अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
05.20.2014


खाना-पीना, हँसी-ठिठोली

खाना-पीना, हँसी-ठिठोली, सारा कारोबार अलग!
जाने क्या-क्या कर देती है आँगन की दीवार अलग!

पहले इक छत के ही नीचे कितने उत्सव होते थे,
सारी खुशियाँ पता न था यूँ कर देगा बाज़ार अलग!

पत्नी, बहन, भाभियाँ, ताई, चाची, बुआ, मौसीजी
सारे रिश्ते एक तरफ हैं लेकिन माँ का प्यार अलग!

कैसे तेरे - मेरे रिश्ते को मंज़िल मिल सकती थी
कुछ तेरी रफ़्तार अलग थी, कुछ मेरी रफ़्तार अलग!

जाने कितनी देर तलक दिल बदहवास-सा रहता है
तेरे सब इकरार अलग हैं, लेकिन इक इनकार अलग!

अब पलटेंगे, अब पलटेंगे, जब-जब ऐसा सोचा है
'अंजुम जी' अपना अन्दाज़ा हो जाता हर बार अलग!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें