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06.06.2012


अपने समय को परिभाषित करती हुई कहानियाँ
 

उस स्त्री का नाम: इला प्रसादUs stri ka naam
भावना प्रकाशन,
१०९ ए, पड़पड़ गंज,
दिल्ली -११००९१
मूल्य -१५०- रुपये, पृष्ठ : १२८

प्रवासी भारतीय लेखकों के मध्य एक प्रतिबद्ध रचनाकार के रूप में इला प्रसाद ने कथा साहित्य के साथ कविता में भी अपनी एक अलग महत्वपूर्ण पहचान बनाई है। उनके साहित्य में जहाँ प्रवासी जीवन गहनता के साथ अभिव्यक्त हो रहा है वहीं वह कर्मभूमि भी व्याख्यायित है जहाँ वह पली-बढ़ी, पढ़ी-लिखीं और जहाँ रहते हुए वह हिन्दी साहित्य से जुड़ीं। वह जुड़ाव ही उनकी रचनात्मकता को ऊर्जस्वित कर रहा है। यह ऊर्जस्विता उनमें पूरी ईमानदारी के साथ अभिव्यक्त है। हाल में उनका कहानी संग्रह ’उस स्त्री का नाम’ दिल्ली के ’भावना प्रकाशन’ से प्रकाशित हुआ है। फिलहाल मैं इस संग्रह की कहानियों को दृष्टिगत रखते हुए अपनी बात कहना चाहूँगा।

संग्रह की सभी कहानियाँ विषय को सघनतापूर्वक चित्रित करते हुए पाठक को आद्यंत बाँधे रखने में सक्षम हैं, क्योंकि इनमे जीवन की वास्तविकता उद्भासित है। ये कहानियाँ जीवन के उन क्षेत्रों में सेंध लगाकर, जिन्हें प्रायः नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, विषय को जिस वास्तविकता के साथ शब्दायित करती है वह उल्लेखनीय है। ये कहानियाँ जीवनानुभव का गहन अवगाहन हैं। इला के पास सूक्ष्म पर्यवेक्षण दृष्टि है और है आकर्षक काव्यात्मक भाषा। यह भाषा तब और आकर्षक हो जाती है जब वे बेहद किफ़ायत के साथ शब्दों का प्रयोग करती हैं। छोटे वाक्य विन्यास उनकी शक्ति हैं और यही शक्ति समकालीन रचनाकारों में विशेष रूप से प्रवासी रचनाकारों में उन्हें एक अलग और अक्ष्क्षुण पहचान प्रदान करती है।

संग्रह की पहली कहानी ’एक अधूरी प्रेमकथा’ की निमिषा एक ऎसे पिता की संतान है जो उसकी माँ से कभी विवाह नहीं करता और यही कारण है कि वह कभी अपने पिता से जुड़ाव अनुभव नहीं कर पाती। माँ के प्रति उसमें अगाध प्रेम है और यह स्थिति वह अपने प्रेमी से छुपाती नहीं और उसका प्रेमी बंटू अपने घरवालों के बहाने उससे विवाह से इंकार कर देता है। समाज का यही सच है और लेखिका ने उस सच को बेहद मार्मिक ढंग से रेखांकित किया है। लेकिन इस क्रूर समाज का एक सच यह भी है कि ऎसे प्रेमी विवाह से तो बचना चाहते हैं लेकिन प्रेम फिर भी बनाए रखना चाहते हैं, लेकिन बंटू का वह प्यार निमिषा को स्वीकार नहीं। जीवन की क्रूर वास्तविताओं से रूबरू होने के बाद कला और साहित्य में सुकून खोजने वाली निमिषा टूट जाती है। कहानी आज की अर्थवादी सचाई को उजागर करती है जहाँ सभी अपनी सोच को थोपने का ही प्रयास करते हैं और ईमानदार व्यक्ति ठगा मूक दर्शक ही बना रह जाता है।

विदेश में रहते हुए भारतीय वहाँ की ज़िन्दगी में इतना रम जाते हैं कि उनके लिए रिश्ते भी बेमानी हो जाते हैं। इसे हम ’उस स्त्री का नाम’ में देख सकते हैं। यह एक ऎसी माँ की कहानी जो अपने बेटे के बुलावे पर अमेरिका जाती है, जिसका रियल एस्टेट का व्यवसाय है। लेकिन माँ की देखभाल करने क़ी बजाय वह उसे ओल्ड एज होम में छोड़ देता है जहाँ वह अकेलेपन को भोगने के लिए अभिशप्त हो जाती है, फिर भी उफ नहीं करती है बल्कि उसकी प्रवृति को भी उसकी व्यस्तता से जोड़ कर अपने अकेलेपन का भी शानदार तरीके से वर्णन करती है। इस कहानी में पूरी अमेरिकी संस्कृति उभर कर हमारे समक्ष उद्घाटित हो उठी है। यह एक मार्मिक और उल्लेखनीय कहानी है और एक यादगार कहानी के रूप में पाठक के मन को आप्लावित कर जाती है।

’बैसाखियाँ’ कहानी में भी दूसरे ढंग से यही स्थिति हमें देखने को मिलती है जहाँ आम अमेरिकी अपनी संस्कृति को उत्सव की तरह मनाते हैं। अंधविश्वास की बैसाखियाँ पूरी दुनिया में पहनी जाती हैं, न कि केवल भारत में। ’चुनाव’ में लेखिका पुन: एक बार भारत एवं अमेरिका के जीवनानुभवों का तुलनात्मक अध्ययन करती दिखाई देती है।

’मेज’ कहानी में मेज को केन्द्र में रखकर कहानी का ताना-बाना बुना गया है। ’मेज’ जो गृहस्वामिनी को एक बेकार वस्तु प्रतीत होती है बाद में पक्षियों के लिए डायनिंग टेबल के रूप में प्रयुक्त होने पर जो प्रसन्नता प्रदान करती है वह शब्दातीत है। बदरंग हुई अधटूटी चौकी अब मेज थी न कि चौकी जिसे फालतू समझा जा रहा था। लेखिका प्रकृति और पक्षियों के माध्यम से एक नया संसार रचतीहै जो मानव जीवन की भी व्याख्या प्रस्तुत करता है। कई तरह की अर्थ छायायें हैं इस कहानी में हैं, जो इस छोटी सी कहानी को बेहद पठनीय बनाते हैं।

’हीरो’ कहानी एक अलग विषय को लेकर बुनी गयी है जहाँ घृणा पर कृतज्ञता का भाव उभरकर
हमारे समक्ष प्रस्तुत होता है। यह अलग बात है कि यहाँ भी बनते-बिगड़ते रिश्तों की बानगी का जिक्र है जो कि अमेरिका में आम बात है। कुछ ऎसी ही भावभूमि की अभिव्यक्ति ’आकाश’, ’साजिश’ कहानियों में हमें प्राप्त होती है। जहाँ आम भारतीय प्रवासी भारतीयों के विषय में इस भ्रम का शिकार दिखाई देता है कि वे कितने सुखी और सम्पन्न हैं। वह उनके मानसिक संतापों को निराधार मानकर अस्वीकार करता है। दूसरी ओर सफलताओं की सीढ़ी से गिर कर आम जिन्दगी जीता हुआ वह किस तरह कुंठाएं पाल लेता है यह कुंठा कहानी की यामिनी के रूप में स्पष्ट दिखाई देता है। ’तलाश’ और ’मुआबजा’ लेखिका की कभी न भूलने वाली कहानियाँ हैं।

इला प्रसाद की विशेषता यह है कि वह कहानी को उभारने से पहले दृश्यों का सहारा लेतीं हैं जिससे कहानी सजीव,संप्रेषणीय, विश्वसनीय और प्रभविष्णु हो जाती है। यद्यपि आज तेजी से उभरते आर्थिक आधार पर स्थापित रिश्ते डगमगा रहे हैं लेकिन हमारे भारतीय संस्कार इतने गहरे हैं कि वे हमें हर विपरीत स्थिति में शक्ति प्रदान करते हैं----अपनी कई कहानियों में इला इस ओर संकेत भी करती दिखाई देती हैं। इला की कहानियाँ हमारे चारों ओर फैली विसंगतियों और विद्रूपताओं की कहानियाँ हैं, फिर भी वे अंधकार में प्रकाश की खोज की कहानियाँ भी हैं।


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