामदेई का आवारा काकू सचिवालय में चपरासी के पद पर लगा तो उधर रामदेई ने प्रधान के नाम चार बिस्वा जगह की।

सचिवालय में चपरासी के पद पर लगने के साल बाद ही वह अपने को किसी विभाग के सचिव से कम न समझता। पूरे गाँव में उसका दख़ल देखने लायक़ था। अब वह गए मुए से काकूजी हो गया था। जब वह शिमला से गाँव आता तो गाँव के आसपास के उससे अपने बच्चों को शिमला में नौकरी लगवाने की बात करते तो उस वक़्त वह चपरासी न होकर किसी विभाग का डायरेक्टर तक हो जाता।

काकू को सचिवालय में लगे छह महीने हो गए तो उसे ब्याह के लिए रिश्ते पर रिश्ते आने लगे।

और फिर लेने-देने की बात के बीच उसका विवाह पास के ही जाने-माने ठाकुर की बेटी राधा से हो गया। ठाकुर अपनी बेटी को उस घर में दे निहाल हुआ।

घर में बहू ने आ दस दिन बाद ही विवाह से पहले घर के सारे काम करने का वादा तोड़ते गाय ही क्या, घर का छोटा-मोटा काम करने तक से सास को साफ़ मना कर दिया तो बूढ़ी सास के गले में अँगूठा सा कुछ दबा। बहू ने साफ़ किया कि आठ पास है। है कोई बहू पूरे गाँव में आठ पास? उसने गाय का गोबर उठाने को थोड़े ही आठ की थी। दर्जा तीसरा हुआ तो क्या हुआ! गाँधीजी भी तो तीसरे दर्जे में सवार होते थे। उसने सास से ये भी कहा कि उसका पति सरकारी नौकर है, और वह भी सचिवालय में। सचिवालय के नौकर की बीवी घर में गोबर उठाए तो लोग उसके पति के बारे में क्या कहेंगे? वह अपने पति की इज़्ज़त को बट्टा नहीं लगने देगी। इसके लिए उसे कोई जो चाहे सो कहे।

..... और एक दिन राधा की सास ने बहू से तंग आकर चार किलो सुबह, चार किलो शाम को दूध देने वाली गाय रात को अँधेरे में गाँव के चार लड़कों से गाँव से चार मील दूर गाय के पाँव पर मथा टेक माफ़ी माँगने के बाद छुड़वा दी।

अब घर में खाने और हगने के सिवाय तीसरा कोई काम न बचा था। बहू सारा दिन टाँगें पसार कर धूप में बैठी रहती तो सास खों-खों करती, धूप में फटे बोरे पर गठरी बनी बेतरतीब पड़ी रहती।

आगे विधि का विधान देखिये साहब! भली-चंगी नौकरी वाले काकू ने शिमला में जब अपने पड़ोस में कुत्तों का बिजनेस करने वाले को देखा तो उसका मन भी कुत्तों का बिजनेस करने को मचलने लगा। उसे लगा कि अब घर में पशुओं का तो कोई काम है नहीं, तो क्यों न घर घरवाली को बिज़ी रखने के लिए मुझ विदेसी ले जाए। उसका मन भी लगा रहेगा और चार पैसों की इनकम भी हो जाएगी।

....और उसने शहर वालों की तरह मेरे द्वारा फलने-फूलने वाला बिजनेस करने का ्फ़ाइनल डिसीज़न लिया। जब-जब मालिक के घर मैं सूया करूँगी तो वह शहर आकर मेरे बच्चे बेच दिया करेगा। जैसे ही मालिक बिज़नेस की और गहराई में गया तो उसे कुत्तों के बच्चों के बिज़नेस में आदमियों के बच्चों से अधिक कमाई के स्कोप दिखा। उसने आव देखा न ताव और शहर के संभ्रांत से मुझ विदेशी बच्ची को घंटा भर मोल-भाव के बाद पाँच बीस में ख़रीद लिया। नए मालिक ने मुझे गोद लेते ही मेरे पेट को परखा, उसे लगा मेरे पेट में कम से कम आठ तो आएँगे ही। एक एक पिल्ले की क़ीमत आदमी के बच्चे से अधिक। भगवान ने सब ठीक किया तो हर साल आठ-दस सौ, वह भी ईमानदारी के।

शनिवार को जब मालिक घर आया तो अबके अपने साथ बैग के बदले मुझे अपनी बगल में शान से दबा लाया।

.....और मैं चूं चूं करती शिमला से गाँव आ गई। घर आते ही जब उसने अपनी घरवाली को मेरी क़ीमत बताई तो वह बौराई। इत्ते में तो आराम से तीन बकरियाँ आ जातीं। पर जब उसने गुणा भाग कर मुझसे होने वाले फ़ायदे के बारे में बताया तो राधा ने दाँतों तले उँगली दबा ली। राधा को तब पहली बार पता चला कि कुत्तों के बिज़नेस में गाय-भैंसें पालने से अधिक इनकम हो सकती है।

काकू मुझे दूध पिलाने के लिए शिमला से आते हुए अपने साथ दूध पिलाने की कंपनी की पाँच रुपए वाली बोतल ले आया था। ये दूसरी बात है कि घर में उसकी अपनी दो महीने की बेटी को दूध पिलाने के लिए उसकी घरवाली गाँव की दुकान से सबसे सस्ता निप्पल लेती रही है, जब-जब उसकी बेटी खाली दूध की बोतल का निप्पल काटती। सारी रात काकू की बीवी सपने में मुझे सूते देखती रही और मेरे बच्चे शान से बेचती रही, शिमला के मालरोड़ पर। राधा ने सपने में देखा कि मेरे बच्चे आठ तो उनको ख़रीदने वाले साठ। दूसरी ओर सड़क के किनारे आदमी का बच्चा रोता हुआ। तो रोता रहे। आज का दौर मेरा दौर है। जिसके घर मैं नहीं, वह घर घर नहीं।

सुबह उठते ही काकू ने पंडित जी को नरेशी के हाथ संदेसा भिजवाया कि पंडितजी को कहना उन्हें काकू ने बुलाया है। जितनी जल्दी आ सकें, उसके घर आ लें। एक शुभ काम आन पड़ा है। किसीका नामकरण करना है। नरेशी तब पंडित के घर दूध देने जा रहा था। जब आधे घंटे बाद नरेशी पंडितजी के घर पहुँचा तो उसने पंडिताइन को दूध देने के बाद रोज़ की तरह पंडिताइन से म्ज़ाक करते पूछा, "पंडितजी यजमानों को ठगने निकल गए हैं या.....”

"नहीं, जाने को तैयार हो रहे हैं। कोई काम है? अभी बुलाती हूँ उन्हें।” थोड़ी देर बाद माथे पर तिलक पोतते, उलझा जनेऊ सुलझाते पंडितजी बाहर आए। आते ही उन्होंने नरेशी से पूछा, "क्या बात है नरेशी?”

"महाराज पंडजी, काकू ने बुलाया है अभी?”

"ऐसा क्या काम है?" उन्होंने धोती ठीक करते पूछा।

"कह रहा था, किसीका नामकरण करना है।"

"किसका? छह महीने पहले ही तो उसके...."

"नहीं, घर में शहर से विदेशी नस्ल की कुतिया लाया है। शायद उसका नाम रखना होगा।"

अपने देश के कुत्ते मर गए क्या जो अब विदेशी कुत्ते पालने पड़ रहे हैं गाँव में भी? पंडितजी ने अपने आप से कहने के बाद पंडिताइन से पूछा, "घर में क्या-क्या खत्म है?"

"क्यों?"

"काकू के घर जा रहा हूँ। जो दालें खत्म हों बता दे। कुतिया की ग्रह शांति के नाम पर उन उन दालों की उससे गठड़ियाँ दान करवा दूँगा।"

पंडिताइन से दालों की लिस्ट ले पंडितजी ने अपना झोला उठाया और काकू के घर की ओर चार-चार क़दमों का एक-एक क़दम करते हो लिए।

 

आधे घंटे बाद पंडितजी काकू के घर राम-राम करते पहुँचे तो वह उनका बेसब्री से बीड़ी से बीड़ी सुलगाता इंतज़ार कर रहा था। पंडितजी के आते ही उसने पंडितजी से कहा, "पंडित जी! इसका नामकरण करना है। जंतरी तो लाए हो न?"

"लाया हूँ। जंतरी के बिना पंडित पंडित नहीं होता यजमान! जंतरी हर पंडित का हथियार होता है। उसे वह देखनी आए या न," कह पंडितजी मन ही मन हँसे और सबील पर बैठ झोले से जंतरी निकाल उसे खोलते उससे पूछा, "किसका नामकरण करना है?”

"इसका! शहर से आई है ये। पूरे सौ में," पंडितजी की आवाज़ सुन तब उसकी बीवी मुझे गोद में लिए पुचकारते हुए बाहर आई। उसकी अपनी बेटी भीतर रो रही थी बिस्तर में। लगा ज्यों उसने बिस्तर गंदा कर दिया हो। मैंने उसका रोना सुन मेरा मन भर आया। पर मैं कर तो कुछ नहीं सकती थी, सो चुप रही, अपने मालिक की बीवी की गोद में सिमटी हुई, नए वातावरण, नए बंदों को समझने की कोशिश करती। पंडितजी यह सब देख हैरान! सारा नज़ारा देख तब मैंने मन ही मन अपने से कहा, "हाय रे पंडिताई, कैसे दिन आ गए। अब इस धर्मभीरू समाज में मुझ जैसों के नमाकरण को भी पंडित?" पर वे मन मसोसते चुप रहे। उन्हें क्या! धंधे में बने रहने के लिए किसीका भी नामकरण करवा ले यजमान। धंधे में क्या कुत्ता, तो क्या गीदड़। धंधे में क्या गधे के बच्चे का यज्ञोपवीत संस्कार तो क्या आदमी के बच्चे का। जहाँ चार पैसे ज़्यादा बन जाएँ व्यवसाय में तो वही जीव और यजमान श्रेष्ठ रहा है।

"इसका नाम भी रखवाना था और इसकी कुंडली भी बनवानी है पंडितजी। देखना तो इसके ग्रह कैसे हैं? बड़ी होकर क्या बनेगी?"

"कब जन्मी है ये? कोई बार, तारीख, समय??"

"सो तो पक्का नहीं। पर जिसकी गोद से लाया हूँ, उसके हिसाब से तो आज दस दिन की हुई।"

काकू के मुँह से मेरा जन्म सुन पंडितजी ने उँगलियों पर कुछ गिनना शुरू किया, "मतलब उस दिन सोमवार था। मतलब सारा दिन लग्न कुंभ! कुंभ राशि में पैदा हुआ जातक बहुत महान होता है। कुत्ता होने के बाद भी उसमें मानवीय गुण कूट-कूट कर भरे होते हैं। टुकड़ों के लिए हर अफसर की परिक्रमा करता रहता है।"

"तो कुंभ लग्न मानकर इसकी कुंडली बना दो। अब इसका कुंभ लग्न के आधार पर नाम क्या होगा पंडितजी?"

"तो ह से या व से जो मन करे रख दो। पर हाँ, लग्न राशि का नाम अपने तक ही रखना। वरना जातक को बुरे लोगों की नज़र लगते देर नहीं लगती," पंडितजी ने एक गोपनीय बात काकू को बताई तो वह गद्गद् हुआ। धन्य हो पंडितजी! उसका कितना हित चाहते हैं? पंडित हो तो ऐसा, वरना बिन पंडित ही ठीक।

"तो इसका दूसरा नाम डेज़ी रख देते हैं," काकू की पत्नी ने मुझे पुचकारते हुए सलाह दी।

"बिमला क्यों नहीं?" पंडितजी न भारतीय संस्कृति के कमाऊ उपासक होने के चलते पूछा तो काकू ने कहा, "पंडितजी असल में ये भले ही मिक्स हो गई हो पर वास्तव में है तो विदेसी ही। अँग्रेज़ों के जो हम गाँव के नाम रख दें तो उन बेचारों को कैसा लगेगा? समझा करो न! बेचार को इंडियन नाम से बुलाने पर पता नहीं ये समझ भी पाएगी या नहीं कि इसे बुलाया जा रहा है या किसी गँवार को।"

"पर अब तो ये हमारी बिरादरी, कल्चर की होने जा रही है। सो इसे हमारे रीति-रिवाज समझने ही होंगे। हमारी बोली समझनी ही होगी। वरना..." पंडितजी ने सौ टके की बात कही पर काकू को वह राख के मोल से भी कम की लगी।

"धीरे-धीरे सब समझ जाएगी पंडितजी! तो इसका नाम रखते हैं डेज़ी!" कह उसने अपनी पत्नी की ओर देखा तो वह मंद-मंद मुस्कुराई।

पंडितजी के पुरखों की तरह पंडितजी को भी कभी अपने यजमानों से कभी कोई शिकायत रही। जिस तरह यजमान ख़ुश, उस ओर मोड़ दिया धर्म। उनका मानना है कि श्रेष्ठ धर्म वही जो जीव को कुछ भी करने की छूट दे। धर्म के नाम पर उनको लूट दे। पंडित जी ने अपने झोले से शंख निकाला और काकू से कहा, "काकू! ये शंख पकड़ और इसके बीच में से लक्ष्मी के कान में तीन बार देजी देजी देजी बोल दे।"

"देजी नहीं पंडितजी डेज़ी," काकू की पत्नी ने पंडितजी की ग़लती सुधारते कहा।

काकूजी ने अपनी बीवी की गोद में शांत डरी मुझे लिया और मेरे कान में शंख से तीन बार डेज़ी डेज़ी डेज़ी कहा तो मैं डरी। असल में उस वक़्त मेरे कान में गुदगुदी सी हुई थी। पर मेरा मालिक मेरे कान में शंख घुसा कर ही रहा। और मेरा नामकरण संस्कार पूरा हुआ। घर में शिमला के नत्थू हलवाई से लाए मोती चूर के लड्डू बँटे तो काकू की माँ ने दो लिए।

पंडितजी ने मेरे ग्रहों की शांति के नाम पर अपने उदर की शांति हेतु ली चार दालों की किलो-किलो की गठरियाँ बाँधी, कांधे पर धरीं और अपने घर को मुझे गालियाँ देते आगे हो लिए।

सोमवार को मालिक बोले तो मेरा धर्म का बाप मुझे अपनी बीवी की गोद में छोड़ मेरा एक-एक काम उसे दस बार दस बार समझा शिमला चला आया अपनी ड्यूटी पर। अपनी बीवी को तो अपनी बीवी को, अपनी माँ को भी उसने समझाते कहा, "माँ देख, मैं तेरे भरोसे अपने कलेजे के टुकड़े को छोड़ कर जा रहा हूँ। इसके साथ कैसे रहना है, इसके साथ कैसे बातें करनी हैं, समझ गई न?" तब माँ ने उससे कहा था, "डर मत बेटा! मैंने तुझे भी तो नौ महीने पेट में पाला है। बच्चे को कैसे पाला जाता है, मुझे सब आता है। तू चिंता मत कर," तब पहली बार काकू को अपनी माँ पर प्यार आया था।

....और मैं एक माँ के द्वारा अपनी बेटी के बराबर तिरस्कृत होने के बाद भी शान से हर रोज़ दो इंच बढ़ती रही। मेरे लिए बा्ज़ार से हर तीसरे दिन बकरे का मीट आने लगा। सुबह शाम दोनों वक़्त दूध। सुबह उठकर मालिक की बीवी पोती को दादी के पास छोड़ मुझे गोद में लिए बाहर सैर करवाने ले जाती तो खुली हवा, खुला वातारवण देख मन मोर हो बैठता।

देखते-देखते मैं गाँव की सबसे प्यारी दुलारी बन गई। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि यह देश आज़ाद हो जाने के बाद भी हमारा ही गुलाम रहेगा।

मैं हरदम बिस्तर पर तो बुढ़िया ज़मीन पर बिस्तर लगाए। मुझे तब बुढ़िया पर दया भी आती। पर मैं चुप रहती। अब तक मुझे पता चल चुका था कि समाज में दया करनी नहीं, केवल दिखानी चाहिए।

इतना सब होने के बाद भी पर रहती मैं डरी हुई सी ही। कारण, औरों के देश में आदमी तो आदमी, कुत्ता भी चूहा हो जाता है। पर मेरे घरवालों ने मेरे इस डर को मेरी शरीफ़ी से जोड़ा तो मुझे और भी प्रसन्नता हुई।

मालिक की घरवाली पहले मुझे खिलाती, फिर अपने-आप खाती और बचा हुआ सास को देती। मालिक की घरवाली पहले मुझे शैंपू से नहलाती, फिर बचा शैंपू अपने बालों में लगाती। उसके बाद पानी बचता तो बेटी को नहलाती। बुढ़िया को नहाने को तो बहुधा ठंडा ही पानी मिलता। मैं ख़ुश! आज़ाद देश में भी विदेसियों का इतना सम्मान! हाय रे इंडिया!

मेरे अनिंद्य सौंदर्य को देख गाँव की गलियों में सारा दिन पड़े रहने वाले शोहदे बस इसी ताक में रहते कि उन्हें मौक़ा मिले तो वे मुझसे अपने इश्क़ का इज़हार करें। यह देख मेरा सौंदर्य और भी निखर जाता, बिन नहाए पेस्ट किए बिना ही। तब मन करता राधा से कह अपने नाखूनों में उससे उसका नेल पालिश लगवाऊँ। उससे बिंदी ले अपने माथे पर लगाऊँ। उससे ... पर बेचारों की मुराद पूरी न हो सकी तो न हो सकी। कारण, जब भी मैं घर से बाहर निकलती तो राधा अपने हाथ में उनके लिए चार फुट का बाँस का डंडा लिए रहती।

अचानक मुझे पता नहीं क्या हुआ कि मैं बीमार हो गई। उटपटांग तो ऐसा-वैसा मैंने कुछ खाया नहीं था। वैसे मालिक की माँ ने कई बार अपनी बहू से कहा भी था कि मुझे कम खिलाया कर। जो कहीं मैं बसूचका गई तो ठीक न होगा। पर मालिक की बीवी तो मुझे एकदम व्यस्क करने पर तुली थी। मालिक को जब मेरे बीमार होने का पता चला तो अपने को बुखार होने के बाद भी वह बिन छुट्टी दिए, नंगे पाँव ही दफ़्तर से रात को ही मेरे पास आ पहुँचे। दस मील पैदल चल कर। तब मैं बीमार भी ऐसी हुई कि..... एक बार जो मैंने न चाहते हुए भी बिस्तर पकड़ा .....मालिक ने मुझे स्नोडन हास्पिटल दिखाने की भी सोची पर मेरे शायद ग्रह ठीक न थे।

मालिक की पत्नी ही जानती है उसने मुझे किस-किस वैद्य को नहीं बताया। किस-किस से खोट दोष नहीं गिनवाया। जिसने जो भी टोना-टोटका बताया, उसने सब कराया। पर मुझे मालिक की पत्नी से स्वतंत्रता से पहले की बची जितनी सेवा करानी थी, उतनी करवाई और मैं चली गई, अपने ख़ुदा के पास।

मैंने महसूसा कि मेरे जाने के बाद कई दिनों तक मालिक का घर, घर में सबके होने के बाद भी श्मशान सा बना रहा। मालिक ने मेरी आत्मा की शांति के लिए घर में पंडितजी से हवन-पूजन दान करवाया। मेरी पूँछ के बाल पूरे परिवार का मुंडन करवा, मेरी आत्मा की शांति के लिए पंडितजी के कहे गंगाजी में बहाए। विदेसी मूल की होने के बाद भी मालिक ने जीपीएफ़ निकलवा मेरे पूरी ईमानदारी से कर्म किए। ऐसे जो वे अपने फ़ादर के करते तो मालिक के फ़ादर को मोक्ष मिलता। बेचारे अभी भी प्रेत योनि में न फँसे होते।

मेरे क्रिया कर्म पूरे होने के बाद मालिक उदास, एकबार फिर कुत्ता बिज़नेस के सपने लेते अपनी ड्यूटी पर लौटे तो उसकी बेटी और माँ ने चैन की लंबी साँस ली।

तो पाठको! इधर कनक निसरी, उधर डेज़ी की कमर्शियल आत्मकथा बिसरी। अब डेज़ी की आत्मकथा के प्रकाशन के लिए धाँसू प्रकाशक न मिलने तक जय रामजी की!


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