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ISSN 2292-9754

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06.01.2017


 तलाक़

मैंने की जो अपने वजूद की वकालत,
किताब की क़सम मिली और तलाक़ हो गया।

मैं आँसुओं को बाँध के लिहाज के कफ़न में
हज़ार बंदिशों में छुप गयी और हिसाब हो गया।
शौहर की आँख में मैं ग़ैर कब से हो गयी?
सवाल का जवाब था कि उम्र मेरी हो गयी।
आह तब दबी रही जब हुईं ज़ोर आज़माइशें
इक रिश्ता तो बच गया, मैं लाइलाज हो गयी।
जिस हाथ के हुनर में शहूर था मिसाल थी
दाल में कुछ कम हुआ और तलाक़ हो गया।

किताब की क़सम मिली और तलाक़ हो गया॥

मैं ख़तों में शेख़ की ख़ैरियत थी पूछती
वो किसी से ख़त मेरा पढ़वाता था हर दफ़ा।
मेरे लिखे हर लफ़्ज़ की नुमाइशें हुई वहाँ
बोलने की चाह में ख़ामोशियाँ हुई ख़फ़ा।
मुझे मरीज़ बोल के मर्ज़ियाँ अपनी करी
तुमने तीन बार लिख दिया और तलाक़ हो गया।

किताब की क़सम मिली और तलाक़ हो गया


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