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ISSN 2292-9754

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06.14.2016


आधुनिक भारत में जाति

पुस्तक का नाम: आधुनिक भारत में जाति (Cast in Modern India and Other Essays, 1962)
लेखक: एम.एन.श्रीनिवास
अनुवादक: रश्मि चौधरी
प्रकाशन: राजकमल प्रकाशन
1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग
नई दिल्ली-110002
पहला संस्करण: 2001
पहली आवृत्ति: 2009
मूल्य: 200/-
पृष्ठ: 180
ISBN: 978-81-267-0125-4

"आधुनिक भारत में जाति’" पुस्तक एम.एन. श्रीनिवास द्वारा लिखित ‘कास्ट इन मॉडर्न इंडिया’ का रश्मि चौधरी द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद है। इसे राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया है। सन 2001 में इसका पहला संस्करण प्रस्तुत किया गया।

इस पुस्तक में शामिल किए गए लेख सन 1952-60 के बीच लिखे गए थे। इनमें से हर-एक लेख किसी-न-किसी संगोष्ठी, परिसंवाद अथवा किसी विद्वतापूर्ण प्रकाशन के विशेष आग्रह और आमंत्रण के जवाब में ही लिखा गया था। ये लेख विभिन्न मुद्दों से संबन्धित हैं और ये आठ सालों की अवधि में लिखे गए थे। श्रीनिवास का मानना है कि इतने लंबे अंतराल के कारण विचारों में बदलाव आना तो स्वाभाविक है परंतु उन्होंने थोड़े बहुत शाब्दिक परिवर्तन के अतिरिक्त किसी अन्य फेर-बदल से ख़ुद को दूर रखा है।

इस वाक्यखण्ड में श्रीनिवास द्वारा लिखे गए लेख ‘आधुनिक भारत में जाति’ का विवेचन है जिसमें उनका उद्देश्य जाति व्यवस्था में हो रहे परिवर्तनों और उसके नए क्षेत्रों को तलाशना था। उनका मानना था कि अँग्रेज़ों ने जिस तरीक़े से भारतीयों को राजनीतिक सत्ता हस्तांतरित की, उससे जातिवाद को राजनीतिक धरातल में पैठ बनाने में मदद मिली। आज़ादी के बाद पिछड़े तबकों को संवैधानिक सुरक्षा के प्रावधानों ने भी जातिवाद को नवजीवन प्रदान किया है। अँग्रेज़ों के आने से पूर्व यहाँ जो राजनीतिक व्यवस्था क़ायम थी उसमें सभी जातियों में सहयोग की भावना निहित थी। व्यवसायगत विशिष्टता ने भी उन्हें परस्पर निर्भर रहने के लिए मजबूर किया क्योंकि हर जाति अपनी आजीविका के लिए हर दूसरी जाति पर आश्रित रहती थी। अंग्रेज़ी शासन में समूचे भारत में सड़कों के निर्माण, रेलवे, डाक, तार, सस्ता काग़ज़ और छपाई (विशेषकर क्षेत्रीय भाषाओं में) आदि की शुरूआत ने जाति को संगठित करने में एक अहम भूमिका निभाई थी। रेलवे की सहायता से एक जाति के सदस्य आसानी से एक जगह जमा हो सकते थे, जातियों के हितों के अनुसार जातिगत पत्रिका का प्रकाशन किया जा सकता था। परंतु इसके विपरीत जातिगत विवादों को दर्ज कराने भी अब आसान हो गए थे। रेलवे और कारखानों के खान-पान ने छुआछूत संबंधी नियमों को आंशिक रूप से प्रभावित किया। अंग्रेज़ी शासन से उत्पन्न आर्थिक शक्तियों के परिणामस्वरूप जाति व्यवस्था में गतिशीलता अवश्य आयी है। उड़ीसा के एक गाँव बिसिपाड़ा में एफ.जी. बेली का अध्ययन तत्कालीन बंगाल सरकार की शराब-बिक्री से संबन्धित नीति के पश्चात दो नीची जातियों बोड और गंजम की स्थिति में परिवर्तन पर आधारित था। परिणाम यह हुआ कि शराब बनाने वाली गंजम जाति अपने को सामाजिक संस्तरण में ऊपर उठाने में सफल हो गयी जबकि चमड़े का व्यापार करने वाली, अछूत बोड जाति के उच्च जाति के किए गए दावे का विरोध किया गया। (श्रीनिवास, 2001:25) श्रीनिवास का यह भी मानना है कि एक दावा जो एक क्षेत्र-विशेष अथवा समय-विशेष में स्वीकार कर लिया गया है, बाद में किसी और जगह अस्वीकार भी किया जा सकता है। वहीं अछूत समुदाय का संस्कृतिकरण चाहे कितना भी व्यापक और गहरा क्यूँ न हुआ हो, वे स्पृश्यता की दीवार को कभी लाँघ नहीं पाते। अंग्रेज़ी शासन ने कभी-कभार निचली जातियों के लिए आर्थिक लाभ का प्रावधान भी किया पर उसका लाभ उन्हीं निचली जातियों को हुआ जो श्रेणीक्रम में पहले से ऊपर मौजूद थीं। ऊँची जातियों के व्यवसाय संबंधी निषेधों ने उनको विभिन्न प्रकार के कारोबारों व आर्थिक लाभों से वंचित रखा। उच्च जातियों के सक्षम होने के कारण पश्चिमी शिक्षा मे उन्हें नए अवसर प्रदान किए। पूर्ववर्ती सुविधासंपन्न जातियों के सदस्य ही क्लर्क, स्कूलमास्टर, अधिकारी, वकील और डॉक्टर बने। वहीं वैश्य अंग्रेज़ी शासन के व्यापारिक अवसरों का लाभ उठाने में सफल रहे। नए बुद्धिजीवी वर्ग का ज़्यादातर हिस्सा मूलतः तीज जातियों से उभर कर सामने आया और राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व मुख्यतः इन्हीं के कंधों पर आया। इसमें कोई संशय नहीं है कि अंग्रेज़ी शासक उन्हें नापसन्द करते थे। अंग्रेजों द्वारा निचली जातियों को प्राथमिकता देने की नीति मानवतावादी दृष्टिकोण से प्रभावित तो थी ही पर साथ-साथ उसने ऊँची और निचली जातियों के बीच दीवार और ऊँची कर दी। नए संदर्भ में दक्षिण भारत का ग़ैर-ब्राह्मणवादी आंदोलन भी क्रियाशील था जिसके संस्थापक पुना के माली जाति के ज्योतिबा फुले थे। इन्होंने 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की जिसका मूल उद्देश्य जात-पांत पर विचार किए बिना मानव-मात्र की गरिमा को स्थापित करना था। उन्होंने ग़ैर-ब्राह्मणों से आग्रह किया कि वे ब्राह्मणों को अपने यहाँ कर्मकांड संपादित करने के लिए न बुलाएँ। उन्होंने शिक्षा कि आवश्यकता को महसूस करते हुये 1848 में ग़ैर-ब्राह्मणों के लिए एक स्कूल खोला। मौरिन पैटरसन ने महाराष्ट्र की राजनीति में अंतर्निहित जातीय शक्तियों के प्रभाव का विश्लेषण अपने लेख ‘कास्ट एँड पॉलिटिक्स इन महाराष्ट्र’ में किया है और तीन प्रमुख जातियों- ब्राह्मण, मराठा और महार की भूमिकाओं की चर्चा की है। (वही, 2001:31) महाराष्ट्र में ब्राह्मणों ने अपना पश्चिमीकरण सबसे पहले किया। इस क्षेत्र की आबादी का केवल 4 प्रतिशत ब्राह्मणों का है, मराठे 25 प्रतिशत, कुनबी 8 प्रतिशत (जो मराठा होने का दावा करते हैं) और महार 10 प्रतिशत हैं। महाराष्ट्र में 1936-37 के चुनावों में कांग्रेस को सफलता प्राप्त हुई और ग़ैर-ब्राह्मण दल के उम्मीदवार बुरी तरह से पराजित हुये। महात्मा गांधी (स्वयं ग़ैर-ब्राह्मण होने के कारण) के हाथों में कांग्रेस का नेतृत्व होने के कारण आंशिक रूप से ग़ैर-ब्राह्मणों का समर्थन प्राप्त था। श्रीनिवास के अनुसार आधुनिक मैसूर में भी जातिवाद चारो तरफ़ फैला हुआ है। यहाँ पर कांग्रेस की दो प्रमुख कृषक जातियाँ छाई हुई हैं- लिंगायत और ओक्कालिगा। ओक्कालिगा इस बात से डरते हैं कि मैसूर कुर्ग, दक्षिण कनारा तथा मद्रास, हैदराबाद और मुंबई के कन्नड-भाषी इलाक़ों को लेकर बनाए जाने वाले विशाल कन्नड राज्य में लिंगायत उन पर हावी हो जाएँगे। इसलिए वे चाहते थे कि मैसूर एक अलग राज्य ही बना रहे। उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों में ज़मींदारी उन्मूलन का असर कुछ यह पड़ा है कि उत्तर प्रदेश और मध्य भारत में बड़े पैमाने पर डकैतियाँ होने लगीं। उत्तर प्रदेश के डाकू गिरोह में ज़्यादातर ठाकुर, मल्लाह और गुजर जाति के लोग हैं और उनका सहयोग प्रायः उनकी जातियों की ओर से उन्हें प्राप्त होता था। पंजाब में झगड़ा दो जाति प्रथाओं- हिन्दूओं और सिखों के बीच है। इस संघर्ष ने भाषायी चोला पहन रखा है। पंजाब में भाषा की समस्या दरअसल लिपियों की समस्या है। सिख लोग गुरुमुखी लिपि चाहते हैं जबकि हिन्दू देवनागरी लिपि के पक्षधर हैं। राज्य पुनर्गठन आयोग ने सिखों के पंजाबी-भाषी राज्य और हिंदुओं के महापंजाब राज्य की स्थापना की दोनों माँगों को ठुकरा दिया। भारतीय संविधान ने जाति की खाई को पाटने हेतु प्रयास अवश्य किए हैं। उसके अनुसार किसी भी रूप में अस्पृश्यता बरतना मना है इसके अतिरिक्त अनुसूचित जातियों को वैधानिक सुरक्षा, आरक्षण इत्यादि का प्रावधान है। किन्तु इसके विपरीत यह बात दिन-प्रतिदिन और अधिक महसूस की जा रही है कि ये समतवादी क़दम कहीं ख़ुद ही जाति प्रथा की बुराइयों को चिरस्थायी न बना दें।

इस लेख में श्रीनिवास ने संस्कृतिकरण और पश्चिमीकरण की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की है। संस्कृतिकरण की अवधारणा को श्रीनिवास ने अपनी पुस्तक ‘रिलीजन एँड सोसाइटी एमंग कुर्ग्स ऑफ साउथ इंडिया’ मे प्रस्तुत किया है। संक्षेप में निचली जातियों का द्विज जातियों की जीवनशैली को अंगीकार करना ही संस्कृतिकरण है। दक्षिण भारत के लुहार अपने को विश्वकर्मा ब्राह्मण मानते हैं। वे जनेऊ भी पहनते हैं और अपने धार्मिक अनुष्ठानों का भी संस्कृतिकरण कर चुके हैं। परंतु कुछ अब भी मांस और मदिरा का सेवन करते हैं। साधारणतः कहा जाय तो श्रेणीक्रम में ऊपरी जातियाँ अपेक्षाकृत अधिक संस्कृतिनिष्ठ हैं और यही बात निचली जातियों और जनजातियों को संस्कृतिकरण के लिए प्रेरित करता है। कभी-कभी हमें ऐसी जातियाँ मिलती हैं जिन्हें आर्थिक और राजनीतिक शक्तियाँ तो प्राप्त थीं पर धार्मिक अनुष्ठानों में उनकी स्थिति निम्न थी। इन दशाओं में संस्कृतिकरण एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। ग़ैर-ब्राह्मण जातियों ने न केवल ब्राह्मणवादी कर्मकांड अपनाए बल्कि उनके जीवन मूल्यों और प्रथाओं को भी अपनाए हैं। इस प्रक्रिया में ब्राह्मणों की रीतियों के साथ-साथ ग़ैर-ब्राह्मण जातियों ने उनकी कुरीतियों- बल विवाह, विधवा पुनर्विवाह निषेध, महिलाओं के लिए कठोर नियमों का प्रावधान इत्यादि का भी अंगीकार किया। ब्रिटीशकाल में यातायात के विकास, रेडियो, प्रेस, रेलवे, हवाई जहाज़ आदि से संस्कृतिकरण के प्रसार को और भी तूल मिला। वहीं पश्चिमीकरण की प्रक्रिया में पश्चिम का अनुकरण करने वाली ऊँची जातियों ने उन आदतों और रीति-रिवाज़ों को अपनाना शुरू कर दिया जिन्हें वे स्वयं पहले हेय दृष्टि से देखते थे। फलस्वरूप ऊँची जातियों की बुराइयों को पूरे समाज में दोष के रूप में देखा जाने लगा। जहाँ एक तरफ़ ब्राह्मणों के पश्चिमीकरण ने पूरे हिन्दू समाज के पश्चिमीकरण को संभव बना दिया वहीं स्वयं ब्राह्मण पश्चिमीकरण के कुछ पहलुओं- अंग्रेज़ी खान-पान, पहनावे, छुआछूत के विचार से मुक्ति आदि को स्वीकार करने में कठिनाई महसूस कर रहे थे। मैसूर के ब्राह्मणों के जीवन में पश्चिमीकरण से कई परिवर्तन आए- चुटिया की जगह छँटे हुये बाल, परंपरागत पोशाक की जगह कम-से-कम आंशिक रूप से पश्चिमी तौर-तरीक़े के वस्त्र और जूते, गोबर से लीपकर ज़मीन पर भोजन करने के स्थान पर मेज़ पर भोजन। कुछ प्रतिबंधित सब्जियाँ-प्याज, आलू, गाजर, मूली और चुकंदर भी खाने में शामिल हो गईं। कई तो अब स्वास्थ्य लाभ के लिए कुछ अंडा और पशुओं के विभिन्न अंगों से बनी दवाइयों के सेवन से भी परहेज़ नहीं करते। हालाँकि मांसाहार अभी भी कम है। ब्राह्मणों ने कई नए काम-धंधे भी अपना लिए हैं। कई ब्राह्मण फौज में भी भर्ती हुये हैं जिससे उनके दृष्टिकोण और आदतों में भारी परिवर्तन आया। अब तो कुछ ऐसे शिक्षित ब्राह्मण भी हैं जिनके अपने विशाल मुर्गी पालन केंद्र हैं। करीब सत्तर साल पहले मैसूर के कुछ ब्राह्मणों में वधू मूल्य चुकाने की प्रथा मौजूद थी परंतु पश्चिमीकरण के साथ-साथ नौकरीपेशा शिक्षित युवकों की माँग बढ़ती चली गयी और परिणामस्वरूप दहेज का चलन बढ़ता चला गया। बाल विवाह का प्रचलन कम हुआ। श्रीनिवास के अनुसार संस्कृतिकरण एक दोहरी प्रक्रिया है। इसने जितना स्थानीय संस्कृतियों को दिया है उससे कहीं ज़्यादा लिया है। इस संबंध में मैकिम मरिएट ने किशनगढ़ी में अध्ययन के अनुसार अपने विचार व्यक्त किए हैं- वृहत परंपरा के स्वीकृति की प्रक्रिया में स्थानीय तत्वों का समावेश स्वाभाविक है। इस प्रक्रिया को उन्होंने स्थानीयकरण का नाम दिया है। (मैरिएट, 1955) श्रीनिवास का मानना है कि यह आवश्यक तथ्य नहीं है कि पश्चिमीकरण सदैव संस्कृतिकरण के बाद की प्रक्रिया है। यह भी संभव है कि संस्कृतिकरण की प्रक्रिया से गुज़रे बिना भी पश्चिमीकरण हो जाए। संस्कृतिकरण एक अत्यंत जटिल और विषम अवधारणा है अथवा इसे अवधारणा मानने के अलावा समुच्चय भी माना जा सकता है। जिस पल ऐसा लगे कि संस्कृतिकरण व्यापक संजीक व सांस्कृतिक प्रक्रिया के विश्लेषण में मदद करने के बजाय रोड़ा अटका रही है, इसे जल्द-से-जल्द और बिना किसी पछतावे के तुरंत छोड़ देना चाहिए। (श्रीनिवास, 2001:68)

इस लेख में जाति के वास्तविक स्वरूप और वर्ण की पारंपरिक अवधारणा में सम्मिलित स्वरूप के बीच संबंध पर विचार किया गया है। साधारणतः वर्ण का आशय ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र से लगाया जाता है। इनमें से प्रथम तीन जातियाँ द्विज जातियाँ हैं जो उपनयन के वैदिक संस्कार द्वारा जनेऊ धारण के अधिकारी हैं। वर्ण का शब्दशः अर्थ रंग है जो मूलतः आर्य और दास के बीच भेद बताता है। घुरिये के अनुसार ऋग्वेद में आर्य और दास के बीच अंतर के साथ-साथ समाज का भी तीन श्रेणियों में विभाजन बताया गया है- ब्रह्म, क्षत्रिय और विश। बहुत बाद के एक प्रख्यात स्त्रोत पुरुषसूक्त में आदिपुरुष के बलिदान से समाज की चार श्रेणियों के उद्भव का संदर्भ मिलता है- ब्राह्मण, राजन्य (क्षत्रिय), वैश्य और शूद्र। जो क्रमशः ब्रह्मा के मुख, भुजाओं, जंघाओं और पैर से उत्पन्न माने गए हैं। वेदों की वर्ण व्यवस्था में अछूतों का कोई स्थान नहीं है लेकिन वैदिक साहित्य में आयोगव, चांडाल, निषाद और पौलकस जैसे समूहों का उल्लेख मिलता है जो वर्ण व्यवस्था के बाहर और तिरस्कृत थे। वर्ण व्यवस्था दरअसल समाज के विभाजन को मोटे तौर पर दर्शाती है। श्रीनिवास के अनुसार राजगोण्डों (शूद्र जाति) जो एक क़बीले का शासक बनने के बाद क्षत्रिय कहलाने में सफल हो गए। यह वर्ण विभाजन की कमज़ोरी को प्रकट करता है। श्रेणीक्रम में प्रत्येक जाति की विभिन्न स्थानों मे क्या स्थिति है यह कहना थोड़ा मुश्किल है। पर सामान्यतः देश के अधिकांश भागों में ब्राह्मण उच्चतम स्थान पर हैं और शूद्र निम्नतम। संस्तरण का निर्धारण भोजन के प्रकार, व्यावसायिक संलग्नता, धार्मिक अनुष्ठानों आदि कारकों द्वारा होता है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि वर्ण व्यवस्था ने जाति व्यवस्था को समझने के लिए एक सीधा और सरल मार्ग प्रशस्त कराया है।

इस देश में बहुत थोड़े से लोग ही जाति व्यवस्था के समाप्त होने की कामना करते हैं जबकि आबादी का ज़्यादातर हिस्सा इसके विपरीत है। गाँव में जातियाँ जजमानी प्रथा के माध्यम से एक-दूसरे पर आश्रित होती थीं। सभी की अपनी निष्ठा थी, सभी के अपने प्रभाव थे। जातियों की क्षैतिज एकता और अन्य तत्वों (जैसे ब्राह्मणों या उच्च जातियों का नई नौकरियों पर लगभग एकधिकार होना) का विभिन्न जातियों के बीच तनाव बढ़ाने में योगदान रहा है। सवर्ण हिंदुओं और हरिजनों के बीच पहले से मौजूद दीवार अब राजनीतिक क्षेत्र में भी खड़ी हो गयी।

आज भारत के गाँवों में बदलाव आ आ रहे हैं। सर चार्ल्स मेटकाफ के अनुसार "ग्राम समुदाय छोटे-मोटे गणराज्य हैं जिनमें उनकी ज़रूरत भर की सभी चीज़ें हैं और विदेश-सम्बन्धों से लगभग मुक्त हैं।" (मेटकाफ, 1832) श्रीनिवास के अनुसार ये मिथक है कि भारतीय गाँव पारंपरिक रूप से आत्मनिर्भर छोटे गणतन्त्र होते थे। (श्रीनिवास, 2001:86) ब्रिटिश-पूर्व भारत के गाँवों की विशेषता थी यहाँ की चारों ओर फैली राजनीतिक अस्थिरता। राजनीतिक व्यवस्था में सबसे निचली इकाई गाँव का प्रमुख होता था और उसके ऊपर कई गाँवों का मुखिया होता था। मुखिया के ऊपर राजा होता था जो किसी सम्राट या प्रतिनिधि के अधीन होता था। व्यक्तियों के बीच का संबंध रिश्तेदारी के अलावा आर्थिक, राजनैतिक और धार्मिक आधार जैसे अनेक बंधनों से जुड़ा होता था। स्कारलेट ट्रेंट ने 1954-56 में दो गाँवों का अध्ययन किया। उनमें से एक गाँव मनहल्ली, चीनी कारखाने वाले शहर मांड्या से पाँच मील दूर है। 1939 से पहले जहाँ केवल 12 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि की सिंचाई हो पाती थी वहीं नहर द्वारा सिंचाई होने से 76 प्रतिशत भूमि की सिंचाई होने लगी थी। मनहल्ली के लिए गन्ना एक नई फसल थी और इसकी खेती ने बहुत सारी नई और कठिन समस्याओं को जन्म दिया। इसकी खेती में 18 महीने का समय, जटिल तकनीकों का उपयोग, ज़्यादा पूंजी की आवश्यकता इत्यादि समस्याएँ किसानों के समक्ष खड़ी थीं। नहर सिंचाई व्यवस्था शुरू होने से पहले सभी कृषक मज़दूरों को अन्न के रूप में वेतन दिया जाता था। हालाँकि गन्ने के खेत में काम करने वालों को नकद मज़दूरी मिलती है। नकदीकरण से ख़ुदरा व्यापार को बढ़ावा मिला। 1931 में मांड्या एक 5,958 की जनसंख्या वाला शहर था जबकि 1951 में इसकी जनसंख्या 21,158 हो गई। चीनी कारखाने में 1000 लोगों को रोज़गार मिला। इस क्षेत्र में कारखानों की सफलता से यहाँ औद्योगिकीकरण और शहरीकरण की प्रक्रिया को और गति मिली। मांड्या को जब एक नए जिले का मुख्यालय बनाया गया तब इसका महत्व और भी बढ़ गया। पाँचवे दशक में एक इंटरमिडीएट कालेज भी खुला। मांड्या में व्यापार और परिवहन का केन्द्रीकरण हुआ। इसके साप्ताहिक बाज़ार का आकार बढ़ गया जबकि अन्य पड़ोसी गाँवों में साप्ताहिक बाज़ार या तो घटने लगे या तो अपनी पूर्वस्थिति में ही बने रहे। अपने मैसूर का अध्ययन श्रीनिवास ने दोबारा 1952 की गर्मियों में किया। द्वितीय विश्वयुद्ध से यहाँ भी समृद्धि आयी। यहाँ की नेता जाति समृद्ध होने के साथ-साथ काफ़ी बुद्धिमान भी है। वे जाति से किसान हैं और अगर विश्वयुद्ध न हुआ होता तो वे ग्रामीण भूस्वामी ही बने रहते। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध से न केवल बड़ी मात्र में नकद पैसा हाथ में आया बल्कि इसने इनका नज़रिया भी बदल दिया। इसके परिणामस्वरूप ये अब ऐसे नए पूँजीपति बन गए हैं जिनका एक पैर गाँव में है और एक पाँव शहर में है। ग़ैर-ब्राह्मण आंदोलन और चौथे दशक की मंदी ने दक्षिण और ग्रामीण क्षेत्रों से बड़े शहरों में ब्राह्मणों के आव्रजन को बढ़ाया। उनमें से जो ज़्यादा उद्यमी थे वे व्यापार, वाणिज्य, दस्तकारी में अपने को आगे बढ़ाया।

भारतीय नेताओं द्वारा देश के लिए ‘जातिविहीन और वर्गविहीन समाज’ की स्थापना का लक्ष्य निर्धारित करना सचमुच एक महत्वपूर्ण घटना है। बीसवीं सदी के मध्य में संविधान द्वारा समतवादी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना में स्पृश्यता निवारण, अनुसूचित जतियों और जनजातियों को विशेष संरक्षण की व्यवस्था और वयस्क मताधिकार आदि क़दम उठाए गए। इसके बाद राज्य और केंद्र सरकार ने अद्योगिक मज़दूरों के हितों की रक्षा, ज़मींदारी की समाप्ति, जोतदार किसानों को बेदख़ली से बचाकर उन्हें उत्पादन का उचित हिस्सा दिलाने की गारंटी संबन्धी क़ानून बनाए। शिक्षित भारतीयों में यह धारणा आम है कि जाति प्रथा समाप्त हो रही है और शिक्षित, शहरी और ऊँची जातियों के पश्चिमी रंग में रँगे सदस्य इसके बंधनों से मुक्त हो चुके हैं। श्रीनिवास के अनुसार ये दोनों धारणाएँ ग़लत हैं। इन लोगों की जीवन शैली मई परिवर्तन अवश्य आया होगा पर इसका मतलब यह नहीं कि वे जाति बंधनों से पूरी तरह से मुक्त हो गए हैं। प्रभुत्व के पारंपरिक रूप अभी भी पूरी तरह मिटे नहीं हैं परन्तु प्रभु जाति के अस्तित्व को हम ख़ारिज नहीं कर सकते हैं। मैसूर के लिंगायत और ओक्कालिगा, आंध्र के रेड्डी और कम्मा, तमिल देशों के गाउन्दर, पदायाची और मुदालियार, केरल के नायर, महाराष्ट्र के मराठा, गुजरात के पटीदार और राजपूत, जाट, उत्तरी भारत के गुजर और अहीर- ये सभी प्रमुख जातियों की मिसाल हैं। (श्रीनिवास, 2001:97) यह बात क़ाबिले-ग़ौर है कि भारत के अनेक भागों में कुछ जातियाँ निर्णायक रूप से प्रभुत्व रखती हैं। एक तरफ़ प्रभुत्वशाली जातियों के नेता आर्थिक और राजनीतिक अवसरों का लाभ उठाने के लिए तत्पर हैं पर दूसरी तरफ़, हरिजनों की स्थिति में कोई सुधार न हो, की मानसिकता के साथ संकीर्ण भी हैं। वर्तमान समय में हरिजन उनके लिए खेतिहर मज़दूरों का सबसे बड़ा स्रोत हैं और अगर वे शिक्षित और अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो जाएँ तो प्रभुत्वशाली जातियों के अस्तित्व को ख़तरा हो जाएगा। आधुनिक समय में जब कोई व्यक्ति नया धन्धा शुरू करता है तो उसका यह धन्धा और पारंपरिक धन्धा अगर समान न हो तो कम-से-कम उससे मिलता-जुलता अवश्य होता है और वह इसके लिए उस जगह को चुनता है जहाँ उसके जात-भाई रहते हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि ग्रामीण और शहरी धन्धों के बीच पारंपरिक व्यवसायों के कारण एक तारतम्य पैदा हुआ है। अँग्रेज़ शासन और भारतीय सरकार ने भेदभाव उन्मूलन हेतु कई महात्वपूर्ण प्रयास किए हैं, परंतु श्रीनिवास का मानना है कि असमानताओं को दूर करने के लिए दिमाग और आम समझदारी से काम नहीं लिया गया और सिर्फ शुभकामनाएँ रखना ही काफ़ी नहीं है।

इस लेख में श्रीनिवास ने भारतीय एकता के विमर्श पर विवेचन किया है। सबसे पहले उन्होंने क्षेत्र की अवधारणा पर विचार किया है। भाषायी एकता एक क्षेत्र विशेष में सिमटी होती है जबकि जाति एक क्षैतिज एकता का प्रतिनिधित्व करती है। उदाहरणस्वरूप उत्तर प्रदेश का एक ब्राह्मण एक स्थानीय चमार की क्षेत्रीय संस्कृति नहीं रखता लेकिन भारत में कश्मीर से लेकर केपकैमरून तक हर जगह फैले ब्राह्मणों के सांस्कृतिक रूप से वह अवश्य मिलता-जुलता है। स्थानीय रूप से प्रभुत्वशाली जाति अपने इलाक़े में कुछ ख़ास क़िस्म की बोली के प्रचार-प्रसार में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। एक भाषायी राज्य तो बहुत बाद की संकल्पना है जो भारतीय राष्ट्रीय संघर्ष का एक उप-परिणाम है। गणमान्य लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा संस्कृत और फ़ारसी का स्थान धीरे-धीरे अंग्रेज़ी ने ले लिया और इसने न केवल एक सामान्य संपर्क की भाषा की भूमिका निभाई है बल्कि आज ये एक विशिष्ट स्थान पर भी क़ाबिज़ है। वहीं श्रीनिवास का मानना है कि हिन्दी का पलड़ा भारी है। अगर हिन्दी भाषी लोग थोड़ा धैर्य और समझ-बूझ से काम लें तो विभिन्न राज्यों में रहने वाले भारतीयों के बीच धीरे-धीरे हिन्दी ही संपर्क का माध्यम बन जाएगी। जाति कि संस्था ने भारतीयों को एक सामान्य सांस्कृतिक सूत्र दिया है। कोई चाहे भारत के किसी भी क्षेत्र में रहे, वह जाति की दीवारों से घिरा ही रहेगा। केवल हिन्दू ही नहीं बल्कि जैन, सिख, मुसलमान, ईसाई जातियों में भी यह सामान्य है। आधुनिक भारत में गतिशीलता बढ़ जाने से हर समूह अपने ऊपर के समूह से संबंध बनाना चाहता है और अपने नीचे के समूह से नाता तोड़ना चाहता है। भारतीय एकता की एक अवधारणा धार्मिक भी है। देश के हर हिस्से में प्रसिद्ध तीर्थ स्थान हैं और अँग्रेज़ों के आने से पहले तीर्थयात्री मीलों पैदल चलकर जाया करते थे। दरअसल बहुत सारे ऐसे रीति-रिवाज़ और अनुष्ठान हैं जिनसे भारत की एकता की भावना प्रकशित होती है। गाँव वाले अक्सर अपने गाँव को बेहतर मानते हैं। उसी तरह व्यक्ति अपनी जाति को कहीं श्रेष्ठ मानता है और उसके प्रति समर्पित भी होता है।

भारतीय गाँवों में होने वाले विवाद और उनके स्वरूपों का वर्णन इस लेख के माध्यम से किया गया है। हर समाज की अपनी व्यस्तताएँ हैं और उन्हीं के अनुरूप विवाद भी पनपते हैं। विभाजन संबंधी विवाद आमतौर पर लंबे खिंचते हैं और एक बार विवाद छिड़ते ही छोटे-मोटे विवादों का अंत हो जाता है। समान्यतः विवादों को सुलझाने पर अधिक ध्यान दिया जाता है। विवाद ज़्यादातर संपत्ति के बँटवारे को लेकर, बँटवारे की बराबरी को लेकर, खेत की मेड़बंदी को लेकर इत्यादि कारणों से ही होता था।

एक सामाजिक नृतत्वशास्त्री ग्रामीण समुदाय का सम्पूर्ण अध्ययन करने की कोशिश करता है और उसका ज्ञान तथा कार्यशैली उचित विश्लेषण करने के लिए अनिवार्य पृष्ठभूमि उपलब्ध करती है। उसकी कार्यशैली अर्थशास्त्री, राजनीतिक वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता की अधूरी कार्यशैली में आवश्यक संशोधन प्रदान करती है। नृतत्वशास्त्री, जिसने ग्राम समुदाय का गहन अध्ययन किया हो, कभी भी इस धारणा से सहमत नहीं होगा आज भी किसान घोर दकियानूस, मंदमति, मूर्ख और अंधविश्वासी है, बल्कि वह उसकी परिवर्तित जीवनशैली को सामने लाने का प्रयास करेगा। मैकिम मैरिएट द्वारा लिखे गए एक लेख ‘टेक्नोलोजिकल चेंज इन अवर डेव्लप्ड रुरल एरियाज़’ में बताया गया है कि उत्तर प्रदेश के किशनगढ़ी गाँव के लोगों ने नई फ़सलों और खेती की नई-नई तकनीकों को अपनाया है जबकि ये तकनीकें अपेक्षाकृत जटिल होती हैं। (वही, 2001:133) कृषक-अर्थव्यवस्था बहुत ही अभावग्रस्त है। उसे मात्र ज़िंदा रहने के लिए कुछ चीज़ों की ज़रूरत है और हर उपयोगी वस्तु का भारी अभाव है। गोंदी (युफोर्बिया), राम बांस (अगावे), बबुल आदि ऐसे बहु-उपयोगी संसाधन हैं जिनका उपयोग बाड़ बनाने, जलावन के काम में, खाद के रूप में आदि में होता है। इसके अतिरिक्त गाय के गोबर का उपयोग भी कई कामों में लिया जाता है। धार्मिक ग्रन्थों में लिखित और ऊँची जातियों के विचारों से हटकर यदि धार्मिक व्यवहारों का अध्ययन किया जाय तो हिन्दू धर्म के बारे में दार्शनिकों, विद्वानों और सुधारकों से बिलकुल भिन्न धारणा बनेगी।

आजकल सामाजिक नृतत्वशास्त्र का अंग्रेज़ी विद्वान संस्कृति पर नहीं बल्कि समाज, सामाजिक संरचना और सामाजिक सम्बन्धों पर ज़्यादा ज़ोर देता है। वह यह जानने की कोशिश करता है कि आज रीति-रिवाज़ों और नियमों का कहाँ तक पालन हो रहा है, किन रीति-रिवाज़ों और नियमों का पालन अन्यों से ज़्यादा होता है, अन्य लोगों पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है इत्यादि। जब कोई नृतत्वशास्त्री किसी समुदाय पर क्षेत्र अध्ययन करता है तो उसके दिमाग में दो समुदाय होते हैं- एक जिसमें वह पैदा हुआ और दूसरा जिसका उसने अध्ययन किया। जैसे-जैसे उसकी जानकारी बढ़ती जाती है उसका रवैया तुलनात्मक होता चला जाता है। चूंकि नेतृत्वशास्त्री यह भली-भाँति जनता है कि समाज की विभिन्न संस्थाएँ आपस में एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं इसलिए वह जो कुछ भी देखता और सुनता है, वह सब कुछ दर्ज करता है। किसी ने इस विधि को ‘ग्रैब आल’ (सब हथिया लो) विधि कहा है। (वही, 2001:145) जब समुदाय इतना छोटा हो कि केवल एक अनुसन्धानकर्ता साल-दो-साल के समय में जाँच पूरी कर पता है, तभी यह श्रेष्ठतम फल देता है। प्रश्नावलियों के बढ़ते इस्तेमाल का, ख़ासकर गहरा अध्ययन विधि में भरपूर उपयोग किया जाना चाहिए। सवाल पूछने में पारंगत लोगों द्वारा तैयार की गई प्रश्नावली और सामाजिक नृतत्वशास्त्र के विद्वान द्वारा इस कार्य को पूरा करवाना नृतत्वशास्त्र के शास्त्रागार का एक वैध अस्त्र है। भारत में लिखित सामग्री पर विद्वानों का ध्यान ज़्यादा केन्द्रित रहा है और इसी वजह से भारतीय समाज और संस्कृति का एक ‘किताबी नज़रिया’ बनकर सामने आया। इस प्रकार किसी भी जाती समूह में पाये जाने वाले छुआछूत संबंधी विचारों की मनु या अन्य धर्मशास्त्री के संदर्भ में व्याख्या करने की कोशिश की गई है और यह मान्यता भी निहित है कि जाति धार्मिक ग्रन्थों की देन है। अब एक और प्रकार की शोध संरचना का जन्म हो रहा है। पिरामिड के शिखर पर शोध परियोजना का निर्देशक, उसके बाद उप-निर्देशक जो परियोजना की देख-रेख करता है। उसके नीचे एक अधीक्षक होता है जो प्रश्नावलियाँ तैयार करता है और आकड़ों का विश्लेषण करता है। अंततः शोधकर्ता होता है जो वास्तविक जाँच-पड़ताल करने का काम करता है। वे या तो एम.ए. या पी.एच.डी. के छात्र होते हैं।

हिन्दू धर्म अत्यंत जटिल धर्म है। इसमें चर्च नहीं है, इसका कोई निर्धारित धर्म-सिद्धांत नहीं है। मोटे तौर पर हिन्दू होने के लिए हिन्दू धर्म में जन्म के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है। यह बहु-ईश्वरवाद से संचालित होता है और विशेष परिस्थितियों में विशेष ईश्वर को प्राथमिकता देता है। इस संदर्भ में विभिन्न धार्मिक ग्रन्थों में कथाएँ भी हैं। विदेशी विद्वानों ने हिन्दू धर्म की उन विशेषताओं को ज़्यादा महत्व दिया जो कि सबसे ज़्यादा दिलचस्प हो सकती थीं- सती, नरबली, ठगी, आग पर चलना, साधना की हास्यपद अभिव्यक्ति, देवदासी इत्यादि-इत्यादि। परिणामस्वरूप वे पारंपरिक हिन्दू धर्म की बहुत सारी विशेषताओं के आलोचक बन गए। इनके द्वारा प्रस्तुत विवरणों में कहीं भी न तो हिन्दू धर्म की पूर्ण स्वीकृति मिलती है और न ही तटस्थ विवरण जिसमें न तो प्रशंसा हो और न ही भर्त्सना। जहाँ एक दृष्टि से जाति प्रथा हिन्दू धर्म की बुनियाद है वहीं यह केवल हिंदुओं तक ही सीमित नहीं है। दरअसल जाति प्रथा, वर्ण व्यवस्था का ही विकृत रूप है। हिन्दू धर्म में चार आश्रम होते हैं ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास। इसी प्रकार चार लक्ष्य (पुरुषार्थ) निर्धारित किए गए हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।

कुल अध्यायों का विवरण
भूमिका
प्रथम अध्याय: आधुनिक भारत में जाति
द्वितीय अध्याय: संस्कृतिकरण और पश्चिमीकरण पर एक टिप्पणी
तृतीय अध्याय: वर्ण और जाति
चतुर्थ अध्याय: जातियाँ- क्या कल के भारत में उनका अस्तित्व संभव है?
पंचम अध्याय: ग्रामीण क्षेत्रों का औद्योगीकरण और शहरीकरण
षष्ठम अध्याय: समानता की ओर भारत
सप्तम अध्याय: भारतीय एकता की समस्या का स्वरूप
अष्टम अध्याय: एक भारतीय गाँव में विचारों का अध्ययन
नवम अध्याय: ग्राम अध्ययन और उनका महत्व
दशम अध्याय: सामाजिक नेतृत्वशास्त्र और ग्रामीण तथा शहरी समाजों का अध्ययन
एकादशम अध्याय: हिन्दू धर्म
द्वादशम अध्याय: अनुक्रमणिका


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