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ISSN 2292-9754

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10.03.2017


तेरी कमी सी है

आज आँखों में कुछ नमी सी है,
लगता है आज फिर,
तेरी कमी सी है,
कुछ पल याद तो करता हूँ,
फिर भुला देने का,
अथक प्रयास भी करता हूँ,
फिर सोचता हूँ कि,
तू दूर ही सही है,
पास न आने का तेरा,
गुरूर ही सही है,
क्योंकि
जब साथ होकर भी तू साथ नहीं था,
तो तेरा ऐसे दूर रहना ही सही है।

आज फिर तेरी याद आई है,
हैरान हूँ कि,
इतने अरसों के बाद आई है,
वो बातें,
अब नहीं होती,
वो लम्बी रातें,
अब नहीं होती,
वो मुलाक़ातें भी तो,
अब नहीं होती ।

सावन के मौसम में,
रिमझिम मल्हार नहीं होती,
शीत भी आती है,
पर अब वो गर्माहट नहीं होती,
बसंत की बेला में,
अब वो बहार नहीं होती,
तेरा दीदार न हुआ तो क्या,
ये इश्क़ साकार न हुआ तो क्या,
हम तेरे, और तू हमारा न हुआ तो क्या,
आज फिर भी आँखों में नमी सी तो है,
यक़ीनन आज तेरी ही कमी सी तो है।


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