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ISSN 2292-9754

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11.30.2018


दूसरी औरत से प्रेम

वो जो चली गयी है अभी अभी तुम्हें छोड़कर,
है बड़ी हसीन!
जैसे नए बुनकर की उम्मीद,
उँगलियों से बुने महीन सूत के जोड़ सी।
जब भी तुम चूमना चाहते हो मुझे,
उसके होंठ.....
मुझे तुम्हारे होठों पर नज़र आते हैं;
और उसके गालों का गुलाबीपन .....
छा जाता है मेरे वजूद पर.
उसके इत्र की ख़ुशबू .......
कमबख़्त जाती ही नहीं इस कमरे से।
जब भी थामना चाहती हूँ तुम्हारा हाथ........
उसकी नाज़ुक उँगलियाँ
मेरे तन में सरगम छेड़ देती हैं।
वो हार तो गयी है मुझसे ....
हमारे जायज़ रिश्ते को बचाने के लिए;
पर मै उसके प्रेम में गुम सी गयी हूँ।


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