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ISSN 2292-9754

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09.25.2017


महुआ के फूल

भोर-भिनसार गिरे,
फूल महुआ के ।

गंध के चले बाण
बावले हुए प्राण ।
पेड़-पेड़ पात-पात
हुई ख़बर प्रात -प्रात।

भौंरे बौराए हैं
पाखी मँडराये हैं
सुध-बुध ही हर लिये
सिर्फ शर छुआ के !

गंध पहचानी है
सूरत अनजानी है।
डोर खींचने लगी
मर्म सींचने लगी ।

घाव भी कहीं भरे
दर्द भी हुए हरे।
हवा सखी ले चली
सुगंध को बहाके ।


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