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ISSN 2292-9754

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06.19.2017


गुड़िया

कल शाम
खिलौनों के कबाड़ में
टूटे–फूटे खिलौनों के बीच
तुड़ा-मुड़ा, सिमटा-सा
मेरा बचपन
मुझे मिल गया
और मैं
उसे ओढ़ कर
फिर से,
उछलती-कूदती
नृत्य करती
जीवंत गुड़िया बन गई।


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