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ISSN 2292-9754

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10.21.2014


विचारों के झरोखे से जीवनबोध
("मेरी जीवन-यात्रा" के विशेष संदर्भ में)

संपादक : सुमन कुमार घई
तिथी : नवम्बर 01, 2014

"मेरी जीवन-यात्रा" राहुल सांकृत्यायन की आत्मकथा है। यह आत्मकथा पाँच खंडों में विभाजित है। राहुल जी ने आत्मकथा के बहाने निजी जीवन संदर्भ में निहित विचारधाराओं की खोज की है। केदारनाथ पाण्डेय से राहुल सांकृत्यायन बनने की प्रक्रिया के पीछे सक्रिय विचारों को जानने का सलीका ही "मेरी जीवन-यात्रा" है। राहुल जी वैचारिक ढंग से निजी जीवन के विवरण और ब्यौरे लिखते समय युग भी व्यक्त करते हैं। इसी क्रम में उन्होंने आत्मकथा के फार्म को भी एक सिरे से परिभाषित किया है।

राहुल जी ने अपनी आत्मकथा को "मेरी जीवन-यात्रा" कहा है। वैसे तो प्रत्येक व्यक्ति जन्म से मृत्यु तक एक यात्रा करता है, वह एक बिन्दु से प्रस्थान कर दूसरे बिन्दु तक पहुँचता है। लेकिन राहुल जी का जीवन इस अर्थ में यात्रा है कि उनके जीवन का बहुत बड़ा अंश पर्यटन में बीता। उनका जीवन यात्राओं का ही एक सिलसिला बन गया।

अपनी आत्मकथा के आरंभ में ही उन्होंने लिखा है – "बेड़े की तरह पार उतरने के लिए मैंने विचारों को स्वीकार किया, न कि सिर पर उठाये-उठाये फिरने के लिए।"१ यह बुद्ध के इस कथन का हिंदी रूपान्तरण है "कुल्लुपम देसेस्यामि वो भिक्खवे धम्मं तरणत्याय नो गृहणव्यायङ । विचार को आत्मसात करने का यह तरीका, यह अंगार, जो राहुल जी को बुद्ध से मिला था - यह उनके संपूर्ण जीवन-यात्रा का निष्कर्ष है। यात्री के रूप में वे केवल ज़मीन के टुकड़े पर ही नहीं दौड़ते रहे, बल्कि विचारों के क्षेत्र में भी वे आजीवन यात्री रहे। वे कभी एक स्थान, सिद्धांत अथवा विचार पर स्थिर नहीं रहे। विशेष धर्म, पंथ, ग्रंथ के प्रति उनका आग्रह कभी नहीं रहा। यह उल्लेखनीय है कि एक पिछड़े हुए इलाके के पिछड़े ग्रामीण ब्राह्मण कुल में पैदा होकर उसकी सारी पुरानी परंपराओं से घिरे रहने के कारण भी राहुल जी में आखिरकार क्या जिज्ञासा थी, जो उनको सनातन धर्म से आर्य समाज की ओर ले गयी? उनकी जीवन-यात्रा उस द्वन्द्व और संघर्ष की कहानी है, जहाँ सनातनी संस्कारों से मुक्त होकर वे आर्य समाजी बन जाते हैं। फिर उसे छोड़ बौद्ध धर्म अपना लिया। बौद्ध धर्म भी जितनी दूर तक ठीक लगा उसे आत्मसात किया। बुद्ध से उन्होंने यह सीखा कि जो बेहतर हो उसे इस्तेमाल करो। वे फिर चीवर भी छोड़ कर कम्युनिस्ट हो गये। अपनी जीवन-यात्राओं में उन्हें जो मूल्यवान मिला, उसे संचित किया। इसलिए उनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व सदैव गत्यात्मक रहा है। राहुल जी के विचारों की यात्रा ही उनकी जीवन-यात्रा है, जीवन संघर्ष भी।

आत्मकथा में लेखक सभी स्मरण रहने वाले घटना प्रसंगों का बयान नहीं करता। वह केवल चुनिंदा घटना प्रसंगों को ही वर्णित करता है और इस चुनाव का मापदंड वर्तमान बोध होता है। वर्तमान बोध के आलोक में चुनी हुई अतीत की घटनाओं में अपना कलात्मक प्रतिभा के बल पर कार्य-कारण भाव स्थापित कर वह अपने व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया को दर्शाना चाहता है। राहुल जी अतीत में जब घटनाएँ जी रहे थे, तब वे सरयूपारीय ब्राह्मण कुल में जन्मे केदारनाथ पाण्डेय थे। लेकिन जब आत्मकथा लिख रहे हैं तो वे साम्यवादी राहुल हैं। साम्यवाद की रोशनी में ही वे अतीत के चीज़ों को खोलते हैं। लेखक दिखलाते हैं कि सामंती मूल्यों से लैस केदारनाथ पाण्डेय के व्यक्तित्व में कितनी खामियाँ थीं। उनके सामंती संस्कारों और सामंती मूल्यों में जकड़न था। "प्रथम उड़ान" अध्याय में वे बतलाते हैं कि कैसे कोलकाता में बिन्दा प्रसाद पाठक के प्रभाव में आकर एक सरयूपारीय ब्राह्मण के व्यक्तित्व में रूपांतर होने लगा! पहले तो अपने मित्र (बस्तीवाले देवता) के हाथों से बने पक्की रसोई थोड़े से मानसिक संकट के साथ ग्रहण करना शुरू किया। राहुल के शब्दों में "एक अज्ञात ब्राह्मण के हाथ का भोजन स्वीकार किया।"2 फिर बड़े चाव से पावरोटी खाना शुरू किए, जिसे वे "क्रिस्तानी" खाना समझते थे। आश्चर्य तो तब हुआ जब "पाठक जी ने हावड़ा पुल के पास ले जाकर पावरोटी की उन दुकानों को दिखलाया, जिनमें शंख से सफेद मोटे-मोटे जनेऊ पहिने बंगाली ब्राह्मण पावरोटी बेचा करते थे।"3 पूँजीवादी विकास के साथ सामंतवाद के ध्वस्त होने की प्रक्रिया से एक ठेठ ब्राह्मण को भी गुज़रना पड़ा, जिससे धीरे-धीरे ब्राह्मणवाद और सामंतवाद के प्रति उनमें मोहभंग हुआ। इस मोहभंग के पीछे पुराने विचारों को त्यागने की ऊर्जा और नये विचारों को आत्मसात करने की ललक ही राहुल जी में प्रमुख है, जो कि "विकास" का लक्षण है। उपर्युक्त सभी अतीत के घटनाओं का ज़िक्र व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया को दर्शाने के लिए किया गया है।

अतीत के इन सभी ब्यौरों में लेखक के वर्तमान बोध का अस्तित्व लुप्त नहीं होता। विगत बोध के साथ वर्तमान बोध भी सजग रहता है। राहुल जी वेदान्ती से शिवभक्त बने और उनका झुकाव तंत्र-मंत्र की ओर होने लगा। उन्होंने तंत्र साधना का प्रयास किया और उसमें असफल रहे। मंत्र साधना की व्यर्थता को देख राहुल जी में परिवर्तन आया। तत्पश्चात वे वर्तमान के वैचारिक झरोखे से स्वयं पर सवालिया निशान लगाते हुए कहते हैं – "धार्मिक वायुमण्डल में उड़ने के साथ ठोस पृथ्वी पर भी पैर रखना चाहिए, इधर भी मेरा ख्याल गया।"4 आत्मकथा में वर्तमान बोध हमेशा हावी रहता है। उनके वर्तमान का नज़रिया उन पुनरुत्थानवादियों से अलग है, जो आज भी परिवर्तन के रूप में एक पुनरुत्थान पेश करते हैं, चाहे वह आर्य समाज के रूप में या रामराज्य के रूप में पेश करते हैं। राहुल जी समाज परिवर्तन के लिए ऐसी विचारधारा के कायल नहीं हैं, जो दो कदम आगे बढ़ाकर चार कदम पीछे ढकेल दे। उनके लिए मार्क्सवाद ही ऐसी विचारधारा है, जो सामाजिक विकास में सक्षम है। हालांकि उन्होंने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में की। एकमा में "चर्खा खद्दर-प्रसार" एवं "माददक द्रव्य-निषेध" के आंदोलन में भाग लिया। सितम्बर 1921 में वे कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में छपरा के बाढ़-पीड़ितों की सहायता करते हैं। इस दौरान गांधीवादी उपचार की पहल की जाती है और पीड़ितों में चरखे-करघे बाँटने की योजना बनायी जाती है। लेकिन लेखक के साम्यवादी व्यक्तित्व का वर्तमान बोध यह जानता है कि पूंजीवादी समाज की सही समझ न होने के कारण गांधीवादी विचारधारा बुनियादी समाज परिवर्तन नहीं कर सकता। इसलिए वे "खद्दर अर्थशास्त्र" की सीमा बतला देते हैं।5 यहाँ यह समझने की ज़रूरत है कि आत्मकथा में विगत-बोध तथा वर्तमान-बोध सृजन के क्षणों में जुदा-जुदा नहीं रहते, बल्कि एक दूसरे में संयुक्त हो जाते हैं। इस प्रक्रिया का अंतिम परिणति वर्तमान-बोध को प्रभावशाली रूप में उभारने में सिद्ध होता है। राहुल जी वर्तमान के वैचारिक झरोखे से अपने अतीत में झाँकते हैं और खुद पर प्रश्न चिह्न लगाते हुए, आत्मलोचन करते हुए आगे बढ़ते हैं। इस तरह राहुल की आत्मकथा की प्रस्तुति में अतीत में "एक परफेक्ट वर्तमान" भी नज़र आता है।

यादा बेवाक तब होता है, जब सृजनात्मक लेखन कर रहा होता है और सबसे ज़्यादा संशय तब, जब आत्मकथा में सायास "सच" लिख रहा होता है। आत्मकथा सत्य की परीक्षा के लिए कसौटी होती है। इसलिए व्यक्तित्व अनुशीलन के लिए लेखक के साहित्यिक कृतियों के मुकाबले उनकी आत्मकथा ज़्यादा महत्वपूर्ण होती है। लेकिन आत्मकथा में सत्य की खोज इतनी आसान नहीं होती कि उसे खींच-तानकर एक दायरे में फिट कर दिया जाए। गेटे ने लिखा है – "आत्मकथा का जो सत्य है वह या तो तथ्य के साथ जुड़ा हुआ होता है या लेखक की अनुभूतियों से जुड़ा रहता है और अपने सही अर्थों में इन दो संबंधों के समन्वय से विकसित होता है।"6 यही कारण है कि सच बहुआयामी ही नहीं, सतत गतिशील और परिवर्तनशील होता है और बराबर पुनर्विश्लेषण की माँग करता है। यह पुनर्विश्लेषण वस्तुगत तथ्य और लेखक की अनुभूति के द्वन्द्वात्मक बोध पर निर्भर करता है। राहुल की आत्मकथा में यह सबसे बड़ी खूबी है कि वह वस्तुगत तथ्य और लेखकीय अनुभूति के द्वन्द्वात्मक रिश्ते से जुड़ी है। राहुल के पास तथ्यों को परखने की विश्वदृष्टि है। उनका यह व्यापक भावबोध ऐतिहासिक स्मृतियों को, निजी जीवन की अनुभूतियों और अनुभवों की कसौटी पर परखकर धीरे-धीरे निर्मित होता है। इसलिए आत्मकथा में सत्य और अनुभव का एक साथ बोध होता है।

संदर्भ-सूची

1. सांकृत्यायन, राहुल, "मेरी जीवन यात्रा", खण्ड-1, आधुनिक पुस्तक भवन, कलकत्ता, द्वितीय संस्करण, 2000, पृष्ठ- 3
2. वही, पृष्ठ-51
3. वही, पृष्ठ-55
4. वही, पृष्ठ-257
5. वही, पृष्ठ-355
6. "Truth belongs to all written accounts of one's life, either in relation to matters of fact or in relation to the feelings of the autobiographer and God willing in relation to both." ज्ञ् घ्Design and Truth in Autobiography" - Roy Pascal, page 68.

अरुण रजक
अरुण प्रसाद रजक
शोधार्थी, हिंदी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय
अतिथि प्रवक्ता, विद्यासागर विश्वविद्यालय, मेदिनीपुर


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