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ISSN 2292-9754

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10.24.2014


हिन्दी कहानी से प्रवासी हिन्दी कहानी.....एक मूल्य यात्रा

विशाल साहित्य जगत में कहानी विधा का विशेष स्थान है। जब साहित्य की बात की जाती है तब उसे लघुता के या संकीर्णता के दायरे में नहीं आंका जाता। विशेष रूप से कहानी पर चर्चा हो तो सीमाओं में बाँधा नहीं जा सकता। भूमण्डलीकरण के कारण सम्पूर्ण विश्व एक छोटा गाँव बन गया है। इस गाँव में कथा लेखन क्षेत्र भी जीवन के अन्य क्षेत्रों की भाँति विस्तीर्ण हो चुका है।

हिन्दी कहानी अपने विकास के विभिन्न स्तरों में से गुज़रते हुए जिस शिखर पर स्थापित है। वहाँ पर पहुँचने के लिए विभिन्न युगों के श्रेष्ठ लेखकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सन 1900 में गोस्वामी की ’इन्दूमति’ से जो यात्रा प्रारंभ हुई वह भारतेन्दु हरिशचन्द्र की वंग महिला से कई हाथों में होते हुए प्रेमचंद युग में प्रवेश कर गई। जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, कृष्ण दास, विनोद शंकर व्यास, आदि इस युग के महान लेखक रहे। "प्रेमचंद आदर्श और यर्थाथ का समन्वय करना चाहते थे जिसे आदर्शोन्मुख यर्थाथवाद कहा जाता है।" कफन, नमक का दारोगा, बड़े घर की बेटी, आँधी, प्रतिध्वनि इस समय की प्रमुख मूल्यों को कहती कहानियाँ है। इसके पश्चात् प्रेमचंदोत्तर युग आया जो फ्रायड, एडगर तथा गेस्टालड जैसे विद्वानों से प्रभावित रहा। जैनेन्द्र ने कहानी को इस युग में नई दिशा प्रदान की। अज्ञेय ने उसमें विद्रोही मूल्यों को अपनाया, यशपाल मार्क्सवाद से प्रेरित रहे तो अश्क ने समस्या तथा मनोवैज्ञानिक मूल्यों का कहानी में चित्रण किया। अश्क यथार्थवादी मूल्यों के कथाकार रहे हैं।

कहानी का अगला युग स्वातंत्र्योत्तर युग है। इसमें कहानी पाश्चात्य दर्शन, मूल्यों से प्रभावित रही। यर्थाथ, बौद्धिकता, मनोविश्लेषण आदि गुण इस युग की ख़ास प्रवृत्तियाँ रहीं। नरेश मेहता, रघुवीर सहाए, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश, निर्मल वर्मा, मन्नु भण्डारी, राजेन्द्र यादव, उषा प्रियंवदा आदि, इस युग के प्रमुख लेखकों ने टूटते रिश्ते, संत्रास, विसंगति, अकेलापन, बेबसी, लाचारी आदि में ढके मूल्यों का वर्णन किया है। "गत दो दशकों में नई कहानी ने दार्शनिक आधारों के लिए अनेक नवीनतम प्रवृत्तियों को अपनाया।" यह युग कहानी के बदलते मूल्यों के स्वरूप तथा परिपक्व होने का युग है।

मानवमूल्यों का वर्चस्व तथा उनकी माँग सम्पूर्ण विश्व में है। महान भारतीय विद्वान जहाँ सर्वप्रथम विदेश गए, उन्होंने मानव मूल्यों को बड़े स्तर पर फैलाने का प्रथम प्रयास किया। विवेकानंद, राजाराममोहन राए, अरविंदोघोष, गाँधी, एनी वेसेंट, मदर टेरेसा ऐसे महान नाम है जो मूल्यों के लिए जाने जाते हैं। भारतवर्ष के लोग आज उन श्रेष्ठ मूल्यों के प्रति सजग नहीं जिन्हें विदेशों में मान्यता प्राप्त हो रही है। सहानुभूति, दया, आदर्श, समन्वय तथा सम्मान जैसे मानवीय मूल्य सम्पूर्ण संसार में वर्चस्व बना रहे हैं। परन्तु भारत में घर की मुर्गी दाल बराबर वाली कहावत मूल्यों के लिए चरितार्थ हो रही है। दूरी सदैव एहमियत का आभास कराती है। यह प्रवासी भारतीय लेखक के मन की व्यथा है। उन्हें भारत के लोगों की तुलना में मूल्यों की आवश्यकता अधिक अनुभव हो रही है।

विकास के सभी युगों को पार करते, ऊँची गहरी परिवर्तन की घाटियों से होकर भारतीय कहानी देशी सीमाओं को लाँघ कर नवीन सभ्यता, संस्कृति, मूल्यों को अपने भीतर समाने लगी है। आज कहानी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आँका जाता है। कहानी में समन्वय की एक महक आती है। यह महक नवीन सभ्यता, संस्कृति, परिवेश, मूल्यों, रीतिरिवाजों की कहानी को नया स्वरूप प्रदान करती है। सदैव युगानुरूप लेखक अपनी लेखनी के माध्यम से ज्वलंत विषयों समस्याओं से पाठक को अवगत कराता रहा है। बीसवीं शताब्दी के मूल्यों का युग दलित विमर्श, मुस्लिम विमर्श तथा स्त्री विमर्श का माना जाता रहा है। इन विषयों के माध्यम से इस युग के लेखक ने समाज के बिगड़ते मूल्यों को, ढहती मान्यताओं, भेद-भाव तथा स्त्री की असहाय तथा दुर्गतिपूर्ण स्थिति को व्यक्त किया है। यह विषय अपने-अपने समयानुसार चरम पर रहे हैं।

विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोग इस छोटे गाँव (संसार) में बेहतर सुख-सुविधाओं, रोज़ी-रोटी की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पलायन कर रहे हैं। प्रवास में बस कर वे नई धरती, नए परिवेश, नए अनुभवों एवम् संस्कृति के अनुरूप स्वयं को ढाल रहे हैं। प्रवास में रह रहे भारतीय लोगों को हिन्दी भाषा एक दूसरे से जोड़ कर रखती है, तथा इसी के माध्यम से वह अपने अनुभवों को व्यक्त भी करते हैं। धीरा वर्मा के अनुसार, "सभी प्रवासी भारतीय चाहे वे किसी भी प्रांत से गए हों और चाहे वे किसी भी भाषा के बोलने वाले हों, किसी भी धर्म या मत के अनुयायी ही उन सभी भारतीयों को जोड़ने वाली हिन्दी है।" हिन्दी भाषा वह माध्यम है जिसके द्वारा प्रवासी लेखक कहानी के रूप में अपने दिल की धड़कन को भारतीय पाठक तक पहुँचा रहे हैं।

वर्तमान युग विज्ञान का युग है। परिवर्तन इस युग की सर्वश्रेष्ठ माँग है। कहानी विधा भी विभिन्न दिशाभागों से निकलकर खुले मैदान में आ गई है, तथा लेखक ने भी युगपरिवर्तन के अनुरूप स्वयं को ढाल लिया है। उसके सामने सभी विकल्प खुले है। वह स्वतंत्र है। वह कल्पना को छोड़ जीवन की वास्तविकता, कटु/नग्न सत्य को पाठक तक पहुँचाना चाहता है। आँखें बंद कर कल्पना नहीं बल्कि कड़वे सत्य से दो चार होना चाहता है। कृष्ण बिहारी के अनुसार "जिस क्रूर समय में मैं रह रहा हूँ उसमें कल्पना की गुंजाइश नहीं बची मनुष्य अपनी विपदाओं से रिकार्ड ध्वस्त कर रहा है। ऐसे में जो दिखता है उसे दिखाना मैं अपना धर्म मानता हूँ बजाए इसके कि आँखें बंद कर कल्पना करूँ और उसके घटते हुए सत्य को भी देखने से वंचित हो जाऊँ।" यह कह सकते हैं कि लेखक रूपी कलाकार अपनी कलम रूपी तुलिका से समाज की बनती-बिगड़ती तस्वीर बना कर पाठक को सत्य का दर्पण दिखा सकता है। प्रवासी साहित्य 21वीं शताब्दी का प्रमुख विषय माना जा रहा है। यह विषय हिन्दी कहानी की परिपक्वता का प्रतीक है। अपने देश समाज से परे प्रवासी भारतीय लेखक प्रवास में रहकर अपने अनुभवों को भारतीय पाठक को बताता है। अर्चना पैन्यूली के अनुसार "विश्वभर में हिन्दुस्तान ऐसा देश है जहाँ से काफी तादाद में लोग दूसरे देशों में प्रवास करते हैं। आज भूमण्डल के हर देश में भारतवासी बसे है। हिन्दोस्तानियों ने जिन भी देशों में प्रवास किया वहाँ अपनी भारतीय संस्कृति और धार्मिक प्रथाओं को कायम रखने की भरसक कोशिश की है।" प्रवासी साहित्य किसी भी विधा को बँधी सीमाओं से परे अतंर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करता है। प्रवासी कथा, (कहानी) लेखक के हालात, अनुभव, संघर्ष, कठिनाई, सुख-सुविधा तथा उसके जीवन के उन पहलुओं को उद्घाटित करती है जिससे आम व्यक्ति परिचित नहीं। प्रवासी लेखक ने अपने देश, धरती तथा लोगों से दूर, दूसरे देश की मिट्टी तथा वहाँ के लोगों को अपना लिया है। उसने वहाँ की संस्कृति में स्वयं को ढाल लिया है। परन्तु आज भी कहीं उसे उस प्रवासी धरती में अपने देश की सोंधी कच्ची मिट्टी की ख़ुशबू की तलाश है। वह वहाँ सांस्कृतिक तथा व्यवहारिक स्तर पर जो परिवर्तन देखता है, वह उसकी देशी संस्कृति से भिन्न है। उसके मानस पटल पर पश्चिमी मूल्यों तथा मापदण्डों का जो प्रभाव पड़ता है, उसे वह पहले अनुभव के रूप में स्वयं में समाता चला जाता है, तब उन अनुभवों की परिणति उसकी लेखन अभिव्यक्ति के रूप में होती है। अर्चना पैन्यूली के अनुसार "प्रवास के अनुभव प्रवासी लेखक के लिए प्राथमिक आँकड़े हैं जिन्हें वे साहित्य के माध्यम से अपने घर तक पहुँचाता है। वह अपने लोगों के लिए खुली खिड़की का कार्य करता है जहाँ से वह एक दूरस्थ स्थान के सामाजिक भौगोलिक यथार्थ के साथ-साथ संस्कृति की खूबियों का सम्प्रेषण करता है"। प्रवासी लेखक ने जहाँ अपनी दैनिक जीवन की सुख-सुविधाओं का वर्णन अपनी कहानियों में किया है, वहीं वह दैनिक जीवनयापन में आने वाली समस्याओं को भी बताना नहीं भूलता। परमानंद श्रीवास्तव कहते हैं "तेजेन्द्र शर्मा की कहानीयाँ जीवन के गहरे अंधकार में धँसती हैं और जीवन के लिए एक मूल्यवान सत्य बचा लेती हैं।" वह सजग रहता है उस परिवेश के प्रति जो उसे लेखन के लिए प्रेरित करता है। पूजा श्रीवास्तव के अनुसार, "कृष्ण बिहारी अपनी कहानियों में समाज की जिन विंसगतियों को दर्शाते हैं उस पर हिन्दी के लेखकों का ध्यान कम ही जाता है आधुनिक समाज में धीरे-धीरे दम तोड़ रही मानवीय संवेदनाएँ ही लेखक की मूल चिंता है। लम्बे समय तक आबूधावी में रहते हुए आजीविका के लिए अध्यापन से जुड़े लेखक ने वहाँ के अनुशासन एवं जटिल सामाजिक व्यवस्था से प्रभावित मानवीय प्रमाणिक अभिव्यक्ति इन कहानियों के माध्यम से चित्रित करने की कोशिश की है।" कथा लेखक प्रवास में अपने साथ-साथ अपने गुणों के लेकर गया। वह अपनी रचनाओं के माध्यम से श्रेष्ठ मानवीय गुणों का प्रचार व प्रसार कर रहा है। जहाँ एक तरफ मूल्यों का ह्रास हो रहा है, वहाँ यह एक सराहनीय कदम है। अर्चना पैन्यूली के अनुसार, "विश्वस्तर पर नवीनीकरण के साथ-साथ बड़े स्तर पर मूल्यों का ह्रास हो रहा है। विश्व स्तर पर मानवता के मूल्यों का पतन विश्व को एक ऐसी दिशा प्रदान कर रहा हैं जहाँ संसार से दया, भावनाएँ, सहानुभूति तथा सत्य आदि मानवीय मूल्य समाप्त हो रहे है।" प्रवासी लेखक उन सभी मूल्यों का पक्षधर है, जिन्हें भारतीय लोग अँधी नकल की दौड़ में भुलाए बैठे हैं। प्रवासी लेखकों में चाहे सहज स्वभाव वाले अभिमन्यु अनंत हो, प्रा़ण शर्मा हो, बेबाक लिखने वाले कृष्ण बिहारी हो,काला सागर जैसी कहानी लिखने वाले तेजेन्द्र शर्मा हो, अपने अपने छोटे-छोटे अनुभवों का बाँटने वाले उमेश अग्निहोत्री हो या पत्रिका के माध्यम से साहित्य सेवा करने वाले सुमन कुमार घई हो सबका उद्देश्य केवल हिन्दी साहित्य के माध्यम से मूल्यों का वर्चस्व को स्थापित करना है। उषा प्रियंवदा, दिव्या माथुर, सुषमबेदी, इला प्रसाद, उषाराजे सक्सैना, अर्चना पैन्यूली, सोमावीरा, शैल अग्रवाल आदि प्रवासी भारतीय ऐसी लेखिकाएँ है, जो लम्बे समय से प्रवास की भूमि पर रह कर मानवीय मूल्यों की सोंधी खुशबू को तलाशने का प्रयास कर रही है।

तेजेन्द्र शर्मा ने कहानियों से मूल्यों की चरमराती व्यवस्था का वर्णन किया है। कृष्ण बिहारी बेबाक कहानीकार हैं। जिन्होंने आलोचनाओं का समाना करते हुए भी नग्न सत्य को उजागर किया है। उन्होंने मूल्यों के गिरते स्तर को दर्शाया है। साथ ही मूल्यों के अस्तित्व पर अपनी गहरी आस्था प्रकट की है। उमेश अग्निहोत्री ने अपनी छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से उस व्यथा का वर्णन किया है जिसे आसानी से शब्द़ नहीं दिये जा सकते उन्होंने प्रवास में मानव मूल्यों के ह्रास का वर्णन किया है। सुषम बेदी ने कहानी संग्रहों में ऐसे कटु सत्यों का वर्णन किया है, जिनमें लेखिका मूल्यों के गिरते स्तर की उजागर करना चाहती है तो साथ ही यह भी बताना चाहती है कि मूल्यों का गिरना बनना मानव के हाथ में है। दिव्या माथुर ने कहानी संग्रहों में विभिन्न स्तरों पर मानव मूल्यों का वर्णन कर उनकी ज़रूरत के लिए चेताया है। असगर वज़ाहत कहते हैं "दिव्या माथुर की कहानियाँ काल पात्र एवं स्थितियों से ऊपर उठती हैं। वे एक विचार को केन्द्र में रखती हैं।" उषाराजे सक्सेना ने अपने कहानी संग्रहों में अपने विशेष अनुभवों का वर्णन कर मानव मूल्यों की विश्वस्तर पर माँग की है। लेखिका मूल्यों को विस्तृत दृष्टिकोण से देखती है। इला प्रसाद ने संघर्षमयी कहानियों के माध्यम से यह निष्कर्ष दिया है, कि चाहे वह भारत हो या विदेश स्त्री की जगह एक ही है। मानव मूल्यों की वैश्विक स्तर पर बहुत आवश्यकता है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। अर्चना पैन्यूली ने अपनी विभिन्न कथाओं के माध्यम से विभिन्न रंगों के मूल्यों का वर्णन किया है। वह मूल्य जो भारतीय धरती को लाँघ कर प्रवास में ढूँढे जा रहे है। जो उन्हें जमीन से जोड़े रखते है।

प्रवासी कहानी लेखकों में चाहे कोई भी हो, उनकी कथाओं में मूल्यों की तलाश देखी जा सकती है। वे मूल्यों को प्रस्थापित करना चाहते हं,ै वे लोग मानवता की तलाश को पूरा करना चाहते हैं। मानव मूल्य केवल कुछ दायरे तक सीमित नहीं, बल्कि विश्वस्तर पर धर्म, रंग, जाति से परे अपनी पहचान रखते हैं। जिसके लिए प्रवासी लेखक को बहुत हद तक श्रेय जाता है। यहाँ पर प्रवासी कहानी को देखकर मीमांसक यह मान सकते हैं कि आज मूल्यों में विकृतियाँ होते हुए भी बहुत कुछ श्रेष्ठ है क्योंकि जो विकृत है, वह मूल्य नहीं हो सकता। इसलिए हमें प्रवासी लेखक के प्रयास को मान्यता देनी होगी जहाँ मूल्य ही श्रेष्ठ हैं।


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