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11.19.2007
 

जब से आबाद है लहूखाना
आरिफ़ हुसैन "अफ़सर"


जब से आबाद है लहूखाना
मैकदा हो गया है वीराना

पेट की भूख सब को है मालूम
रूह की भूख से है अनजाना

कितना आसां है दर्स औरों को
कितना मुश्किल है खुद को समझाना

जा चुके हैं हकीकतों से दूर
रह गया निस्बतों पे इतराना

मैकशी को बुरा बताते हैं
और खोले हुए हैं मयखाना

शर के कामों में शर्म कर "अफ़सर"
नेक कामों में कैसा शर्माना

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