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ISSN 2292-9754

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05.25.2017


आकाश का रंग

“बेटी, मेरी ऐनक...” उस दिन फोन पर पापा ने बस इतना ही कहा था। फिर दूसरी ओर से आवाज़ आनी बंद हो गई थी। सुरभि को समझते देर नहीं लगी थी कि पापा की ऐनक नहीं मिल रही होगी। बचपन में जब उनकी ऐनक उन्हें नहीं मिलती तो पलक झपकते ही वह पापा के सामने ऐनक लेकर खड़ी हो जाती और कहती - “देखा, पापा, मेरा चमत्कार! मेरे बिना तो तुम ठीक तरह से देख भी नहीं सकते।”

सुरभि ने फोन रख दिया था। दुबारा नहीं लगाया था। समझ गई थी कि पापा रो रहे होंगे। माँ बताती थी कि जब से वह अमेरिका गई, पापा चुप रहने लगे थे। उसका कमरा सजाकर रखते। कहते, ऐसा सोचो कि नौकरी के लिए बाहर गई है, अभी शाम होते ही घर लौट आएगी। माँ ने तो समय से समझौता कर लिया था। एक स्कूल में बच्चों को पढ़ाना शुरू किया तो अकेलापन दूर हो गया था।

फिर महीना भी नहीं बीता। सुरभि भारत वापस आ गई। नौकरी तो दिल्ली में नहीं मिली। लेकिन बेटी मुम्बई में रहती है इससे पिता को संतोष था। अधिक दूर नहीं है। और भारत आने के साल भर के भीतर ही माता-पिता के कहने पर उसने शादी भी कर ली। माँ ने समझाया था, “देखो, सुरभि, लड़का अच्छे घर से है। संस्कार अच्छे होंगे। और तुम्हारे पापा ने तो मन-ही-मन तुम्हारी शादी की तैयारी भी शुरू कर दी है।” वह क्या करती? उसने हामी भर दी।

सब कुछ याद करके उसकी आँखें डबडबा आईं। बाहर उजाला हो चुका था। एक बोतल में उसने पानी भरा, ट्रैक सूट चढ़ाया, नाइकी का नया जोड़ा जूता पाँव में डाला और एक केला हाथ में लेकर नीचे उतर आई।

नवम्बर महीने की यह हल्की-हल्की ठण्ड उसे बहुत पसंद है। उस ठण्ड से जो थोड़ी-सी सिहरन होती है, उसे सीधे उसके गाँव पहुँचा देती है। बचपन में छठ पूजा के दिन जब माँ तालाब में उतरती, तब दोनों हाथ जोड़कर सूरज को प्रणाम करके वह रोमांचित हो उठती थी। आज भी वह सूरज को भगवान ही मानती है। उसकी ऊर्जा से ही तो धरती पर जीवन है। लेकिन यह बात उसके दोस्त कहाँ मानते है? मानेंगे भी कैसे? न कभी सूरज को उगते देखते हैं और न ही डूबते। सुबह सात बजे तक सोते रहते हैं और शाम ऑफ़िस में शीशे की दीवारों के बीच बीतती है।

और विनय? वह तो उसकी खिल्ली उड़ाता है। कहता है कि देहाती है। बचपन में छोटे शहर में रही है। तभी ऐसा सोचती है। एक बार तो उसने हद ही कर दी थी। कहा था - “अपनी सर्टिफिकेट्स दिखाना ज़रा। बिट्स पिलानी वाली। असली हो ही नहीं सकते।” उसके सारे दोस्तों ने एक साथ ठहाका मारा था। वह एकदम से किचन में चाय बनाने घुस गई थी।

तैयार होकर सुरभि नीचे उतर आई। सीढ़ी के पास एक चबूतरे पर पानी की बोतल रख दी। केला हाथ ही में रहने दिया। चूहे इधर-से-उधर घूमते रहते हैं। हवा में ठंडक थी, हल्की-हल्की, वही छठ की सुबह वाली। फिर धीरे-धीरे दौड़ना शुरू किया।

दौड़ना उसे अच्छा लगता है, धीरे-धीरे दौड़ना। जब शरीर दौड़ना शुरू करता है तो उसके दिमाग़ को आराम मिलता है। और दिमाग़ को ज़रूरत है आराम की। तीन साल बीत गए विनय के साथ रहते हुए। शादी की थी पापा का मन रखने के लिए। लेकिन महीना भी नहीं बीता और वह समझ गई कि अब वह एक बंधन में फँस चुकी है। अब इस बंधन को निभाना पड़ेगा।

धीरे-धीरे दौड़ते हुए उसने अपार्टमेंट के चारों तरफ एक चक्कर पूरा कर लिया।

शादी के बाद तो जैसे जीवन में उथल-पुथल ही मच गई। अपनी जैकेट पहनते हुए उस दिन विनय ज़ोर से चिल्लाया था - “सुरभि तुम क्या कर रही हो? हम पार्टी के लिये लेट हो जाएँगे।” उसने कोई उत्तर नहीं दिया था। पिछले सात दिनों से जो किताब पड़ी थी उसे पढ़ने का मौक़ा आज मिला था। उस कहानी में डूबती-उतराती हुई अभी वह उसका हिस्सा बन चुकी थी। लोग मंदिर में घुसने वाले हैं। आज उन्हें कोई नहीं रोक सकता है। विनय की आवाज़ उसके कानों में पड़ी थी लेकिन उसने सुना नहीं था। उसके दिमाग़ में तो जगन्नाथ छाया था, उसकी बातें गूँज रही थी वहाँ। जगन्नाथ जो कहानी में दलितों को मंदिर में घुसने के लिए हौसला दे रहा था।

फिर एकदम से कमरे में घुसकर विनय ने किताब हाथ से छीन ली थी। उठाकर उसे बिस्तर पर पटकते हुए कहा था - “ये क्या पुराने ज़माने की किताब लेकर पड़ी हुई हो?” सुरभि बस देखती रह गई थी। “और सुनो, वहाँ न थोड़ी-सी ड्रिंक ले लेना। नहीं तो लोग देहाती समझेंगे। गँवार कहेंगे। सोशल होना चाहिए।”- रास्ते में विनय ने नसीहत भी दी थी।

धीरे- धीरे दौड़ते हुए सुरभि ने अपार्टमेंट के तीन चक्कर पूरे कर लिए। हर चक्कर लगभग आधा किलोमीटर का होगा। आधा से अधिक ही होगा, कम नहीं। बड़ा-सा अपार्टमेंट है। दोनों ने मिलकर ख़रीदा है। आईटी कंपनी में काम करते हैं दोनों। महीने की आय ज़रूरत से बहुत अधिक है। इसलिए एक नामी बिल्डर के अपार्टमेंट में घर लिया है। हर तरह की सुविधाएँ हैं अपार्टमेंट में - जॉगिंग ट्रैक, क्लब हाउस, मेडिटेशन हॉल, इनडोर गेम्स के लिए बैडमिंटन, बास्केट बॉल और लॉन टेनिस कोर्ट। लेकिन विनय इन सब में किसी का भी उपयोग नहीं करता है। उसके पास समय हो तब तो। और सुरभि केवल जॉगिंग ट्रैक का इस्तेमाल करती है। धीरे-धीरे दौड़ना और फिर थककर किसी पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठ जाना ही उसके लिए मेडिटेशन है।

छठा चक्कर शुरू हुआ। ठीक उसी रफ़्तार में जिसमे उसने पहला चक्कर शुरू किया था। ऐसा नहीं है कि वह विनय से बात नहीं करती है। करती है। कम-से-कम कोशिश तो अवश्य करती है। उस दिन कॉफ़ी हाउस में कैप्पुचिनो की चुस्की लेकर सुरभि ने कहा था- “तुम्हें पता है कि यूनिवर्स से ढेर सारे बेबी यूनिवर्स निकल रहे होते हैं?”

“क्या?”

“हाँ। बेबी यूनिवर्स। हुआ न आश्चर्य सुनकर?”

“लेकिन वह भी तो यूनिवर्स ही हुआ। बेबी यूनिवर्स कैसे हुआ। इसी का एक हिस्सा हुआ।”

“एक तरह से इसी का हिस्सा है, लेकिन इससे अलग है, और अपने आपमें पूरा है, कम्पलीट। इसलिए बेबी यूनिवर्स है।”

“ये क्या बात हुई?”- विनय ने थोड़ा व्यंग्य के भाव से मुस्कुराते हुए कहा था। सुरभि को वह मुस्कान एकदम भद्दी लगी थी।

“तुम समझोगे भी नहीं।”

“अच्छा ये बेसिरपैर की बातें छोड़ो। वो किताबों में ही ठीक है। चलोगी आज मूवी देखने?” - विनय ने बात की दिशा एकदम से बदल ली थी। एक गहरी साँस सुरभि के मुँह से अनायास बाहर निकल आई थी।

एक-एक करके अपार्टमेंट के चारों तरफ दस चक्कर लगाने के बाद सुरभि थककर बैठ गई। पिछले कुछ महीनों से उसे अब हरदम खाली-खाली-सा लगता रहता है। जैसे जीवन अधूरा- अधूरा है। वह उसे भरना तो चाहती है, कोशिश भी करती है, लेकिन बीच में ही अचानक सब छूट जाता है। उसने देखा ऊपर पेड़ की डाल से उड़कर एक चिड़िया दूर चली गई। यह चिड़िया उसे बहुत पसंद है। बचपन में जिस गोरैया को देखकर बड़ी हुई उसी की तरह दिखती है यह। उसी की तरह बोलती भी है। लेकिन गौरेया नहीं है, उससे थोड़ी छोटी है और रंग भी भूरा तो है लेकिन थोड़ा हल्का है। इस चिड़िया का उड़ना सुरभि को बहुत अच्छा लगता है। ज़ोर लगाकर थोड़ा ऊँचा उड़ती है, लेकिन धरती की ताक़त से खिंच कर नीचे हो जाती है। फिर ज़ोर लगाती है और ऊपर चली जाती है। उसका इस तरह सागर की लहरों की तरह ऊपर-नीचे होकर उड़ना सुरभि को बहुत भाता है। अभी उसका जीवन भी थोड़ा नीचे हो गया है। किसी ताक़त ने खींच कर उसे नीचे कर दिया है। फिर ऊपर उठ जाएगी। थोड़ा ज़ोर लगाना पड़ेगा।

 

आज सुरभि ने अपार्टमेंट के पूरे बीस चक्कर पूरे कर लिए। हर दिन दस चक्कर लगाकर छोड़ देती थी। इसलिए नहीं कि इससे अधिक वह दौड़ नहीं सकती थी। बस दस के बाद इच्छाशक्ति कमज़ोर पड़ जाती थी। शरीर तो तैयार ही होता था लेकिन दिमाग़ विद्रोह कर देता था। आज उसने दस के बाद ग्यारह, ग्यारह के बाद बारह, बारह के बाद तेरह और एक-एक करके पूरे बीस चक्कर पूरे कर लिए। आगे बढ़ने की चाह ने अब उसे पूरी तरह घेर लिया था। बीस चक्कर लगाकर थककर चूर हो गयी। थोड़ा पानी पीया। वहीं पेड़ के नीचे चबूतरे पर लेटकर आकाश की ओर ताकने लगी। कुछ देर के लिए मन ठहर-सा गया, लेकिन फिर चिड़िया की तरह उड़ान भरने लगा। गोरैया की तरह दिखने वाली चिड़िया पेड़ से उड़कर दूर चली गई। उसे लगा जैसे उसका जीवन थोड़ा नीचे भर नहीं हुआ है। किसी ताक़त ने खींच कर उसे धरती पर पटक दिया है। घायल-सी अवस्था में धूल से सनी वह पड़ी हुई है।

इस तरह धरती पर पड़े रहना उसे अच्छा नहीं लगा। हारना उसने कभी सीखा नहीं था। वह तो उड़ना चाहती थी। सोचा, इस तरह घुट-घुटकर जीने से अच्छा है अलग हो जाऊँ। अभी तीन साल ही तो हुए हैं। पूरा जीवन पड़ा है। एक ग़लती करके उसको ढोते हुए बाक़ी की ज़िंदगी तबाह कर लेना एकदम बेवकूफ़ी है। ग़लती हुई तो उसे सुधार लेना चाहिए। अभी सही समय है। पानी अधिक दिनों तक ठहरा रहा तो सड़ जाएगा। फिर उसमें मच्छर भी पनप आएँगे। समय रहते अलग हो जाना ठीक रहेगा।

लेकिन ऐसा करने से पहले एक बार घर बात करना भी ज़रूरी है। माँ तो समझ जाएगी। नहीं समझी तो भी सँभल जाएगी। लेकिन पापा? माँ कहती है कि दिन में चार-पाँच बार मेरी बात ज़रूर करते हैं। अभी तक मेरे बचपन की बात करते हैं और करके हँसते भी हैं, जी खोलकर। एकदम पागल हैं पापा भी। लेकिन बताना तो पड़ेगा ही। चाहे जो हो जाए। उसे पता भी नहीं चला कि कब उसने मोबाइल उठाया और पापा को फोन लगा दिया।

“लेकिन पापा, हम दोनों एकदम अलग हैं। उसकी और मेरी सोच में कुछ भी नहीं मिलता है।”

“तुम्हें क्या लगता है बेटी, मैं और तुम्हारी माँ क्या एक जैसे थे? नहीं थे। जिस सोच की तुम बात कर रही हो, वो हमारी भी अलग-अलग ही थी। साथ रहते-रहते, जीवन के उतार-चढ़ाव को एक साथ झेलते हुए हम एक जैसे हो गए। कुछ वह बदली, कुछ मैं बदला। सब्र रखो। सब ठीक हो जाएगा, समय के साथ।…”

“लेकिन उसकी बातें गिरी हुई होती हैं, छिछोड़ी होती हैं। मेरी बात वह समझता ही नहीं है। हम दोनों के बीच बात करने के लिए कुछ भी नहीं होता है,” -पापा को बीच में ही रोककर सुरभि ने कहा।

“इतनी छोटी-सी बात के लिए कोई अलग होता है? समय के साथ तो बात करने की ज़रूरत भी कम होती जाती है। और फिर चुप रहकर जितना कुछ कहा जा सकता है, उतना बोलकर नहीं। ठंडे दिमाग़ से सोचकर देखो। यह कोई कारण नहीं हो सकता अलग होने के लिए। तुम्हारी इस बात को तो कोर्ट भी नहीं सुनेगा।”

“लेकिन जिसके साथ मैं चार बातें भी नहीं कर सकती उसके साथ अपनी पूरी ज़िंदगी कैसे बिता सकती हूँ? नहीं होगा मुझसे।”

“होगा। तुमसे नहीं होगा तो किससे होगा? ऐसा क्या है जो तुमसे आजतक नहीं हुआ? एकदम होगा। इस तरह की नकारात्मक बात नहीं करो। तुम्हारे दादाजी ने एक बार मुझसे कहा था कि किसी को अपने स्तर पर लाने के लिए पहले उसके स्तर पर उतरो। फिर उसे धीरे-धीरे सहारा देकर अपने स्तर पर ले आओ, धीरे-धीरे। नहीं तो दोनों अपनी-अपनी जगह पर टिके रह जाओगे। कोशिश करके देखो, एक बार।”

“ठीक है पापा। मैं कोशिश करूँगी,” - कहकर सुरभि ने फोन काट दिया। पापा की बात जँच गई। उनकी बात उसे हमेशा जँचती है।

 

और उसकी कोशिश का अर्थ है - भरपूर कोशिश। आधा-अधूरा प्रयास उससे नहीं होता है। और परिणाम भी पूरा-पूरा ही होता है। शायद इसीलिये आधा-अधूरा जीवन उसे खाली-खाली-सा लगता है, उसे हताश कर देता है। वरना कौन है जिसका जीवन पूरा-पूरा है?

दस बज रहे थे। विनय अभी तक सो रहा था। कमरे में जाकर सुरभि ने पंखा बंद कर दिया। विनय के ऊपर से चादर खींचते हुए कहा - “चलो अब उठ भी जाओ। मूवी के लिए जा रहे हैं हम। अमरेश और चारू को भी बुलाया है मैंने।”

आँखें मलते हुए विनय उठकर बैठ गया।

“रात को देर हो गई थी सोने में। थोड़ी देर और सोने देती यार।”

फिर बिस्तर से उतरते हुए पूछा - “कब तक आ रहे हैं दोनों?”

“पहुँच जाएँगे बारह बजे तक। यहाँ नहीं, सीधे पीवीआर पर मिलेंगे।"

सुरभि को ऐसे तो सिनेमा का बहुत शौक़ है। पर विनय के साथ न जाने क्यों उसे कोई भी मूवी रास नहीं आती है।

इस बार भी कहानी में कोई दम नहीं निकला। डायलॉग भी घिसे-पिटे थे। किसी की भी एक्टिंग में वो बात नहीं थी। हाँ, एक बात थी जो उसे पसंद आ रही थी। डायरेक्टर ने पूरी पिक्चर में आकाश के रंग को बख़ूबी इस्तेमाल किया था। जब नायक और नायिका पास-पास होते हैं तो आकाश का रंग शर्म से हल्का लाल हो रहा होता है। जब नायिका अस्पताल में भरती नायक से मिलकर लौट रही होती है तो दुःखी होकर आकाश पीली-सी चादर ओढ़ लेता है। और जब पानी को लेकर सड़क पर दो गुटों में पहले तो झड़प, फिर बाद में हाथापाई हो जाती है तो क्रोध से आकाश का चेहरा रक्तवर्ण हो आता है।

ढाई घंटे में मूवी समाप्त हो गई। चारों फ़ूड कोर्ट में चाय लेकर बैठ गए।

“मुझे तो बस मज़ा आ गया,”- अमरेश ने बात शुरू करने के लिए कहा।

“इतनी बकवास थी। कैसे अच्छी लग सकती है किसी को!” - चारू ने चिढ़ते हुए कहा।

“तुम्हें कोई भी मूवी पसंद आई आजतक? सुरभि को ज़रूर अच्छी लगी होगी.”- अमरेश ने सुरभि की ओर देखकर कहा तो उसने छोटा-सा उत्तर दिया - “अच्छी थी।”

“क्या अच्छा लगा मैं सुनूँ ज़रा। मुझे तो सिर में दर्द होने लगा,”- विनय ने सिर पकड़ते हुए कहा।

“डायरेक्टर ने आकाश का रंग…” - सुरभि ने अभी बात शुरू ही की थी कि विनय ज़ोर से हँस पड़ा।

“हा...हा...हा…..आकाश का रंग...हा...हा..हा...,” उसकी हँसी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।
“हा...हा...हा….हा...हा...हा...आकाश...का...रंग...वाह। पता है उस दिन मुझसे क्या कह रही थी? कह रही थी कि बेबी यूनिवर्स…..हा...हा...हा….बेबी यूनिवर्स इस यूनिवर्स से निकलते रहते हैं। किस कार्टून से मेरी शादी हो गई यार। पूरी मूवी में आकाश का रंग…”

सुरभि हक्की-बक्की उसे देखती रही। उसे अपनी पूरी कोशिश बेकार होती नज़र आ रही थी।

“स्टॉप इट, विनय। नॉट फनी।”- झिड़कते हुए चारू ने कहा तब जाकर विनय की हँसी रुकी। सुरभि को चारू का इस तरह बीच में पड़ना ठीक नहीं लगा। यह उन दोनों के बीच की बात थी। एक ग्लास में उसने पानी उड़ेला और एक साँस में पीकर उसे खाली करके टेबुल पर धीरे-से रख दिया।

 

“वेयर द हेल आर यू?” - विनय ने व्हाट्सएप्प पर सुरभि को मेसेज किया।

सूरज सिर पर चढ़ आया तब जाकर उसकी नींद खुली थी। उठकर कमरे के बाहर आया। सुरभि नहीं थी। जाकर बालकनी और किचन में झाँका। वहाँ भी नहीं थी। व्हाट्सएप्प मेसेज के आगे दो टिक लग तो गई, लेकिन ब्लू नहीं हुई। सुरभि को मेसेज मिल तो गया लेकिन उसने पढ़ा नहीं। विनय इन्तज़ार नहीं कर सका। फोन की घंटी दस बार बज गई लेकिन सुरभि ने नहीं उठाया।

कहाँ चली गई ये लड़की! कोई बात नहीं अमरेश के यहाँ नहीं जाएँगे। शाम को सीधे यहाँ से कॉन्सर्ट के लिए चले जाएँगे। सोचकर उसका मन थोड़ा शांत हुआ। सेंट्रल टेबल पर पड़ा अख़बार उठाकर टेलीविज़न खोलकर विनय सोफ़े पर बैठ गया। पन्ने पलटने लगा। लेकिन कहाँ गई होगी इस तरह सुबह-सुबह बिना बिताए? पता नहीं अमरेश से इतना क्यों चिढ़ती है? कभी उसके घर सीधे मन से जाने के लिए तैयार नहीं होती है। अख़बार इस पार से उस पार तक देखकर उठकर खड़ा हो गया। कमरे में इधर-से-उधर टहलने लगा। अमरेश की बात उसे एकदम पसंद नहीं आती है। कहती है तुम्हारे दोस्त घटिया सोचवाले हैं। हः! अपने आपको सुकरात समझती है शायद।

लेकिन उस दिन मैंने थोड़ा ज़्यादा ही मज़ाक उड़ा दिया था उसका। मेरी भी आदत ख़राब है। थोड़ी ठीक तरह से बात करनी चाहिए मुझे। एक लंबी साँस लेकर उसने सिगरेट जलाई और बालकनी में जाकर खड़ा हो गया। उस दिन के बाद से चुप रहने लगी है। बेचारी! अच्छी है। भले ही चिढ़ती हो अमरेश से, लेकिन एक बार भी पलटकर मुझे कुछ नहीं कहा है आज तक।

डिंग डाँग…

लपककर विनय ने दरवाज़ा खोला।

“कहाँ चली गई थी सुबह-सुबह?”

सुरभि ने चप्पल उतारे और उसे जूतों वाले स्टैंड में रखने लगी।

“मैंने पूछा कहाँ चली गई थी?”

सुरभि ने अपनी पर्स सोफ़े पर रखा और चाय बनाने किचन में घुस गई।

“गँवार हो क्या तुम? बोल नहीं सकती?”

सनसनाती हुई सुरभि किचन से बाहर निकली। विनय की ओर आँखें तरेर कर देखा। कहा - “तीसरा महीना चल रहा है। डॉक्टर के पास गई थी। शराब पीने नहीं गई थी।” फिर चूल्हा बंद किया। चाय का बर्तन उतारकर नीचे रख दी। हाथ में पर्स उठाया और चाबी लेकर दरवाज़े को अपने पीछे झटके से बंद करके घर से बाहर निकल गई।

तीसरा महीना चल रहा है। विनय जाकर सोफ़े पर लेट गया। छत की ओर देखने लगा। तो क्या मैं बाप बनने वाला हूँ? बन ही गया हूँ। तीसरा महीना - इन दो शब्दों ने उसे जैसे भीतर से भर दिया। कमरे की चार दीवारें, उसकी छत और उनके बीच रखे सारे फ़र्नीचर, सब अचानक सजीव हो उठे। बाप बन गया मैं! एक पल के लिए उसे लगा जैसे सुरभि के पेट में पल रहा बच्चा वह ख़ुद है। दोहरा हो गया उसका अस्तित्त्व - एक बाहर जिसने गिन-गिनकर तीस साल धरती पर बिता दिए हैं, दूसरा सुरभि के पेट के भीतर जो अभी-अभी आया है। वही है, लेकिन अलग है, और अपने-आप में पूरा भी है। कम्पलीट! बेबी यूनिवर्स! इसी की तो बात कर रही थी सुरभि उस दिन। सही कह रही थी। बेबी यूनिवर्स! मैं कभी उसकी बात समझ नहीं पाता हूँ। पढ़-लिखकर भी अनपढ़ हूँ।

अचानक उसकी संज्ञा लौटी। घर से बाहर निकला। चारों ओर नज़र दौड़ाई। अपार्टमेंट के चारों ओर घूमकर देख लिया। जिम में ढूँढा, स्विमिंग पूल की तरफ़ गया। बैडमिंटन कोर्ट, बास्केट बॉल कोर्ट, हर जगह छान मारा। सुरभि नहीं मिली तो हारकर घर लौट आया। उसके दोस्तों को फोन लगाया। कोई ख़बर नहीं मिली। सुरभि थी कि फोन उठा नहीं रही थी। सिगरेट जलाई और बालकनी में जाकर बैठ गया। एक लंबा कश भीतर लिया। लगा जैसे ज़हर भीतर जाकर खून से मिल रहा है। सुरभि को एकदम बर्दाश्त नहीं है उसकी यह सिगरेट पीने की आदत। बुझाकर उसे वहीं पर फेंक दिया। बस थोड़ी-सी पीने के बाद फेंकी हुई इस सिगरेट को सुरभि देखेगी तो उसे ख़ुशी होगी।

बालकनी की रेलिंग पर उसने दोनों पैर पसार लिए। सॉरी बोल दूँगा। बात करूँगा उससे। मान जाएगी। हो सकता है माफ़ नहीं भी करे। लेकिन आगे मैं ग़लती नहीं करूँगा। दिल नहीं दुखाऊँगा उसका। बेवकूफ़ हूँ मैं जो उसकी खिल्ली उड़ाकर मज़े लेता हूँ। अमरेश कभी ऐसी हरकत नहीं करता है चारू के साथ। हिम्मत ही नहीं होगी उसकी। सुरभि कुछ कहती नहीं है तो क्या? उसे अच्छा तो एकदम नहीं लगता होगा। सॉरी बोल दूँगा।

आकाश में सूरज एकदम धीरे-धीरे सरक रहा था। भूख लग आई उसे। लेकिन खाने का मन नहीं हुआ। किचन में पानी पीने गया तो एक्वागार्ड खाली पड़ा था। जाकर बिस्तर पर लेट गया। बरसों बाद आज आँखों से आँसू छलक आए। तकिये में मुँह पोंछकर उसे पलट दिया। नींद आ गई।

किसी तरह रेंगता हुआ सूरज पश्चिम में अपने घर तक पहुँच गया।

डिंग डाँग…

विनय ने दरवाज़ा खोला। उसकी आँखों से बचते हुए सुरभि अंदर आई। पर्स और काग़ज़ की एक फ़ाइल सोफ़े पर रखकर कमरे में चली गई।

“तुम मुझे कुछ बताती नहीं हो आजकल। कहाँ चली गई थी इस तरह?” - विनय के मुँह से उन सारी बातों में से कुछ भी नहीं निकला जो उसने कहने की सोची थी।

“लॉयर के पास,” - हेयर पिन निकालते हुए सुरभि ने कहा। बंधन से मुक्त होकर काले घने बाल लहराते हुए उसके कन्धों पर बिखर गए।

विनय ने खिड़की से बाहर देखा दूर आकाश का रंग पीला हो रहा था।


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