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ISSN 2292-9754

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09.06.2014


कवि रामविलास शर्मा की यथार्थ-दृष्टि

सम्पादक: सुमन कुमार घई
तिथि: ८ सितम्बर, २०१४

कविता में यथार्थ का वह स्वरूप जो वस्तुस्थिति का घृणित और नग्न रूप पाठकों के समक्ष रखे, कदापि अभीष्ट नहीं होता। यथार्थ अपने मूल रूप में परिवर्तन की ललक लिए उपजता है। रामविलास शर्मा परिवर्तनकामी यथार्थ के कवि हैं। ’संतरण’ कविता में उनका उद्घोष है, "हमें तो जाना है उस पार/जलधि में उठा हुआ तूफान/प्रबल बादल करता फूत्कार/तना है नभ में मेघ-वितान/चमकती चपला बारम्बार/कौन फिर जाएगा उस पार/हमें तो जाना है उस पार।"1

यहाँ कवि के माध्यम से संघर्षशील मनुष्य का संकल्प व्यक्त हुआ है। कवि के विचारों की ऊर्जा तथा उष्मा सहज ही हमें आज के वैचारिक टकराव और सामाजिक संघर्ष से सीधा साक्षात्कार कराती है। संघर्ष, क्रांति और परिवर्तन ही वह विकल्प व संकल्प है जिसका रास्ता मेहनतकशों और सर्वहारा जन की मुक्ति की तरफ जाता है। इस मूल प्रकृति और प्रवृत्ति की अवहेलना कर और उससे दूर जाकर कवि होना संभव नहीं।

रामविलास शर्मा अपनी कविता ’कार्यक्षेत्र’ में कहते हैं, "धरती के पुत्र की/होगी कौन जाति, कौन मत, कहो कौन धर्म?/धूलिभरा धरती का पुत्र है/जोतता है बोता जो किसान इस धरती को।"2 यह सौंदर्य-दृष्टि एवं मानवीय स्वर ही है, जो साहित्य-परंपरा में अविच्छिन्न रूप से न केवल विद्यमान है अपितु देश को थामे हुए है। ’तारसप्तक’ के कवियों के बीच रामविलास शर्मा पारदर्शी और मज़बूत रूप में दिखाई देते हैं। कलावाद और व्यक्तिवाद के बीच प्रगतिशीलता का अलख जगाते विरल कवि और नागरिक, जिन्हें अपनी धरती से अटूट प्रेम है, धरती के लिए प्रतिबद्ध विकलता है। वे न केवल उसमें लौटना-रमना चाहते हैं, वरन प्राथमिक दायित्व की भाँति उसे हिंसक आँखों से बचाना चाहते हैं। यथा "जोतनी है गहरी दो चार बार, दस बार/बोना महातिक्त वहाँ बीज असंतोष का/काटनी है नये साल फागुन में फसल जो क्रांति की।"3

’तार सप्तक’ (1943) के प्रकाशन के तेरह वर्ष बाद, सन् 1956 में उनकी कविताओं का एक स्वतंत्र संग्रह ’रूपतरंग’ नाम से प्रकाशित हुआ। इनका एक और काव्य-संग्रह है, ’सदियों के सोये जाग उठ’ (1988)। ’रूपतरंग’ में 1935 ई. से लेकर प्राय: 52-53 ई. तक की कविताएँ संकलित है। इस संग्रह की कविताओं में ग्राम जीवन का सौंदर्य नदी-नालों, पर्वतमालाओं, खेत-खलिहानों और आकाश-पाताल से संपृक्त है। ’चाँदनी’, ’शारदीया’, ’कतकी’, ’सिलहार’, ’कुहरे के बादल’ इत्यादि अनेकानेक कविताओं में इन्होंने प्राकृतिक सौंदर्य को अत्यंत विराट एवं सजीव रूप में उपस्थित किया है। उनके द्वारा चित्रित की गई प्रकृति अत्यंत गत्यात्मक एवं अनुभूतिपूर्ण है, "चाँदी की झीनी चादर-सी/फैली है वन पर चाँदनी/चाँदी का झूठा पानी है/यह माह-पूस की चाँदनी/खेतों पर ओसभरा कुहरा/कुहरे पर भींगी चाँदनी/आँखों में बादल-से आँसू/हँसती है उन पर चाँदनी।"4

रामविलास शर्मा के लिए सौंदर्य का सच्चा अनुभव अध्यात्म के घटाटोप में नहीं हो सकता। वह प्रकृति को सर्वात्मवादी चोला पहनाते हुए सौंदर्य की ’अनंत- झिलमिलाहट’ का भी आभास नहीं देते। उनका सौंदर्य प्रत्यक्ष जगत के अनुभवों, बिम्बों-चित्रों में रूपायित होता है। उनकी कविताओं में प्रकृति और मानव-जीवन के यथार्थ संश्लिष्ट रूप दिखलाई देता है। मसलन पूंजीवाद सर्वहारा वर्ग को चाँदनी-सी झूठे सपने दिखलाता है, लेकिन असल में वह सर्वहारा वर्ग के दु:ख पर हँसता है। उनकी गरीबी का मज़ाक उड़ाता है। पूंजीवाद की शानो-शौकत और उनके द्वारा दिखलाई गई चाँद-तारों की दुनिया सर्वहारा के लिए महज एक छलावा है। वह चार दिनों की चाँदनी के समान होती है। रामविलास शर्मा लिखते हैं, "दुख की दुनिया पर बनुती है/माया के सपने चाँदनी।"5 सर्वहारा एक दुख की दुनिया है, जिसके चारों तरफ पूंजीवाद माया का जाल बुनता है। लेकिन जब वास्तविकता का सूरज अगले दिन उगता है तो हर चीज़ अपने मूल-स्वभाव के साथ प्रकट होती है। "सूरज निकला, अब चाँद कहाँ?/ छिप गई लाज से चाँदनी/दुख और कर्म का यह जीवन/वह चार दिनों की चाँदनी।"6 पूंजीवाद का पर्दाफाश होते ही मेहनतकश संघर्ष में जुट जाते हैं। संघर्ष ही सत्य है और संघर्ष में ही जीवन की सच्ची खुशहाली निहित है। इसलिए "यह कर्म-सूर्य की ज्योति अमर/वह अंधकार थी चाँदनी।"7

रामविलास शर्मा का प्रकृति-सौंदर्य वस्तुगत यथार्थ से संबंधित है। उसका एक सामाजिक हस्तक्षेप है। उनके लिए सौंदर्य यथार्थ है और यथार्थ वह जो जीवन में घटित होता है। काव्य सौंदर्य मानवीय सुख-दुख और श्रम की परिणति है। चंद्रबली सिंह उनकी कविताओं के संबंध में लिखते हैं, "डाक्टर शर्मा की कविताओं में प्रकृति मानव के श्रम की सहचरी है। वह श्रम को निखारती है और उससे जुड़ी होने से स्वयं निखरती है। डॉक्टर शर्मा का यह दृष्टिकोण साधारण-जन का दृष्टिकोण है और प्रकृति-संबंधी अनेक दार्शनिक उद्भावनाओं से अधिक सहज और वैज्ञानिक है।"8 इसलिए उनकी कविता में किसान-जीवन और किसान-संघर्ष का महत्त्व है। ’दिवा-स्वप्न’ कविता में कवि प्रकृति को खेत और किसान की पृष्ठभूमि में ही देखता है, "वर्षा से धुलकर निखर उठा नीला-नीला/फिर हरे-हरे खेतों पर छाया आसमान/उजली कुँआर की धूप अकेली पड़ी हार में/लौटे इस बेला सब अपने घर किसान।"9 ’शारदीया’ कविता में भी खेत का सुखद वर्णन है। आकाश में सोने का रंग लिए शरद आ गया है। उसी की संगति में भुट्टे भी पक कर तपे हुए कंचन की तरह हो गए हैं और ’दाने चुगती हुई गलरियों को खड़ी’ देखने का सौंदर्य बेहतरीन है। "सोना ही सोना छाया आकाश में/पश्चिम में सोने का सूरज डूबता/पका रंग कंचन जैसे छाया हुआ/भरे ज्वार के भुट्टे पककर झुक गये/ ’गला-गला’ कर हाँक रही गुफना लिए/दाने चुगती हुई गलरियों को खड़ी/सोने से भी निखरा जिसका रंग है/भरी जवानी जिसकी पककर झुक गई।"10 संवेदना के सुखे दौर में यह पंक्तियां मीठे पानी की झील सी लगती है।

पूंजीवाद का डिजिटल सौंदर्य मानवीय संवेदना और श्रम की धार को कुंद करने की कुचेष्टा करता है। डॉ. शर्मा ने एक जगह लिखा है, "पूंजीवादी व्यवस्था श्रमिक जनता का आर्थिक रूप में शोषण ही नहीं करती, वह उसके सौंदर्यबोध को कुंठित करती, उसके जीवन को घृणित और कुरूप भी बनाती है।"11 आरंभ से ही रामविलास शर्मा ने अपनी कविताओं को भाववादी और पूंजीवादी तत्त्वों से बचाया है। उनके लिए सौंदर्य की उपज जीवन की अनुभूति और यथार्थ ही है। उन्होंने श्रम के सौंदर्यबोध को अपनी कविता की मुख्यधारा में स्थापित किया। ’रूपतरंग’ की कविताओं में सौंदर्य की एक वैचारिक ताजगी मिलती है, इसलिए वह मानवीय भूमिका पर लोकहितवादी चेतना की कविता है। ये मानवीय आस्था, जीवनबोध और मूल्यबोध के तलाश की कविताएँ हैं, जिनमें कराहती हुई मानवता की पीड़ा भास्वर हुई है। इस पीड़ा में श्रमरत एवं संघर्षरत आम आदमी की तस्वीर है जो मानवता के आधार पर विश्व-दृष्टि देने वाली पीड़ा है, साथ ही जन-जीवन का यथार्थ भी। यही नहीं कवि मानव-विरोधी हरकतों को समझता हुआ सामाजिक चेतना की सही भूमि भी तलाशता है।

संदर्भ सूची

1. शर्मा, डॉ. रामविलास, ’रूपतरंग और प्रगतिशील कविता की वैचारिक पृष्ठभूमि’, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1990, पृष्ठ- 49
2. वही, पृष्ठ-37
3. वही, पृष्ठ-38
4. वही, पृष्ठ-29
5. वही
6. वही
7. वही
8. सिंह, चंद्रबली, ’आलोचना का जनपक्ष’, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2003, पृष्ठ-180
9. शर्मा, डॉ. रामविलास, ’रूपतरंग और प्रगतिशील कविता की वैचारिक पृष्ठभूमि’, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1990, पृष्ठ- 32
10. वही, पृष्ठ-31
11. शर्मा, डॉ. रामविलास, ’नयी कविता और अस्तित्ववाद’, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 1993, पृष्ठ- 163

अरुण प्रसाद रजक
शोधार्थी, हिंदी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय
अतिथि प्रवक्ता, विद्यासागर विश्वविद्यालय, मेदिनीपुर
संपर्क - 20, पी. बी. एम. रोड, चाँपदानी
हुगली, पिन - 712222
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ईमेल - arunrajak30@ gmail.com


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