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02.17.2014


"यादों की लकीरें": संस्मरण विधा में एक नए युग की शुरूआत

"यादों की लकीरें" - रूप सिंह चंदेल
पृष्ठ -१८४, मूल्य- ३०० रूपए।यादों की लकीरें
भावना प्रकाशन, 109-A, पटपड़गंज, दिल्ली-११००९२

यह अभीष्ट सत्य है कि यादें किसी भूल-भुलैयां की भांति होती हैं जो आजीवन व्यक्ति को आकर्षित करती रहती हैं। ज़िन्दगी के हर मोड़ पर वह उसे मन्त्र मुग्ध-सा निहारता रहता है। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो अपने अंतरतम में संजो रखी यादों को किसी अन्य से बाँटते हैं और जो बाँटते भी हैं तो उनके उन यादों के हिस्सेदार कुछ लोग ही होते हैं। लेकिन जब कोई लेखक अपने जीवन की यादों को कलमबद्ध करता है उसकी रचनाओं की भांति वे एक वृहद पाठक-वर्ग से जुड़ती हैं और पाठक उसके हर संस्मरण के साथ अपना तादात्म्य स्थापित करने का प्रयास करता है। उसे लगता है कि उसका स्व भी तो कहीं इन्हीं यादों के साथ जुड़ा हुआ है। वरिष्ठ कथाकार रूपसिंह चन्देल ने अपनी सद्यः प्रकाशित पुस्तक "यादों की लकीरें" के माध्यम से अपने पाठकों के साथ संवाद स्थापित करने का जो प्रयास किया है वह अनुपमेय है। पुस्तक के संस्मरणों को पढ़ते हुए पाठक को लगता है कि कहीं न कहीं वह भी उन संवेदनाओं से गुज़रा है। चंदेल की यही खूबी है कि उन्होंने जिस भी विधा को चुना उसे उसकी ऊँचाइयों तक ले गए। इसका ताज़ा उदाहरण "यादों की लकीरें" हैं।

इस पुस्तक में लेखक ने अपने संस्मरणों को दो भागों में विभक्त किया है। प्रथम भाग में उन्होंने अपने समय के शीर्ष पर बैठे साहित्यकारों के जीवन को छुआ है तो दूसरे भाग में गैर साहित्यकारों पर कलम चलाई है। अपने जीवन संघर्षों से ख़ामोशी से जूझ रहे लोगों को लेखक ने सहज ही एक नई परिभाषा देकर हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है जिसे प्रायः लोग सरसरी निगाहों से देखते हुए निकल जाते हैं। यही कारण है कि उसके जीवन के आस-पास घटी सभी घटनाएँ उसके अन्दर बेचैनी का कोलाहल पैदा करती रहीं ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार समुद्र ऊपर से शांत दिखाई देता है लेकिन उसके अन्दर का शोर ख़ामोशी लिए भी आक्रांत करता रहता है। चंदेल के इन संस्मरणों को पढ़ कर हमें आश्चर्य चकित होना पड़ता है कि मस्ती भरे ठहाके लगाने वाला यह व्यक्ति अपने अन्दर कितने सारे विस्फोटों को दबाए हुए था। वह अस्थिर स्वभाव वाले डॉ. लक्ष्मी नारायण लाल पर बेलाग भाव से लिखते हैं तो बाबा नागार्जुन, शिवप्रसाद सिंह, शैलेश मटियानी, भगवती चरण वर्मा, विष्णु प्रभाकर तथा कन्हैयालाल नंदन पर उनके संस्मरण उन बड़े रचनाकारों के कुछ अनछुए पक्षों पर प्रकाश डालते हैं और उन्हें और अधिक निकट से जानने का अवसर प्रदान करते हैं।

इनके अतिरिक्त लेखक ने एक ऐसे साहित्यकार पर भी लिखा है जिन्हें लोग बहुत करीब से जानते रहे हैं तथा जिन्होंने नई कहानी के आन्दोलन को जन्म दिया अर्थात कमलेश्वर। इस संस्मरण से गुज़रते हुए यह उद्घाटित हुआ कि उनके मानवीय सरोकार कितने गहरे थे। जब उनके अधीन कार्यरत रमेश बतरा किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त होकर जीवन-मृत्यु से जूझ रहे थे - अर्थाभाव के कारण अपना इलाज करवाने में असमर्थ थे उस वक्त कमलेश्वर ने बतरा के डाक्टर से कहा था कि "डाक्टर आप इलाज करें पैसे की चिंता न करें।" मेरा मानना है कि किसी भी युग में ऐसे विरले ही लोग होते हैं जो विपरीत स्थिति में भी खड़े होकर संबल बन जाते हैं। इन साहित्यकारों के अतिरिक्त चन्देल ने "कार्लो हब्सी का संदूक" जैसी उल्लेखनीय कहानी लिखने वाले कथाकार रमाकांत, डॉ. रत्नलाल शर्मा, डॉ. राष्ट्रबंधु और डॉ. शिवतोष दास पर लिखा है। बहुपठनीयता जहाँ चन्देल के संस्मरणों की विशेषता है वहीं बेलाग होते हुए भी उन्होंने साहित्यकारों की कमज़ोरियों की ओर संकेत भले ही किया हो उन्हें विषय पर हावी नहीं होने दिया। दूसरे शब्दों में वे उनके सकारात्मक पक्ष पर ही अधिक प्रकाश डालते हैं। इस खण्ड का अत्यंत मार्मिक संस्मरण है – "शीर्ष से सतह तक की यात्रा"। यह संस्मरण "पराग प्रकाशन" (बाद में अभिरुचि प्रकाशन) के श्रीकृष्ण के अंतिम जीवन को केन्द्र पर रखकर लिखा गया है और बहुत ही मार्मिक है।

"यादों की लकीरें" के दूसरे भाग में चन्देल ने अपने बचपन से लेकर बाद के जीवन से जुड़े उन पात्रों को केन्द्र में रखकर लिखा जिन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनके जीवन को प्रभावित किया। "बड़ी दीदी", चंदनिया बुइया उर्फ चाँदनी देवी, बाला प्रसाद, डॉ. सुधांशु किशोर मिश्र, इकरामुर्रहमान हाशमी, शोभा लाल, मथाई सी.जे. और तांगेवाला उनके अविस्मरणीय संस्मरण हैं, जो अपनी क़िस्सागोई शैली और जीवन के प्रति अपनी जिजीविषा के कारण पाठक को विमुग्ध और विचिलित कर देते हैं। अपने मन-मस्तिष्क पर छूटी इन पात्रों की अमिट छाप लेखक कभी भुला नहीं पाता।

चन्देल के सभी पात्र मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग से उभर कर आए हैं जिनके संघर्ष अंत तक सुखद एहसास से वंचित रहते हैं। कुछ पात्रों की त्रासदपूर्ण जीवन स्थितियों को लेखक गहनता से अनुभव करता है और उनकी सहायता भी करना चाहता है लेकिन अपनी सीमाओं में बँधा वह वैसा कर नहीं पाता और अपराधबोध का शिकार होता है। उस दौर का अपराध-बोध निरंतर उसे मथता रहता और अंततः इन संस्मरणों के माध्यम से वह उन्हें अमरता प्रदान करता है।

अंत में केवल इतना ही कि "यादों की लकीरों" के सभी संस्मरणों में चंदेल की ईमानदार अभिव्यक्ति और पात्रों की जीवंतता ने उन्हें अविस्मरणीय बना दिया है। इन्हें पढ़ते हुए प्रतीत होता है कि हम भी इन पात्रों को अपने आस-पास चहल-कदमी करते हुए अनुभव कर रहे हैं। जिन्दगी की गहन सच्चाईयों से परिपूर्ण इन संस्मरणों में से गुज़रना एक नए जीवन अनुभव से गुज़रना जैसा है। कहना अनुपयुक्त न होगा कि ये विलक्षण हैं और इनका शिल्प-विधान पारंपरिक संस्मरण विधा का विखंडन भी है। यही इनकी बहु-पठनीया का आधार है।

निश्चित ही "यादों की लकीरें" से संस्मरण विधा में एक नए युग की शुरूआत मानी जानी चाहिए।


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