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ISSN 2292-9754

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10.11.2018


 पास बुलाते चीड़-देवदार

9 जुलाई 2017

ईमेल के साथ चीड़-देवदार की फैली बाँहों का सँदेसा मिला। आमंत्रण था -- महादेवी सृजन पीठ एवं कुमाऊँ विश्वविद्यालय,अल्मोड़ा द्वारा आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में अतिथि वक्ता के रूप में शामिल होने का। विषय था --हिंदी साहित्य -चेता, विलक्षण साहित्यकार 'अमृतलाल नागर का बाल साहित्य: सृजन और संदर्भ'। यह पहला विश्वविद्यालय है, जिसे भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा अमृतलाल नागर के संपूर्ण वाङ्ग्मय पर कई संगोष्ठी हेतु अनुमति और अनुदान मिला, और पिछले दो कार्यक्रम में किसी न किसी कारणवश आमंत्रण के बावजूद मैं जा नहीं पाई तो मन मसोस कर रह गई थी।

यों तो पहाड़ का कोई भी हिस्सा हो, जाने की योजनामात्र से ही मेरी बाँछें खिल उठती हैं और जब प्रेमपूर्वक आमंत्रण मिले तो पहाड़ के तन पर गदराए चीड़ और देवदार के संस्कार में पगे वहाँ के वासियों की आत्मीयता के स्मरण-मात्र से मन हुलस उठता है। सचमुच, सेवा और सत्कार का सही अर्थ सिखाता है पहाड़। आंतरिक ऊर्जा और दीप्ति का पर्याय चीड़ है तो देवतुल्य औदात्य,क्षमाशीलता और शीतलता का पर्याय है देवदार। फिर इनकी छत्रछाया में पले-बढ़े व्यक्ति का व्यक्तित्व कितना प्रकृतिप्रदत्त --कितना नैसर्गिक गुणों से युक्त होगा ! और यह तो वही बता सकता है जिसने अंतस्तल से महसूस किया हो।

6 जुलाई 2017 की रात को दिल्ली से रेलयात्रा आरंभ हुई।रानीखेत एक्स्प्रेस अपनी गोद में झुलाती हुई 7 जुलाई को सुबह 5 बजे काठगोदाम पहुँच गई। कई साहित्यकार साथियों के साथ स्टेशन से बाहर निकलते ही दाहिनी ओर खड़े पूर्वपरिचित पहाड़ ने अधखुली आँखों से निहारते हुए, मुस्कुराकर स्वागत किया। हवाएँ आ-आकर गले मिलीं और हमें साथ ले जाने आए ड्राइवर मोनू ने अभिवादन कर ऑल्टो की ओर इशारा किया। चंद क़दम आगे बढ़ते ही बादलों ने मधुर तान छेड़ी। टपाटप गिरती बूँदें देखते ही देखते झमाझम बारिश में तब्दील हो गईं। बूँदें मैदानी इलाक़ों में भी बरसती हैं किंतु वे अपने साथ प्रदूषित पदार्थ लाने को विवश होती हैं। पहाड़ी बूँदों के प्रति पुराना सखाभाव है। मैंने खिड़की का शीशा खोला और बचपन की सहेली-सी इन बूँदों ने झट से अंदर आकर मेरा चेहरा चूम लिया। आँख, नाक, गाल,कपोल, होंठ... सबकुछ! मैं भाव-विभोर हुई, उससे गुपचुप बतियाने लगी। मेरे साथ बैठी रचना इस स्नेहिल छुअन से अनजान हैरान होती रही कि मैं हल्के-हल्के भीगकर इतनी ख़ुश क्यों हो रही हूँ! दरअसल, बरसात के कारण पहाड़ के पोर-पोर में व्यापी पीड़ा से उठती टीस का पता तब तक नहीं चल पाता जब तक कोई भुक्तभोगी इसे उजागर न करे। जैसे, यह कोई नहीं जानता कि कब कोई बड़ा पत्थर लुढ़ककर सड़क पर आ जाए या मध्यम व छोटे पत्थरों की पूरी सेना सड़क पर उतर आए और आवागमन ठप्प कर दे; कब नल पानी देने से इनकार कर दे! बरसात के मौसम में रोज़मर्रे के काम में आने वाले पानी की कमी हो जाती है। जल-संसाधनों की ऐसी कोई समुचित व्यवस्था नहीं है कि इससे उबरा जा सके। चीड़ धुले-धुले से तो दिखते हैं, मगर अपने निवासियों के दैनिक जीवन में आए अवरोधों पर चुपचाप आँसू भी बहाते हैं।

बहरहाल, इन बातों से बेख़बर मैं अपनी ही धुन में बूँदों से बतियाती रही। तंद्रा तब टूटी जब ख़ुद को मल्ला रामगढ़ की सड़क पर पाया। ड्राइवर मोनू ने बताया, “खैरना वाला सीधा मार्ग अवरुद्ध हो गया है, इसलिए रामगढ़ होते हुए, यानी 20-25 किलोमीटर अधिक घूमते हुए अल्मोड़ा जाना होगा”। बूँदें तीव्र-लय-ताल में संगीत उत्पन्न करती रहीं। गाड़ी छोटी होने और तीन खाए-पिए घर के लोगों द्वारा विवशता में एक साथ बैठने और लंबे समय तक बैठे रहने के कारण घुटने और हाथ शिकायती मुद्रा में आने लगे। सबकी राय बनी कि कहीं चाय पी जाय, मगर बरसात के कारण दुकानदार घरों से निकलकर दुकान तक पहुँच नहीं पाए थे, सो, एक को छोड़कर सभी दुकानें ऊँघती-सी जान पड़ीं, यहाँ तक कि सुलभ शौचालय में भी ताला बंद! हमारे साथ चल रहे एक महाशय बेचैनी की हालत में गाड़ी से उतरे, चाय का ऑर्डर दिया और पुरुष होने का लाभ उठाते हुए आसपास ही कहीं हल्के हो लिए। फिर, राहत की साँस लेते हुए हम सभी को गाड़ी में ही चाय पहुँचा दी। चाय ख़त्म और आगे की यात्रा शुरू। रास्ता अचानक लंबा लगने लगा, समय की सूई तेज़ी से भागती रही, जबकि तेज़ बरसात में पहाड़ी रास्ते पर होने के कारण गाड़ी की गति कम रही। सभी को नियत समय पर संगोष्ठी में शामिल होने की चिंता सताने लगी।

भीमताल में बूँदों का नृत्य देखते ही बनता। मगर नौका-रहित इस ताल का सूनापन कहीं मन को कोंचता रहा। भवाली बाज़ार होते हुए मौना एवं अन्य क्षेत्रों से संबद्ध राहों ने चीड़ के हाथ हिला-हिलाकर हमारा अभिनंदन शुरू कर दिया। भवाली बाज़ार भी ख़ामोश रहा। सड़क दूर तक सूनी थी। उसपर हल्की कंपन भी हो रही होगी तो झमाझम गिरती बूँदों और हमारी गाड़ी की गति के कारण। उसके साथ रेस लगानेवाला दूसरा प्रतिद्वंद्वी सड़क पर नज़र न आया। नीचे चीड़...ऊपर चीड़ बीच में बनी सर्पाकार सड़क पर फिसलती हमारी गाड़ी और गाड़ी की खिड़की से झाँकती मैं। हम अल्मोड़ा प्रवेश कर चुके। लगभग हर जगह मेज़बान चीड़ ने आगवानी की। अल्मोड़ा में हमारे स्वागत हेतु देवदार भी मुस्कान बिखेरते नज़र आने लगे। जी चाहा, गाड़ी से उतरकर एक बार फिर लिपट आऊँ और पिछली यादें ताज़ा कर लूँ। उसे भी तो इंतज़ार होगा मेरे आने का! मगर तेज़ बारिश में गाड़ी से उतरने की साथियों की इज़ाज़त की गुंजाइश नहीं लगी। यो भी जान-बूझकर भीगे कपड़ों में होटल जाना साहित्यकारों के बीच मेरी असभ्यता का परिचायक होता, इसलिए मन मारकर, गाड़ी से ही पलकें झुकाकर देवदार की शृंखला को नमन किया।

होटल हिमाद्रि! मुख्य द्वार के बाहर मुस्कुराता देवदार! मैं चहक उठी। शुभ संयोग! देवदार के उन्नत मस्तक के पास वाला कमरा मुझे मिला। खिड़की का परदा हटाते ही चीड़ और देवदार से भरी पर्वत शृंखलाएँ, मंद-मंद मुस्कुराती दिखीं। जवाब में मैंने भी मुस्कुराहट भेंट दी।

महादेवी सृजन पीठ के चौकीदार बहादुर ने सूचना दी कि घंटे भर में तैयार होकर संगोष्ठी कक्ष पहुँचना है। सांसद एवं कवि श्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' द्वारा कार्यक्रम का उद्घाटन होना है। गाड़ी नीचे खड़ी मिलेगी। अरे, मैं तो ज़रा सुस्ताना चाहती थी! अब तो आनन-फानन में तैयार होना विवशता है। चाय पीकर हम तैयारी में लग गए और नियत समय पर संगोष्ठी कक्ष में पहुँच गए। संगोष्ठी कक्ष में डॉ. ममता पंत बेसब्री से मेरा इंतज़ार करती हुई मिलीं। ममता कुमाऊँ विश्वविद्यालय में प्राध्यापिका है, पिछली मुलाक़ात ने हमें परस्पर ऐसा जोड़ा कि मेरा आगमन सुनकर अपना सारा कार्यक्रम स्थगित करके मुझसे मिलने आ गई। अब घड़ी थी इंतज़ार की! इंतज़ार मुख्य अतिथि का! उफ़! कब बदलेगी हमारी नीति? ख़ैर, दो घंटे विलंब से आरंभ उद्घाटन सत्र के समापन के उपरांत हम शाहजी के 'निवेदिता हाउस' में गए, जहाँ मिस मारग्रेट दो माह रहीं। और जहाँ स्वामी विवेकानंद उसे इस बात से खिन्न जानकर कि उन्होंने उसे अबतक ईश्वर-दर्शन नहीं कराया, एक दिन स्वामी जी ने उसी मकान के आँगन में लगे देवदार के नीचे बैठी उदास मारग्रेट के सिर पर हाथ रखा और लगभग घंटे भर के लिए मारग्रेट समाधि अवस्था में पहुँच गई। समाधि से लौटने के बाद उनकी स्थिति विचित्र सी हो रही थी, आँख से अश्रुधार बह रही थी, उसी समय स्वामी जी ने उन्हें सिस्टर निवेदिता का नाम दिया। आज भी वह वृक्ष साक्षी बनकर खड़ा है और भगिनी निवेदिता की प्रतिमा स्थापित है। उनके कमरे में कैमरे से स्वामी जी की खींची गई तस्वीर, लैंप, आराम कुरसी, बिस्तर, अन्य कुर्सियाँ, एवं अन्य कई चीज़ें मौजूद हैं। सबसे अधिक सुखानुभूति उस दुर्लभ वस्तु को देखकर हुई - स्वामी जी के हाथ का लिखा पत्र, जो उन्होंने अपने मित्र स्वामी अखंडानंद को लिखा था। कमरे के बाहर स्वामीजी एवं अन्य संन्यासी भाइयों द्वारा उपयोग की गई बड़ी मेज़ भी मौजूद है।

इस यात्रा ने आनंद का एक नया द्वार खोला। निशंक जी द्वारा स्वामी विवेकानंद पर लिखित कृति भेंटस्वरूप मिली, कुछ पृष्ठ पढ़े और काकड़ीघाट जाने का निश्चय कर बैठी। विवेकानंद के वास्तविक चित्र का दर्शन कर मैं धन्य-धन्य हो उठी। स्वामी विवेकानंद बचपन से मेरे मार्गदर्शक रहे। बचपन से उनकी या उनसे संबद्ध पुस्तकें पढ़ती-गुनती रही हूँ।

दूसरे सत्र के समापन के कुछ पहले, जब सूरज अपनी सुनहरी किरणों की डोरी विश्वविद्यालय परिसर से समेटते हुए विदा होने लगा, तभी ममता ने मुझसे भावभीनी विदाई ली, विदाई से पहले यह वादा लिया कि मैं गोलू देवता के मंदिर अवश्य जाऊँ। मेरे प्रति ममता के स्नेह ने सोचने पर विवश कर दिया कि पास होने और साथ होने का अंतर क्या हर कोई समझ सकता है? ममता और मेरी पिछली मुलाक़ात मुश्किल से पाँच मिनट की रही होगी! जबकि कई लोग पूरे सत्र में मेरे पास बैठे थे। सच ही है, भावनात्मक संबंध अपने गमन के लिए राह निकाल ही लेते हैं।

सत्र की समाप्ति के पश्चात हम होटल लौटे। इस समय हमारे साथ थीं - दीक्षा जी। दीक्षा अमृतलाल नागर की पोती और शरद नागर की बेटी हैं। दीक्षाजी द्वारा अपने दादाजी के बाल रचनाओं के संबंध में कुछ नए पहलू उजागर करना, उनसे संबद्ध संस्मरण सुनना अद्भुत रहा। घर का वातावरण, तत्कालीन सामाजिक परिवेश और कुंठाग्रस्त परिवेश के बीच उजास भरे घर-परिवार में पलने-बढ़ने और समाज के प्रति नैतिक दायित्व का वहन करने के संस्कार। दीक्षा जी का बेटा नख-शिख तक भारतीय संस्कृति में पगा अमरीकी बालक है जो एक ऐसे परिवेश में पल रहा है जहाँ विश्व के कई देशों से वक़्त के सताए शरणार्थी अपना सब कुछ लुटने के बाद, जान बचाकर आए हैं, जहाँ भिन्न-भिन्न भाषा-भाषी के बीच संपर्क भाषा मानवीय संवेदना का है और जहाँ उसकी माँ दीक्षा, दिन रात ऐसे समाज के उत्कर्ष में संलग्न है। उसने देखा है माँ को पहाड़ की कठोर चट्टानों पर बागवानी कर फूल उगाते; उसे पुस्तकें लुभाती हैं, उसकी नन्ही उँगलियाँ तबले पर फिसलती है; उसे प्राणीमात्र से प्यार है… शायद मैं भावुक हो रही हूँ, शायद अंतस से यह दुआ कर रही हूँ कि हे प्रभु भारत में जन्मी हमारी नई पौध को भी ऐसे संस्कार से सींचने की शक्ति दो।

8 जुलाई का प्रथम और द्वितीय सत्र। बेहतर समापन! दीक्षा और उसके बेटे सिकंदर के साथ चल पड़ी हूँ चीड़ और देवदार से बातें करने। साथ होने और साथ रहने के अस्तित्व-बोध के साथ आरंभ हुआ हमारा साथ और अनौपचारिक संवाद- जैसा अक्सर वर्षों बाद मिली सहेलियाँ किया करती हैं। हाँ, लगभग सात घंटे के साथ ने हमें ऐसे ही संबंध से बाँध दिया था। दीक्षा जैसी सुलझी, विनम्र और विदुषी किंतु विद्वता के प्रदर्शन के तामझाम से कोसों दूर - नागर परिवार के संस्कारों को प्रतिबिंबित करती स्त्री की मैत्री इस यात्रा से होनेवाले बृहत्तर लाभों में से एक रहा। हम गोलू देवता के मंदिर (चकई में) गए। मैं पहले भी घोड़ाखाल में अवस्थित गोलू देवता के मंदिर जा चुकी थी। दीक्षा जी और उनके बेटे के लिए यह नया था। गोलू देवता का मंदिर अर्ज़ियों और घंटियों के मध्य समाविष्ट भक्तों की अनुपम आस्था का जीता-जागता दृश्य उपस्थित करता है। कुछ अर्ज़ियाँ सादे काग़ज़ पर तो कुछ दस रुपए के स्टाम्प पेपर पर। मन्नत पूरी हो जाने पर घंटी बाँधने की परंपरा। मैं घंटियाँ और अर्ज़ियाँ गिनना चाहूँ तो संभवत: 20 घंटे भी कम पड़ेंगे। यों भी जब घंटियाँ बाँधने की जगह नहीं बचती तो छोटी घंटियों को गलाकर एक बड़ा घंटा बनवा दिया जाता है। मैंने अपनों के निमित्त अर्ज़ी डाली। दीक्षा और उनका बेटा सिकंदर भावनात्मक रूप से इनसे जुड़ गए। हम शांत सुंदर वातावरण से आनंदित हुए, काकड़ीघाट की ओर बढ़े। काकड़ीघाट का वह स्थल, जहाँ पीपल वृक्ष के तले स्वामी विवेकानंद जी को प्रथम बार आत्मज्ञान हुआ था। वह वृक्ष तो नहीं रहा, मगर उसके ही बीज से उद्भूत पीपल का पौधा उसी जगह रोप दिया गया है। उस पुराने दिव्य पीपल-वृक्ष की विशाल और गहरी जड़ें अब भी मौजूद हैं। अब वे जड़ें देवत्व का प्रतीकस्वरूप हैं। कोसी की कलकल-छलछल करती धारा किनारे अवस्थित यह दिव्य स्थल पर्यटकों को कोसी के निकट जाने को प्रेरित करता है। फिर भला हम कैसे विमुख होकर लौटते! हम सब गए, उसका सान्निध्य पाने। हालाँकि बरसात के कारण जल मटमैला है, मगर यमुना की तरह गतिहीन नहीं, उसमें वेग है। हम हौले से पानी में उतरे। कुछ देर घुटने से नीचे के भाग को कोसी जल में निमग्न रखा; महसूस करते रहे वात्सल्य सुख... माँ की गोद का आनंद!

साँझ ढलने लगी। हमें कर्बला भी दर्शन हेतु जाना था। ऐसा कहा जाता है, शिकागो यात्रा के पूर्व काकड़ी घाट में आत्मज्ञान पाने के पश्चात स्वामी विवेकानंद जब ऊपर की ओर चढ़ाई कर रहे थे, तो कर्बला नामक जगह में अचेत होकर गिर पड़े थे, उस समय कब्रिस्तान के रखवाले फ़क़ीर जुल्फ़ीकार ने उन्हें खाने के लिए खीरा दिया और सेवा करके उन्हें स्वस्थ किया था। कालांतर में शिकागो यात्रा से लौटने के पश्चात स्वामी विवेकानंद ने एक सभा में आमंत्रित करके, उन्हें सम्मानित किया था। जब हम वहाँ पहुँचे, तब तक अँधेरा घुलने लगा था। मुख्य द्वार पर ताला बंद देखकर थोड़ा अफ़सोस हुआ। आसपास कोई व्यक्ति न होने के कारण हम उस पवित्र स्मारक का स्पर्श किए बिना, केवल नयन-सुख पाकर लौटने को विवश हुए, मगर हृदय अभिभूत रहा। जी में आया ज़ोर-ज़ोर से चीखकर कहूँ, ’मंदिर-मस्जिद के नाम पर मानवता की हत्या करने वाले हत्यारो! ज़रा यहाँ आकर देखो, महसूसो और स्वयं को अज्ञानता के अंधकार से उबारो! देखो, अँधेरे में भी दमकता मानवता का प्रतीक-चिह्न! श्वेत स्मारक!’

होटल-वापसी के दौरान हमारे परस्पर संवाद का विषय था- हमारा भारत, हमारी भारतीय संस्कृति और उसमें पगा समाज। मानवता और मानवीय संवेदना, जिसमें सकल विश्व पगा है और इस इस अनकही गूँज के सहारे हम आज भी मानने को बाध्य है कि 'विश्व एक परिवार है' - 'वसुधैव कुटुंबकम'। विश्व की असली तस्वीर वह नहीं जो बाज़ार या मीडिया दिखाता है- असली तस्वीर यह है कि विश्व के हर एक कोने में एक से घटनाक्रम अलग-अलग समय में घटित होते हैं। भिन्न-भिन्न देशों में समान मानसिकता के लोग देखे जा सकते हैं। यह भी अनुभूत किया जा सकता है कि उनकी समस्याएँ, उनके संघर्ष, उनकी संवेदनाओं का आरोह-अवरोह लगभग समान है।

9 जुलाई। हमारे प्रस्थान का समय! अल्मोड़ा को शुभ विदा कहने का समय! दीक्षा जी से जल्दी-जल्दी बहुत सी बातें कर, उनसे विदाई माँगने और उन्हें भी ’शुभ यात्रा’ कहने का समय! और होटल के बाहर खड़े, मेरे कमरे में झाँकते चीड़-देवदार से फिर मिलने का वादा करते हुए बिछड़ने का समय आ ही गया। वेटर प्रदीप, जो पास के गाँव का वासी है, अल्मोड़ा डिग्री कॉलेज में पढ़ाई कर रहा है और ख़र्च चलाने के लिए नौकरी भी करने को विवश है, उसे वर्तमान और भविष्य की पढ़ाई हेतु सहयोग करने का स्वैच्छिक वादा करके, उसकी आँखों में आत्मीयता की नमी महसूसती हुई मैं गाड़ी में जा बैठी। पीठ के सदस्य विदाई हेतु खड़े मिले- हर बार की तरह इस बार भी पहाड़ से ढेर सारा प्यार बटोरकर विदा हो रही हूँ। गाड़ी ने गति पकड़ ली है। मोनू कुशल ड्राइवर है। काठगोदाम स्टेशन सामने है। ...मैंने शताब्दी में अपनी सीट ले ली है। चेयर कार में आँखें बंद किए हुए इस यात्रा को गुन रही हूँ तो बेहतर कार्यक्रम के अतिरिक्त मिलने वाले अतिशय लाभांश के रूप में स्वामी विवेकानंद से संबद्ध अनुभूतियाँ और इन अनुभूतियों में मिश्रित दीक्षा नागर के आत्मीय साथ की ख़ुशबू मेरे चारों ओर फैल रही है, फैलती जा रही है....। शताब्दी चल रही है, स्मृतियाँ जाग्रतावस्था में मेरे साथ-साथ चल रही हैं और चल रही है क़लम… यात्रा ज़ारी है...।


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