अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
02.23.2015


जब तक निजी है पूँजी..

जब तक निजी है पूँजी दुखड़ा न ख़त्म होगा
लाखों बँटेगी दुनिया टुकड़ा न ख़त्म होगा

लिखेंगे कितने नग़्में नामानिगार जग में
रीतेंगे बन्द कितने मुखड़ा न ख़त्म होगा

जब तक ये धन औ धरती होगी नहीं इकठ्ठा
पिछड़ा न ख़त्म होगा अगड़ा न ख़त्म होगा

मेंड़ें कटेंगी प्रतिपल गर्दन कटेगी हरदम
दुनिया में सम्पदा का झगड़ा न ख़त्म होगा

जो जाल है बिछाया शासक ने उसको जानो
फंस कर मरेगी मक्खी मकड़ा न ख़त्म होगा


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें