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ISSN 2292-9754

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12.08.2014


यहाँ दर्द की नदी बहती है
डॉ. उर्मिला अग्रवाल

समीक्ष्य पुस्तक: बूँद-बूँद लम्हे (काव्य संग्रह)
लेखिका: अनिता ललित
प्रकाशक : मनसा पब्लिलकेशन्स,
गोमती नगर, लखनऊ, संस्करण : २०१४;
मूल्य : १७५
पृष्ठ संख्या:१२२
एमाज़ॉन इंडिया में काव्य-संग्रह 'बूँद-बूँद लम्हे' के विक्रय का लिंक-
http://www.amazon.in/Boond-Lamhe-Anita-Lalit/dp/9381377499/ref=cm_cr_pr_pb_t

श्रीमती अनिता ललित की पुस्तक बूँद–बूँद लम्हे हाथ में आई तो खोलने से पहले शीर्षक पर ही अटक कर रह गई–सच जैसे बूँद–बूँद कर जल रिसता जाता है, ऐसे ही तो लम्हा–लम्हा कर जीवन बीतता जाता है और जैसे बूँद–बूँद से घट भरता है उसी प्रकार लम्हा–लम्हा कर जीवन की दास्तान बनती है; क्षणिका को यूँ तो क्षणबोध की कविता कहा जाता है, पर पुस्तक खोली और पढ़नी प्रारम्भ की तो जाना ये मात्र क्षण का बोध नहीं वरन् मानव मन का शाश्वत सत्य है; प्रेम की गहन अनुभूति वेदना का तीव्र प्रवाह, मन के कोमल अहसास, टूटे हुए सपने जीवन की मजबूरियाँ सभी कुछ तो गुँथा हुआ है शब्दों के इन धागों में; ज़िन्दगी के हर लम्हे को चखा है अनिता जी ने। कुछ मिसरी की डली बनकर घुलते रहे, मिठास घोलते रहे; पर कुछ को कड़वे नीम की तरह गटकना पड़ा।

अनिता जी की कविताओं में कई रंग है; पर सब से गहरा रंग दर्द का है। वेदना का ऐसा तीखा प्रवाह, जो सब कुछ बहा कर ले जाता है; दर्द और प्रेम की कविताएँ बहुत लिखी गई हैं, पर दर्द की ऐसी अभिव्यक्ति यहाँ दर्द रुलाता नहीं, स्तब्ध कर जाता है; कुछ पल के लिए सारे अहसास जैसे ठिठक कर रह जाते हैं; दर्द का दवा बन जाना सुना था; पर अनिता जी इस बात को इतने खूबसूरत तरीके से कहती हैं कि प्रशंसा के शब्द ही नहीं मिलते; उनके यहाँ अश्क बहते नहीं, महकते है; रिश्ते सूख कर पत्तों की तरह बिखर जाते हैं, प्रिय के मुँह मोड़ लेने से ख़ुद से भी हार जाते है। किसी की हसरतों की बारिश में भीगने पर भी मन सूखा रह जाता है दर्द की तहों में अश्कों के मोती इसलिए रख दिए जाते है, ताकि यादें महफूज़ रहें; शायद अनिता जी की ये पंक्तियाँ उनके उस दर्द की बात कह रही हैं, जिसमें इन्सान का अपना वज़ूद ही जल जाता है।

भीगे–भीगे जज़्बात
तेरी यादों की धूप में
सीली–सीली सी महक
एक जलते वज़ूद में

और प्रेम में डूबकर अपना अस्तित्व खो देना पंक्तियों में इस तरह ढला है

अपने वज़ूद में मैं.......
तुमको तलाशती रह गई
अब जाकर पता चला–––
मेरा वज़ूद ही मेरा न रहा

अनिता जी केवल प्रेम और दर्द की ही बात नहीं करतीं, जीवन की तल्ख़ियाँ भी उन की कविता में उभरकर आई हैं, जो माँ-बाप अपना सब कुछ न्यौछावर कर बच्चों को पालते हैं, एक दिन उनका वज़ूद ही बच्चों को अखरने लगता है -

ज़िन्दगी की सुबह
जिनके हौसलों से आबाद हुई
शाम ढले क्यों ज़िन्दगी–––
उन से ही बेज़ार हुई

रिश्तों को भी अनिता जी ने नये अंदाज़ में परिभाषित किया है; माता को पृथ्वी -सा सहनशील पिता को आसमान से ऊँचा तो देवदूतों ने कहा पर अनिता जी कहती हैं-

सपनों में अपना जीवन बुनकर
दुआ बन सदा महकती माँ
पिता ढलती साँझ में
जैसे एक दिया हो रोशन

आज समाज में नारी को आज़ादी देने की बात तो खूब कही जाती है, पर किसी न किसी बहाने उस पर रोक लगा ही दी जाती है और ऐसे दर्शाया जाता है, जैसे रोक लगाने वाला उससे अनभिज्ञ हो। इस बात को अनिता जी ने बड़ी खूबसूरती से इस कविता में व्यक्त किया है -

सपने दिखाए तुमने; पंख दिये तुमने
और कह दिया मुझसे– उड़ो खूब ऊँचा उड़ो
मगर मैं उड़ती कैसे; उन सपनों के पंखों पर
पाँव रखकर–तुम्हीं खड़े थे–
और तुम्हें एहसास ही नहीं था–।

पर सारे दर्द और तल्ख़ियों के बाद भी उनकी क्षणिकाओं में सकारात्मकता उभर कर आती है–

चिराग आँखों के जलाओ
रात की स्याही चमक उठेगी
दिल के तारों को छुओ
ख़ामोशियाँ गुनगुना उठेगी।

बूँद–बूँद लम्हे की सभी क्षणिकाएँ और कविताएँ अपनी संप्रेषणीयता में बेजोड़ हैं। वे सीधे हृदय में उतर जाती हैं; इन क्षणिकाओं का मिजाज़ शायराना है; ग़ज़ल की मिठास, तड़प, दर्द–ए–दिल, अश्कों का दरिया सभी कुछ को ये क्षणिकाएँ समेटे हुए हैं; कहीं–कहीं ऐसा प्रतीत होता है कि अगर यह क्षणिकाएँ छन्द में बँध जातीं तो मुक्तक बन जातीं; मुक्तक की -सी लयबद्धता बहुत- क्षणिकाओं में दृष्टिगोचर होती है।

अस्तु इस सुन्दर संकलन के लिए अनिता जी बघाई की पात्र है; अभिभूत हूँ मैं इस कृति की भावप्रवणता और अभिव्यंजना शक्ति से; बह गयी थी में दर्द की नदी के इस प्रवाह में और रीझ उठी हूँ इसके अनूठे उपमानों पर।

अन्त में बस इतना ही कह सकती हूँ कि इस सुन्दर रचना के लिए अनिता जी को बहुत–बहुत बधाई और शुभकामनाएँ।

डॉ. उर्मिला अग्रवाल
15, शिवपुरी, मेरठ-250002 (उ प्र)
दूरभाष-0121-2656644
मोबाइल-09897079664


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