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07.02.2014


संदेश

इस दुनिया में आए हैं तो
रिवाज़ निभाने होंगे
माँ - बाप, अज़ीज़ के सपने
साकार भी करने होंगे।

सोचा था ब्रह्मचर्य का पालन करूँगी मैं
सुष्मिता की तरह
अनाथ बच्चों को गोद लूँगी मैं,
पर हो न सकी ये तमन्ना भी पूरी
चढ़नी पड़ी मुझको भी सूली ।
दुनियादारी के चक्‍कर में
पड़ने की थी बड़ी मज़बूरी
शादी के फेरे मुझको भी लेने पड़ गये ज़रूरी।
शादी के बाद बच्चे और बच्चों का ये सिलसिला
बन गया हँसता रोता, सिरफिरों का काफ़िला।

किसे संभालूँ, किसको पटकूँ,
किसको दूँ एक झापड़,
कोई माँग रहा लड्डू - बर्फी
कोई माँग रहा पापड़।
अरे चुन्नू - मुन्नु, गोलू के अब्बा
ज़रा तो हाथ बटाओं,
चिंटू का होमवर्क करो,
मिन्टू को शू शू कराके लाओ।

सास - ससुर भी मुँह बाए
माँग रहे हैं खाना,
हाय री किस्मत घर में अन्न का
एक नहीं है दाना।
देवर भी तो भटक रहा है
नौकरी की तलाश में,
ननदो रानी फेल हो गई
चौथी बार क्लास में।

हाय रे तौबा किस मुहूर्त में
खाया था हौआ ने सेब,
न होती इतनी लटपट झटपट
न होते इतने मेल।
गर जनसंख्या इसी दर से
बढ़ती रही खूब,
बेरोज़गारी, भुखमरी की
जड़े होगीं मज़बूत।

यदि प्रकृति बची रही
और जीवन भी चलता जाए,
तो याद रहे एक से ज्यादा
बच्चे न होने पाए।


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